Gaunhariyon Ka Naach: शादी का घर है। दूल्हे की पगड़ी ठीक की जा रही है। बाहर घोड़ी सजकर खड़ी है। बारात निकलने को है, लेकिन असली रौनक अभी बाकी है। आंगन में बैठी एक महिला ढोलक पर थाप देती है। दूसरी ऊंचे सुर में गीत उठाती है। कुछ ही पलों में आसपास बैठी स्त्रियां तालियों के साथ उसमें शामिल हो जाती हैं।
गीत में दूल्हे की प्रशंसा कम, उसकी खिंचाई ज्यादा है। अगले अंतरे में समधी का नाम आ जाता है। फिर किसी ननद की चाल और किसी देवर की शरारत पर तुक बन जाती है। पूरा घर हंस पड़ता है।
उत्तर प्रदेश की लोक परंपरा में यह गौनहारियों का नाच है, जिसे घुड़चढ़ी नाच के नाम से भी जाना जाता है। यह केवल विवाह के मौके पर किया जाने वाला नृत्य नहीं था। इसके भीतर स्त्रियों का अपना संवाद, हास्य और ऐसा सच छिपा था, जिसे वे सामान्य दिनों में शायद खुलकर नहीं कह पाती थीं।
कौन होती थीं गौनहारियां
गौनहारी शब्द का संबंध गाने वाली स्त्रियों से रहा है। पुराने शब्दकोशों में इसकी व्याख्या पेशेवर रूप से गाने वाली महिलाओं के लिए की गई है। हालांकि कुछ पुराने शब्दार्थों में इनके लिए सामाजिक रूप से भेदभावपूर्ण भाषा भी मिलती है। आज उस नजरिए को दोहराने के बजाय इन महिलाओं को लोक-स्मृति की वाहक के रूप में देखना ज्यादा जरूरी है।

माहौल और भाव झट पकड़ने में माहिर हैं गौनहारियां
बाल शब्दसागर में गौनहारिन या गौनहारी का अर्थ गाने का पेशा करनेवाली स्त्री बताया गया है। वहीं गोनहार उस स्त्री को भी कहा गया है, जो दुल्हन के साथ उसकी ससुराल जाए। इससे अर्थ सही मिले या ना मिले लेकिन यह तो जरूर स्पष्ट होता है कि स्त्रियों, गायन और विवाह की रस्मों के बीच पुराना संबंध रहा है।
दरअसल, परंपराओं को समझने वाले भी मानते हैं कि गौनहारियां केवल गाने के लिए बुलाई गई कलाकार नहीं थीं। वे माहौल को पढ़ना जानती थीं। किस समय मंगल गीत उठाना है, कब बन्ना गाना है और कब हंसी-मजाक से थके हुए घर को फिर जगा देना है- यह समझ उनके अनुभव से आती थी।
हर शादी के लिए बनता था नया गीत
आज शादी में बजने वाले गाने महीनों पहले तय हो जाते हैं। डांस की रिहर्सल होती है और मोबाइल पर प्लेलिस्ट तैयार रहती है। गौनहारियों की प्रस्तुति इसका ठीक उलटा थी। उसमें पहले से तय धुनें हो सकती थीं, लेकिन शब्द मौके पर नया रूप लेते थे।
दूल्हा देर से तैयार हुआ तो उस पर पंक्ति बन गई। मामा ज्यादा व्यस्त दिखे तो गीत में उनकी जिम्मेदारियों का हिसाब जोड़ दिया गया। समधी पक्ष के स्वागत में सम्मान भी था और मीठी छेड़छाड़ भी। ननद, भाभी, देवर, मामा और फूफा- कोई भी गीत की पहुंच से बाहर नहीं रहता था।
यही कारण है कि गौनहारियों का गीत केवल सुना नहीं जाता था, पूरे परिवार द्वारा जिया जाता था। वह किसी अनजान फिल्मी कहानी पर नहीं, उसी घर के लोगों पर बनता था। और विवाह के माहौल की खुशी को दोगुना कर देता था।
घुड़चढ़ी नाच में क्या था खास
उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग ने भी गौनहारियों की परंपरा का उल्लेख किया है। इसे 'गौनहारियों का नाच (घुड़चढ़ी नाच)' बताते हुए प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपरा से जोड़ा है। इसका प्रमुख अवसर दूल्हे की घुड़चढ़ी माना जाता है।
वैसे इस नाच के लिए बड़े मंच की जरूरत नहीं पड़ती थी। ढोलक की थाप और तालियों की संगत पर्याप्त होती। गौनहारियां घेरा बनाकर या आमने-सामने खड़ी होकर गातीं और सहज भाव से कदम मिलातीं। प्रस्तुति और दर्शकों के बीच कोई दीवार नहीं थी। घर की दूसरी महिलाएं भी धीरे-धीरे इसमें शामिल हो जातीं।
यह नृत्य अपनी मुद्राओं से ज्यादा उस सामूहिक ऊर्जा के कारण खास था, जो पूरे आंगन को अपने भीतर खींच लेती थी।
हंसी की ओट में कही जाती थीं गंभीर बातें
गौनहारियों के इन गीतों में हंसी खूब थी, मगर वे केवल हंसाने के लिए नहीं थे। विवाह गीत महिलाओं को बोलने के लिए एक सुरक्षित जगह भी देते थे। ससुराल का दबाव, पति की आदतें, दहेज, बेमेल विवाह और रिश्तों की उलझनें- ऐसे कई विषय चुटकियों और संकेतों के रास्ते गीत में जगह बना लेते थे।
जिस बात को रोजमर्रा की बातचीत में कहना असभ्यता माना जा सकता था, वही बात गीत में कही जाती तो लोग हंसकर सुन लेते थे। यह लोकगीतों की अपनी सामाजिक भाषा थी। यहां मनोरंजन और टिप्पणी अलग-अलग नहीं चलते थे।
गौनहारियों के पास शायद औपचारिक मंच नहीं था, लेकिन वे अपने समय की छोटी-बड़ी सच्चाइयों को सार्वजनिक आवाज जरूर देती थीं।
विवाह से बाहर भी सुनाई देती थी उनकी आवाज
गौनहारियों की पहचान केवल घुड़चढ़ी तक सीमित नहीं थी। काशी की पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं में उनका संबंध कजरी गायन और मेलों से भी दिखाई देता है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पर उपलब्ध काशी के पर्वों के विवरण में उल्लेख है कि कजरी तीज पर बनारस की गौनहारिनों के दल इकट्ठे होते थे। लोलार्क छठ के संदर्भ में लिखा गया है कि पहले यहां गौनहारियों के दल के दल कजली गाते हुए इकट्ठे होते थे।
यह छोटा-सा ऐतिहासिक उल्लेख है जो कि इस परंपरा मिलने वाले स्थान को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि गौनहारियां केवल घरों के भीतर होने वाले मांगलिक आयोजनों की कलाकार नहीं थीं। कभी शहर के मेले और सार्वजनिक सांस्कृतिक अवसर भी उनकी आवाज से आबाद होते थे।
क्या डीजे के साथ लोकगीत भी बच सकते हैं
समय के साथ शादी का संगीत बदलना स्वाभाविक है। डीजे, कोरियोग्राफ डांस और फिल्मी गीत भी आज के उत्सव की पहचान हैं। समस्या नए संगीत के आने में नहीं, पुराने गीतों के बिना दर्ज हुए चले जाने में है।
गौनहारियों की कला मौखिक परंपरा पर टिकी थी। गीत एक पीढ़ी ने दूसरी से सुनकर सीखे। जब यह क्रम टूटता है तो केवल कुछ धुनें नहीं, उनके भीतर दर्ज स्थानीय शब्द, रिश्तों की भाषा और स्त्रियों के अनुभव भी गायब हो जाते हैं।
इस धरोहर को बचाने के लिए केवल सांस्कृतिक मंचों पर एक प्रस्तुति करा देना पर्याप्त नहीं होगा। गांवों और कस्बों में मौजूद बुजुर्ग गायिकाओं की आवाज रिकॉर्ड करनी होगी। गीतों के अलग-अलग स्थानीय रूप लिखने होंगे। जीवित कलाकारों को सम्मान और पारिश्रमिक देना होगा।
क्योंकि गौनहारियों का नाच बीते दौर का कोई सजावटी दृश्य भर नहीं है। यह उस समय की स्मृति है, जब घर की महिलाएं ढोलक के चारों ओर बैठकर रिश्तों का हिसाब भी रखती थीं, समाज पर टिप्पणी भी करती थीं और जाते हुए दूल्हे को हंसी के साथ जीवन की पहली सीख भी दे देती थीं।
