Psychology of Discount: किसी दुकान पर 50 प्रतिशत डिस्काउंट का बोर्ड लगा हो तो नजर अपने आप वहां चली जाती है। ऑनलाइन शॉपिंग में किसी चीज की कीमत 4,999 रुपये से घटकर 2,499 रुपये दिखे तो दिमाग तुरंत कहता है- आधा पैसा बच रहा है। कई बार हम वह सामान खरीद भी लेते हैं, जिसकी हमें जरूरत नहीं थी। सवाल है कि ऐसा क्यों होता है? क्या सचमुच हमें डिस्काउंट पसंद है या फिर दुकानदार हमारे दिमाग के कुछ खास मनोवैज्ञानिक पैटर्न को समझकर कीमत दिखाता है?
व्यवहारिक अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान में इसका काफी अध्ययन हुआ है। डेनियल काह्नमैन और एमोस ट्वरस्की के काम ने यह समझने में मदद की कि इंसान आर्थिक फैसले हमेशा पूरी तरह तर्क के आधार पर नहीं लेता। खरीदारी में भावनाएं, तुलना और पहली दिखाई गई कीमत भी बड़ा असर डालती हैं।
पहली कीमत दिमाग में बैठ जाती है
मान लीजिए किसी जैकेट पर पहले 8,000 रुपये कीमत लिखी है। उसके नीचे 3,999 रुपये की सेल प्राइस है। आपको 3,999 रुपये शायद सस्ती कीमत लग सकती है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे एंकरिंग इफेक्ट कहा जाता है।
एंकरिंग इफेक्ट का मतलब ये होता है कि पहली कीमत हमारे दिमाग में एक तरह का इम्पैक्ट बना लेती है। इसके बाद हम दूसरी कीमत को देखते हैं तो अपने आप दिमाग पहली कीमत से उसकी तुलना करने लगता है। हम यह नहीं सोचते हैं कि जैकेट वास्तव में 3,999 रुपये की है या नहीं। दिमाग पहले 8,000 रुपये से तुलना करने लगता है। इसलिए 'पहले इतना, अब इतने' वाले डिस्काउंट के फेर में हम पड़ जाते हैं।
बचत जैसा दिखने लगता है डिस्काउंट
छूट का एक दिलचस्प खेल भाषा में भी छिपा है। अगर कोई कहे कि 2,000 रुपये का सामान 1,500 रुपये में मिल रहा है तो आपका ध्यान 1,500 रुपये खर्च होने पर जा सकता है। लेकिन अगर कहा जाए कि 500 रुपये बचाइए, तो दिमाग का फोकस बचत पर चला जाता है। यानी वही सौदा एक अलग तस्वीर बना देता है।
व्यवहारिक अर्थशास्त्र में इसे खर्च और लाभ को देखने के तरीके से जोड़कर समझा जाता है। ग्राहक कई बार यह नहीं सोचता कि वह कितना खर्च कर रहा है। वह सोचता है कि वह कितना बचा रहा है।
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'आज ही' क्यों बेचैन करता है मन?
अगर डिस्काउंट के साथ लिखा हो- आज आखिरी दिन, केवल 2 घंटे, या स्टॉक खत्म होने वाला है, तो खरीदने की इच्छा और बढ़ सकती है। यहां स्कार्सिटी इफेक्ट काम करता है। मनोविज्ञान कहता है कि जब कोई चीज सीमित उपलब्ध बताई जाती है तो उसकी जरूरत बढ़ जाती है। दिमाग को लगता है कि मौका हाथ से निकल गया तो शायद दोबारा नहीं मिलेगा।
फ्री देखकर दिमाग और तेजी से बदलता है। डिस्काउंट का सबसे ताकतवर रूप शायद 'फ्री' शब्द है। एक चीज 100 रुपये की हो और दूसरी 50 रुपये की, तो हम दोनों को कीमत के हिसाब से देख सकते हैं। वहीं अगर दूसरी चीज फ्री कर दी जाए तो उसका आकर्षण अचानक बढ़ जाता है।
कई प्रयोगों में व्यवहारिक अर्थशास्त्र के शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि शून्य कीमत इंसानी फैसलों को सामान्य कीमतों से अलग तरीके से प्रभावित कर सकती है। यानी कई बार हमें फायदा इसलिए बड़ा लगता है क्योंकि उसकी कीमत शून्य है।
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ध्यान रहे ये बात
डिस्काउंट वास्तविक भी हो सकता है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब हम छूट को जरूरत का प्रमाण समझ लेते हैं। किसी चीज पर 70 प्रतिशत की छूट है, इसका मतलब यह नहीं कि वह चीज खरीदना जरूरी है। खरीदारी से पहले एक छोटा सा सवाल मदद कर सकता है- अगर इस पर कोई डिस्काउंट नहीं होता, तो क्या मैं इसे फिर भी खरीदता? अगर जवाब 'नहीं' है तो संभव है कि आपको सामान की जरूरत नहीं है। बस डिस्काउंट का आकर्षण खरीदारी की तरफ खींच रहा हो।
