Mirza Ghalib Shayari in Hindi: मिर्जा गालिब का असली नाम मिर्जा असदुल्लाह खां 'गालिब' थी। वह उर्दू और फारसी शायरी के कितने चमकीले सितारे थे, ये बताने की जरूरत नहीं है। उनकी शायरियां आज भी लोगों के जुबान पर चढ़ी हुई हैं। दिल्ली में जन्मे गालिब ने अपनी शायरी में प्रेम, दर्द और जीवन के दर्शन को बखूबी पिरोया। गालिब का जीवन भले मुश्किलों से भरा था लेकिन उनकी शायरी में गहराई के साथ ही एक अजीब सी मस्ती झलकती थी। यहां पढ़ें मिर्जा गालिब के चंद मशहूर शेर:
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1. हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
2. मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूं रात भर नहीं आती
3. कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहां से होती जो जिगर के पार होता
4. इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
5. इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
6. हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता
7. निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
8. तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार
9. आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती
10. आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
11. देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
12. मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है
13. क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
14. बस-कि दुश्वार है हर काम का आसान होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसान होना
15. गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे
ऐसा हो ही नहीं सकता है कि मिर्जा गालिब के ये शेर आपको पसंद ना आए हो। अगर इन शायरियों ने आपके दिल को छुआ है तो आप इन्हें अपनों के साथ भी शेयर कर सकते हैं।
