अगर आप भी किसी किराए के मकान या दुकान में रहते हैं, तो यह खबर आपके लिए बहुत काम की है। कई लोग समझते हैं कि हाथ में एक साइन किया हुआ किराएनामा (Rent Agreement) और बाहर लगा दुकान का बोर्ड ही उन्हें कानूनी सुरक्षा देने के लिए काफी है। लेकिन मद्रास हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने यह साफ कर दिया है कि अगर आपके पास मकान मालिक और किराएदार के रिश्ते का पक्का सबूत नहीं है, तो कोर्ट आपको अनाधिकृत कब्जाधारी (Unauthorised Occupant) मानेगा और आपको प्रॉपर्टी से बाहर निकाले जाने से कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी। ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस आर. शक्तिवेल ने 21 सितंबर 2026 को सुनाए अपने फैसले में एक किराएदार की याचिका खारिज कर दी। यह कानूनी लड़ाई साल 1989 से यानी करीब 37 सालों से चली आ रही थी।
मामला क्या था और विवाद कैसे शुरू हुआ?
यह पूरा मामला तमिलनाडु के कांतासामी वाथियार स्ट्रीट का है। यहां दुरई नाम के एक व्यक्ति ने खुद को किराएदार बताते हुए कोर्ट में याचिका दायर की थी। दुरई का कहना था कि संपत्ति के मालिक के भाई सिदानंदन ने उनके साथ एक रेंट एग्रीमेंट साइन किया था और उन्हें दुकान किराए पर दी थी। साल 1989 में जब असली मकान मालिक सदासिवम और उनके बेटों ने जमीन पर बने पेड़ हटाए और दुरई को वहां से खाली कराने की कोशिश की, तो मामला पुलिस थाने पहुंचा। धर्मपुरी पुलिस स्टेशन ने दोनों पक्षों को कोर्ट जाने की सलाह दी, जिसके बाद दुरई ने कोर्ट से स्टे की मांग की ताकि उन्हें बेदखल न किया जा सके।
फैमिली ट्री और मालिकाना हक की पेचिदगी
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक इस विवाद की जड़ें पारिवारिक झगड़े से जुड़ी हुई थीं। इस परिवार में चार भाई थे बसवराज, सदासिवम, दुरईसामी और सिदानंदन। जिस जमीन पर विवाद था, उसका असल मालिकाना हक सदासिवम के पास था। सदासिवम ने अपने भाई सिदानंदन को सिर्फ दुकान चलाने के लिए उस जगह का एक हिस्सा इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी। कानून की भाषा में इसे 'परमिसिव पसेशन' यानी 'सहमति से रहने की इजाजत' कहते हैं। सिदानंदन खुद उस जमीन का मालिक नहीं था, लेकिन उसने दुरई के साथ एक बिना रजिस्टर्ड (Unregistered) किराएनामा कर लिया। उधर भाइयों के बीच भी जमीन के मालिकाना हक को लेकर केस चल रहा था, जिसमें 18 मार्च 2026 को हाईकोर्ट ने सदासिवम के पक्ष में ही फैसला सुनाया।
किराएदार कोर्ट में क्यों हारा केस?
मद्रास हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि किराएदार दुरई के दावों में कई बड़ी खामियां थीं।
- मालिक के अधिकार पर सवाल:- कोर्ट ने माना कि सिदानंदन को सिर्फ दुकान चलाने की अनुमति मिली थी, उसे जमीन किसी और को किराए पर देने का कोई कानूनी हक नहीं था।
- किराया देने का कोई सबूत नहीं:- रेंट एग्रीमेंट में 150 रुपये महीना किराया तय था, लेकिन दुरई यह साबित करने में नाकाम रहे कि उन्होंने कभी सिदानंदन या असली मालिक को किराया चुकाया भी था। उन्होंने न तो बैंक ट्रांसफर का रिकॉर्ड दिखाया और न ही कोई रसीद।
- गवाह को पेश न करना:- दुरई ने कोर्ट में सिदानंदन को गवाह के तौर पर पेश ही नहीं किया, जिसने रेंट एग्रीमेंट पर दस्तखत किए थे।
- कागजातों और दावों में फर्क:- दुरई का रेंट एग्रीमेंट 18 बाई 13 फीट की दुकान का था, जबकि वे कोर्ट में 60 बाई 60 फीट के बड़े प्लॉट पर अपना दावा ठोक रहे थे।
- अदालत में किराया जमा न कराना:- जब जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद था, तब भी किराएदार ने अपनी नीयत साफ करने के लिए कोर्ट में किराया जमा नहीं कराया।
कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति बिना अधिकार के जमीन पर बैठा है, वह असली मालिक के खिलाफ कोर्ट से सुरक्षा (इंजंक्शन) नहीं मांग सकता।
37 साल लंबी लड़ाई का दुखद पहलू
इस केस का एक मानवीय और दुखद पहलू यह भी है कि यह मुकदमा 1989 में दायर हुआ था और फैसला 2026 में आया। इस लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान मूल किराएदार दुरई की मौत हो गई। उनके बाद उनकी पत्नी और बच्चों ने इस अपील को आगे बढ़ाया, लेकिन अंत में कोर्ट ने उन्हें अवैध कब्जाधारी मानते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।
किराएदारों के लिए कानूनी सलाह और जरूरी बातें
कानून के एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस फैसले से हर किराएदार को सबक लेना चाहिए। किसी भी प्रॉपर्टी को किराए पर लेने से पहले यह पक्का करें कि जिस व्यक्ति से आप एग्रीमेंट कर रहे हैं, क्या वह खुद प्रॉपर्टी का असली मालिक है या उसके पास किराए पर देने का कानूनी अधिकार है। हालांकि भारत में 11 महीने का अनरजिस्टर्ड रेंट एग्रीमेंट आम बात है, लेकिन किसी भी बड़े या व्यावसायिक सौदे में वकील की सलाह लेकर सही स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन कराना सुरक्षित रहता है। किराया हमेशा बैंक ट्रांसफर, यूपीआई या चेक से दें। अगर नकद दे रहे हैं तो मकान मालिक से दस्तखत की हुई रसीद जरूर लें। अगर मकान मालिक या कोई अन्य पक्ष आपको कानूनी नोटिस भेजता है, तो उसका जवाब जरूर दें। विवाद की स्थिति में कोर्ट में किराया जमा करके अपनी नीयत साबित की जा सकती है।
