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चोरी होने के बाद कहां चले जाते हैं दुनिया के सबसे कीमती हीरे, आज भी रहस्य है इन शाही खजानों की चोरियां

इतिहास गवाह है कि अधिकांश मामलों में तिजोरियों से गायब हुए ये शाही शाहकार रहस्य के घने कोहरे में हमेशा के लिए खो जाते हैं।

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कहां गायब हो जाते हैं ये शाही जेवरात (AI Image)

शाही खजानों की चोरी से लगभग दुनिया का हर राजपरिवार पीड़ित रहा है। दरअसल शाही खजानों में रखे उन बेशकीमती आभूषणों के साथ इतिहास भी जुड़ा होता है। इसीलिए जब ऐसी अनमोल चीजें गायब होती हैं तो उसके साथ इतिहास का एक हिस्सा भी गायब हो जाता है। भारत समेत दुनिया के तमाम राजघरानों के ऐसे कई ताज, हार और हीरे-जवाहरात हैं, जिनका आज कोई सुराग नहीं मिलता। दशकों बाद कुछ शाही गहनों का पता तो चला लेकिन वो उस हालात में नहीं मिले जैसे गायब हुए थे।

बहुत से लोगों के मन में ये सवाल यह उठता है कि चोरी के बाद आखिर ये बेहद चर्चित, आसानी से पहचान लिये जाने वाले और अनमोल शाही आभूषण कहां चले जाते हैं? इतिहास गवाह है कि कई बार दशकों बाद अचानक कोई गायब हुआ रत्न किसी दूर दराज के देश की नीलामी में सामने आ जाता है, लेकिन अधिकांश मामलों में तिजोरियों से गायब हुए ये शाही शाहकार रहस्य के घने कोहरे में हमेशा के लिए खो जाते हैं।

पटियाला नेकलेस

पटियाला रियासत के महाराजा भूपिंदर सिंह ने 1920 के दशक में कार्टियर से एक भव्य नेकलेस बनवाया था। 1928 में तैयार हुए इस हार में करीब 2,930 हीरे और कई बड़े रत्न लगाए गए थे। इस हार की सबसे बड़ी खासियत थी इसमें लगा 234.65 कैरेट का डी बीयर्स हीरा।

1948 के आसपास पटियाला के शाही खजाने से यह नेकलेस गायब हो गया। कई दशकों तक उसका कोई पता नहीं था। 1982 में इसका मशहूर डी बीयर्स हीरा अलग से नीलामी में दिखाई दिया। फिर 1998 में लंदन की एक सेकंड हैंड ज्वेलरी शॉप में कार्टियर के एक प्रतिनिधि को हार के कुछ हिस्से मिले।

पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह (बाएं) और उनके बेटे महाराजा यदविंदर सिंह, जिन्होंने 1928 में कार्टियर द्वारा तैयार कराया गया मशहूर 'पटियाला नेकलेस' पहना हुआ है।

पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह (बाएं) और उनके बेटे महाराजा यदविंदर सिंह, जिन्होंने 1928 में कार्टियर द्वारा तैयार कराया गया मशहूर 'पटियाला नेकलेस' पहना हुआ है।

कार्टियर ने इसे दोबारा तैयार किया, लेकिन असली रत्नों की जगह कई जगह नकली या आधुनिक पत्थर लगाने पड़े। शाही खजानों की चोरी की जो दुनिया है उसका एक बड़ा सच ये भी है कि उसे तोड़ फोड़कर अलग कर दिया जाता है, ताकि कोई उसे पहचान ना सके।

नवानगर नेकलेस

महाराजा रणजीत सिंहजी जडेजा के लिए कार्टियर ने 1931 में नवानगर का मशहूर सेरेमोनियल नेकलेस तैयार किया था। इसमें 600 कैरेट से ज्यादा के हीरे लगाए गए थे। इनमें 136.32 कैरेट का खास रणजीतसिंहजी डायमंड भी था। कार्टियर के अपने रिकॉर्ड में इस नेकलेस को बेहद खास बताया गया। जैक्स कार्टियर ने इसे कलेक्शन का सबसे नायाब नमूना कहा था। यह नेकलेस अचानक से शाही तिजोरी से गायब हो गया।

आज करीब 100 साल बाद भी इस हार का कहीं कोई सुराग नहीं मिल पाया। यह बेशकीमती हार ना तो कभी किसी ब्लैक मार्केट में दिखा ना ही कभी इसकी कही नीलामी हुई। इसके गायब होने का रहस्य आज तक बना हुआ है।

ग्रेट मोगुल डायमंड

गायब हो गए कुछ राजसी गहनों की कहानी तो इतनी पुरानी है कि उनके बारे में जानकारी भी यात्रियों और इतिहासकारों के लिखे रिकॉर्ड से मिलती है। ऐसा ही एक नाम है ग्रेट मोगुल डायमंड। 17वीं सदी में फ्रांसीसी यात्री और जौहरी जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर ने मुगल दरबार में इस हीरे को देखा था। उन्होंने इसका वजन करीब 280 कैरेट बताया। उन्होंने इसके आकार की तुलना आधे कटे अंडे से की थी।

1739 में नादिर शाह के दिल्ली आक्रमण के दौरान मुगल खजाने का बड़ा हिस्सा लूट लिया गया। ग्रेट मोगुल डायमंड भी इसी दौर के बाद रिकॉर्ड से गायब हो जाता है। क्या वह किसी दूसरे हीरे में बदल गया? क्या उसे काटकर कई पत्थर बना दिए गए? क्या उसे टुकड़ों में अलग-अलग करके बेचा गया? इन सवालों के कई जवाब दिए गए हैं, लेकिन कोई भी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है।

आयरिश क्राउन जूएल्स

इतिहास की सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी चोरियों में से एक है 'आयरिश क्राउन जूएल्स' का गायब होना। इस ताज में बहुमूल्य हीरे, माणिक और पन्ने जड़े हुए थे, जिनकी कीमत उस दौर में भी करोड़ों में थी।

1907 में आयरिश क्राउन ज्वेल्स की चोरी के बाद डबलिन कैसल पुलिस द्वारा जारी किया गया एक नोटिस। (फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स)

1907 में आयरिश क्राउन ज्वेल्स की चोरी के बाद डबलिन कैसल पुलिस द्वारा जारी किया गया एक नोटिस। (फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स)

यह खजाना डबलिन कासल के एक लोहे की तिजोरी में सुरक्षित रखा गया था। जुलाई 1907 में, किंग एडवर्ड सप्तम के आगमन से ठीक कुछ दिन पहले, जब तिजोरी खोली गई तो अधिकारियों के पैर तले जमीन खिसक गई। पूरा खजाना गायब था। इस चोरी की खास बात यह थी कि तिजोरी का ताला बिना तोड़े, बिना किसी तोड़-फोड़ के चाबी से खोला गया था।

शेरलॉक होम्स के रचयिता प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक सर आर्थर कॉनन डॉयल ने भी इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की थी। उनका निष्कर्ष था कि ये चोरी अंदर के किसी शख्स ने की है। हैरत की बात ये है कि आज 100 से अधिक साल बीत जाने के बाद भी आयरिश क्राउन जूएल्स का एक भी टुकड़ा बरामद नहीं हो सका है।

ड्रैस्डन ग्रीन वॉल्ट चोरी

अगर आपको लगता है कि शाही चोरियां केवल 100 साल पहले होती थीं, तो जर्मनी के ड्रैस्डन शहर की ग्रीन वॉल्ट की चोरी आपको हैरान कर देगी। नवंबर 2019 में हुई यह घटना आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी और दुस्साहसिक डकैतियों में से एक मानी जाती है।

चोरों ने तड़के म्यूजियम के पास के पावर स्टेशन में आग लगाकर बिजली गुल कर दी। इसके बाद वे ग्रिल काटकर अंदर घुसे, केवल 5 मिनट के भीतर कुल्हाड़ी से शीशे के केस तोड़े और 18वीं शताब्दी के 4,300 से अधिक हीरों से जड़े 21 दुर्लभ शाही आभूषण समेटकर रफूचक्कर हो गए। चुराए गए खजाने का ऐतिहासिक मूल्य करीब 9,000 करोड़ रुपये आंका गया था।

हालांकि बाद में जर्मन पुलिस ने रेमो नेटवर्क नाम के संगठित आपराधिक गिरोह के सदस्यों को गिरफ्तार किया और कुछ क्षतिग्रस्त गहने बरामद भी किए, लेकिन कई सबसे कीमती और मशहूर रत्न हमेशा के लिए गायब हो गए।

कहां गायब हो जाते हैं शाही खजाने से चोरी हुए गहने (AI Image)

कहां गायब हो जाते हैं शाही खजाने से चोरी हुए गहने (AI Image)

आखिर कहां चले जाते हैं ये चोरी हुए शाही जेवरात?

एक सामान्य व्यक्ति के मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि जब कोई हीरा या हार पूरी दुनिया में मशहूर है, तो चोर उसे बेचते कैसे हैं? कोई भी वैध व्यापारी या नीलामी घरइन्हें खुले तौर पर नहीं खरीद सकता। क्राइम एक्सपर्ट्स और लेखक टोनी मैकनॉटन की चर्चित किताब 'Art Theft and the Black Market' के अनुसार, चोरी हुए शाही जेवरात मुख्य रूप से 3 रास्तों से होकर गुजरते हैं:

पिघलाना और री-कटिंग

चोरों के लिए सबसे बड़ा खतरा उन शाही गहनों की पहचान होती है। इसलिए, वे सबसे पहले सोने या प्लेटिनम की शाही सेटिंग्स को पिघला देते हैं। इसके बाद, बड़े और मशहूर हीरों को काटकर कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल दिया जाता है। एक बार जब किसी ऐतिहासिक हीरे को दोबारा तराश दिया जाता है, तो उसकी मूल पहचान मिट जाती है और उसे आम बाजार में बेचना आसान हो जाता है।

अंडरवर्ल्ड और ब्लैक मार्केट का कोलैटरल

कई बार ये खजाने पारंपरिक तरीके से बेचे ही नहीं जाते। इंटरनेशनल ड्रग कार्टल या फिर हथियारों के सौदागर इन अनमोल रत्नों का इस्तेमाल आपस में गारंटी के रूप में करते हैं। जब कोई बहुत बड़ा अवैध सौदा होता है, तो नकद पैसे के बजाय इन अज्ञात हीरों का लेनदेन किया जाता है।

सनकी प्राइवेट कलेक्टर्स

दुनिया में कुछ बेहद अमीर और सनकी कला-प्रेमी ऐसे भी हैं जो केवल अपने प्राइवेट म्यूजियम के लिए ऐसे चोरी किए गए खजाने को करोड़ों रुपये में खरीद लेते हैं। ये खजाने किसी गुप्त बेसमेंट या तिजोरी में बंद हो जाते हैं, जिन्हें दुनिया का कोई अन्य इंसान कभी नहीं देख पाता।

जब से इस धरती पर इंसान और उसकी जरूरतें बढ़ी हैं तब सो चोरियां होती आ रही हैं। हालांकि साधाराण चोरियों और शाही खजानों से चोरी में जमीन आसमान का अंतर होता है। वो इसलिए कि ये शाही गहने अपने अंदर किसी युग का इतिहास, किसी वंश की परंपरा और उस दौर की संस्कृति को समेटे होते हैं। जब कोई चोर किसी ऐतिहासिक हीरे को तराश कर छोटा कर देता है या सोने के ढांचे को पिघला देता है, तो वह इंसानियत के एक सांस्कृतिक धरोहर को भी हमेशा के लिए नष्ट कर देता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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