राजस्थान की पहचान भले दूर-दूर तक फैले रेगिस्तान से हो लेकिन यहां लोक कलाओं का रंग ऐसा है कि एक बार चढ़ जाए तो फिर उतरना मुश्किल है। राजा-रजवाड़ों की इस धरती से ना जाने कितने ही ऐसे अमर लोकगीत निकले हैं जो इस रेगिस्तानी जीवन की चलती-फिरती कहानी हैं। कहीं पनघट पर पानी भरती महिलाएं अपने मन की बात कहती हैं, तो कहीं सावन, तीज और गणगौर के गीतों में मौसम और उत्सव की खुशी झलकती है। इन गीतों की खासियत यह भी है कि इन्हें पीढ़ियों ने किताबों से ज्यादा अपनी आवाज और यादों के जरिए बचाकर रखा।
वीरों की इस धरती से निकला ऐसा ही लोकगीत है रेलगाड़ी। ढोलक की हर एक थाप और सहमी हुई सुरीली आवाजों के बीच जब 'रेलगाड़ी' गूंजता है, तो पूरा माहौल एक अजीब सी कशिश से भर जाता है। पहली ही झनकार में यह गीत दिल को छू लेता है और ऐसा लगता है मानो शादी की शहनाइयों के बीच बसा कोई खुशियों का आशियाना हो। मगर इन सुरों के पीछे छिपा है एक नई नवेली दुल्हन के अनकहे दर्द से भरा एहसास, जो समाज की ऊंची दीवारों के पीछे घुटकर रह गया।
धोरां रे धोरां मा मारी रेलगाड़ी चाले Lyrics
यह अमर लोकगीत उस दुल्हन के दिल की वो भावुक पुकार है, जिसे उसने अपनी मेहंदी से सजे हाथों से सुरों की पावन चादर में सहेजकर दुनिया के सामने रखा है। पढ़ें इस गीत के बोल:
धोरां रे धोरां मा मारी रेलगाड़ी चाले
धोरां रे धोरां मा मारी रेलगाड़ी चाले
ओ म्हारो बाबुडो टिकटिया मांगे रे माँ
ओ म्हारो बाबुडो टिकटिया मांग रे माँ
देवे नी रे गाडकी को भाड़ियो नी
मन्नो देवे नी रे गाडकी को भाड़ियो
बाबोसा बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
बाबोसा बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
ओ मुन्नो अलगि क्यों परनाई रे मां
अलगि क्यों परनाई रे मां
देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो
मन्नो देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो
ओ पियोसा रे बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
पियोसा रे बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
ओ मन्नो अलगि क्यों परनाई रे माँ
अलगि क्यों परनाई रे माँ
देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो
मन्नो देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो
काकोसा रे बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
काकोसा रे बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
ओ मन्नो अलगि क्यों परनाई रे मां
अलगि क्यों परनाई रे मां
देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो
मन्नो देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो
मामोसा रे बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
मामोसा रे बाईसा रा दमड़ा रा लोभी
ओ मन्नो अलगि क्यों परनाई रे मां
अलगि क्यों परनाई रे मां
देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो
मन्नो देवे नी रे गाढ़की भाड़ियो

(AI Generated and Newsroom Verified Image)
जब रेगिस्तान की रेलगाड़ी ने जगाई मायके जाने की उम्मीद
यह उस दौर की बात है जब राजस्थान के तपते रेगिस्तान और दूर-दराज के गांवों तक पहली बार रेल की पटरियां बिछ रही थीं। जब लोहे का वह काला इंजन धुंआ उड़ाते हुए छुक-छुक करता निकला, तो गांव की औरतों के लिए वह एक नया सवेरा लेकर आया।
ससुराल की बंदिशों और चारदीवारी में सिमट चुकी बेटियों के लिए वह ट्रेन मायके की गलियों से जुड़ने वाली एक अनमोल डोर बन गई। बचपन के दिन, मां का दुलार, सहेलियों की मंडली..यह सब कुछ उस छुक-छुक की आवाज में गूंजने लगता। पर इन सब के बीच एक बड़ी दीवार खड़ी थी। ये दीवार थी ससुराल के कठोर रवैये और मायके तक जाने के लिए पैसों के कमी की।
मायके जाने की तड़प और पाई-पाई की मोहताजी
इस लोकगीत की कहानी जिस दुल्हन के इर्द-गिर्द घूमती है, उसकी मजबूरी कलेजा चीर देने वाली है। उसका पति काम के सिलसिले में कहीं दूर परदेस गया है और घर के फैसलों में उस बहू की कोई गिनती ही गायब है। ससुराल वाले उसे मायके भेजने के ख्याल से ही कतराते हैं। आलम यह है कि उसे ट्रेन का टिकट खरीदने के लिए कुछ रुपये तक देने में आनाकानी की जाती है।
अपनी इस विवशता और मायके पहुंचने की तीव्र उत्कंठा को उसने एक अति-संवेदनशील गीत में पिरो दिया। वह गाती है कि कैसे उसके गांव के पास से रेलगाड़ी गुजर जाती है और हाथ खाली होने के कारण वह केवल उस गाड़ी को दूर से ओझल होते हुए देखने के लिए विवश है।
गांव की औरतों का खामोश हथियार था यह लोकगीत
हमारे समाज में सदियों से औरतों ने अपने सुख-दुख को व्यक्त करने के लिए गीतों का सहारा लिया है। जिस दौर में ससुर, जेठ या पति के सामने धीमी आवाज में बोलना ही मर्यादा माना जाता था, उस दौर में ये लोकगीत उनकी बात कहने का सबसे सुरक्षित जरिया बने।

महिलाओं की आवाज थें ये लोकगीत (AI Generated and newsroom verified image)
जब गांव की औरतें एक साथ बैठतीं, तो हंसी-मजाक और ढोलक की धुन के बीच अपनी आपबीती पिरो देतीं। इसे आप औरतों की एक गुप्त अभिव्यक्ति कह सकते हैं। यहां दिल का हर भाव भी छलक जाता और मर्यादा की सीमा भी बरकरार रहती। 'रेलगाड़ी' गीत भी इसी अटूट हौसले का एक खूबसूरत और मार्मिक नमूना है।
जिस दर्द पर हम झूमते हैं...
इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज भी राजस्थान की शादियों में इस गीत पर लोग खुलकर झूमते हैं। ढोल बजते हैं, पैर थिरकते हैं और माहौल खुशनुमा हो जाता है। लेकिन हम एक बार भी नहीं सोचते कि जिस धुन पर हम नाच रहे हैं, वह असल में किसी बिटिया की आंखों से छलके आंसुओं की मूक पुकार है। समाज ने औरतों की इन मजबूरियों को इतनी चालाकी से परंपरा और संस्कृति के रंग में रंग दिया कि किसी का भी ध्यान उस गहराई तक पहुंचने से चूक गया।
क्या सबक सिखाता है ये गीत
आज ट्रेनें सुपरफास्ट हो चुकी हैं, दूरियां सिमट गई हैं और औरतें अपने फैसलों में पूरी तरह सक्षम हैं। फिर भी यह पारंपरिक लोकगीत हमें बहुत बड़ा पाठ सिखाता है। पहला है आर्थिक स्वावलंबन की कीमत। एक स्त्री का अपने पैरों पर खड़ा होना पैसा कमाने के साथ ही अपनी आत्म-संतुष्टि और इच्छाओं को पूरा करने का सबसे सरल जरिया भी है।
कुल मिलाकर यह लोकगीत भारतीय समाज में स्त्रियों की अनसुनी सिसकियों और खामोश संघर्षों का एक करुण दस्तावेज है। आज के समय में इस गीत की असली सार्थकता तभी है जब हम हर स्त्री के आत्म-सम्मान, उसकी स्वाधीनता और उसकी इच्छाओं की कद्र करें। इस गीत का सबसे बड़ा सबक यही है कि बतौर समाज हमारा जमीर यह संकल्प ले कि अब किसी बेटी को अपने ही सपनों और अपनों से मिलने के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।
