Shayari of the Day: ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध चल रहा है। उधर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी जंग हो रही है। इस जंग में बड़ी संख्या में तबाही देखने को मिल रही है। मासूमों की जान जा रही है। चारों तरफ चीख पुकार सुनाई दे रही है। मानवता और अमन को पसंद करने वाला कोई भी इंसान नहीं चाहता होगा कि जंग हो। जंग के भयावह चेहरे और दुनिया में अमन की जरूरत पर कई शायरों ने एक से बढ़कर एक बेहतरीन शेर लिखे हैं। आज की शायरी में पढ़े हैं मशहूर शायर शाहिद कमाल की कलम से लिखा ऐसा ही एक खूबसूरत शेर और समझते हैं इस शेर के असली मायने:
"जंग का शोर भी कुछ देर तो थम सकता है,
फिर से इक अम्न की अफवाह उड़ा दी जाए"
शाहिद कमाल का यह शेर बेहद गहरी संवेदनशीलता और शांति की चाह को व्यक्त करता है। इसमें शायर युद्ध और अशांति के बीच भी उम्मीद की एक छोटी-सी किरण तलाशने की बात करता है। यहां शेर में जंग का शोर समाज में फैली नफरत, तनाव, संघर्ष और बेचैनी की बात करता है। शायर कहते हैं कि यह शोर हमेशा के लिए नहीं रह सकता। इसे कभी न कभी थमना ही होगा। यानी, हर संघर्ष का अंत संभव है और हर अंधेरे के बाद उजाला आ सकता है।
शेर के दूसरे मिसरे में शाहिद कमाल लिखते हैं कि फिर से इक अम्न की अफ़्वाह उड़ा दी जाए। यह बेहद दिलचस्प है। आमतौर पर अफवाह नकारात्मक मानी जाती है, लेकिन शायर इसे सकारात्मक रूप में इस्तेमाल करते हैं। वह कहते हैं कि अगर असली शांति अभी नहीं भी है, तो कम से कम उसकी एक खबर, एक उम्मीद, एक चर्चा फैलाई जाए, ताकि लोगों के दिलों में सुकून और भरोसा जगे।
इस शेर का मूल भाव यह है कि जब हालात बहुत खराब हों, तब भी इंसान को उम्मीद और शांति की बात करनी चाहिए। क्योंकि कई बार बदलाव की शुरुआत एक छोटी-सी सोच या बात से ही होती है। अगर लोग अम्न (शांति) के बारे में सोचेंगे, बात करेंगे, तो वह धीरे-धीरे हकीकत भी बन सकती है।
जंग पर और भी कई शायरों ने बहुत अच्छे शेर गढ़े हैं। आइए पढ़ते हैं जंग पर चंद बेहतरीन शायरी:
1. जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
- साहिर लुधियानवी
2. भर जाएंगे जब ज़ख़्म तो आऊंगा दोबारा
मैं हार गया जंग मगर दिल नहीं हारा
- सरवत हुसैन
3. लड़ने को दिल जो चाहे तो आंखें लड़ाइए
हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो
- लाला माधव राम जौहर
4. जो दोस्त हैं वो मांगते हैं सुल्ह की दुआ
दुश्मन ये चाहते हैं कि आपस में जंग हो
- लाला माधव राम जौहर
5. वक़ार-ए-ख़ून-ए-शहीदान-ए-कर्बला की क़सम
यज़ीद मोरचा जीता है जंग हारा है
- दिवाकर राही
6. 'मुल्ला' बना दिया है इसे भी महाज़-ए-जंग
इक सुल्ह का पयाम थी उर्दू ज़बां कभी
- आनंद नारायण मुल्ला
7. हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी
जिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं
- हस्तीमल हस्ती
8. तुझ से मैं जंग का एलान भी कर ही दूँगा
मेरे दुश्मन तू मिरे क़द के बराबर तो आ
- नदीम गुल्लानी
9. तमाम शहर से मैं जंग जीत सकता हूँ
मगर मैं तुम से बिछड़ते ही हार जाऊँगा
- एजाज़ अंसारी
10. सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़
सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए
- राहत इंदौरी
