Mahatma Gandhi Shayari, Poetry, Poem in Hindi, Gandhi Ji ke liye Shayari: महात्मा गांधी ना सिर्फ आजादी के सबसे बड़े जननायक थे बल्कि वह बेहद असरदार और लोकप्रिय समाज सुधारक भी थे। बापू ने कई सामाजिक कुरीतियों को जड़ से खत्म करने में बड़ा योगदान दिया। महात्मा गांधी हमेशा कहा करते थे कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण तब तक नहीं हो सकता जब तक उस देश के अंतिम व्यक्ति खुश ना हो। महात्मा गांधी का जीवन ही अपने आप में एक मिसाल है। किस तरह से बापू ने सत्य और अंहिसा के मार्ग पर चलते हुए असंभव सी लग रही लड़ाइयों को जीता।
1. 'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
ख़त्म करो तहज़ीब की बात
बंद करो कल्चर का शोर
सत्य अहिंसा सब बकवास
हम भी क़ातिल तुम भी चोर
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
वो बस्ती वो गाँव ही क्या
जिस में हरीजन हो आज़ाद
वो क़स्बा वो शहर ही क्या
जो न बने अहमदाबाद
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो
दोनों का क्या काम यहाँ
अब के बरस भी क़त्ल हुई
एक की शिकस्ता इक की ज़बाँ
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
- साहिर लुधियानवी
2. तिरे मातम में शामिल हैं ज़मीन ओ आसमाँ वाले
अहिंसा के पुजारी सोग में हैं दो जहाँ वाले
तिरा अरमान पूरा होगा ऐ अम्न-ओ-अमाँ वाले
तिरे झंडे के नीचे आएँगे सारे जहाँ वाले
मिरे बूढ़े बहादुर इस बुढ़ापे में जवाँ-मर्दी
निशाँ गोली के सीने पर हैं गोली के निशाँ वाले
निशाँ हैं गोलियों के या खिले हैं फूल सीने पर
उसी को मार डाला जिस ने सर ऊँचा किया सब का
न क्यूँ ग़ैरत से सर नीचा करें हिन्दोस्ताँ वाले
मिरे गाँधी ज़मीं वालों ने तेरी क़द्र जब कम की
उठा कर ले गए तुझ को ज़मीं से आसमाँ वाले
ज़मीं पर जिन का मातम है फ़लक पर धूम है उन की
ज़रा सी देर में देखो कहाँ पहुँचे कहाँ वाले
पहुँचता धूम से मंज़िल पे अपना कारवाँ अब तक
अगर दुश्मन न होते कारवाँ के कारवाँ वाले
सुनेगा ऐ 'नज़ीर' अब कौन मज़लूमों की फ़रियादें
फ़ुग़ाँ ले कर कहाँ जाएँगे अब आह-ओ-फ़ुग़ाँ वाले
- नजीर बनारसी
3. शब-ए-एशिया के अँधेरे में सर-ए-राह जिस की थी रौशनी
वो गौहर किसी ने छुपा लिया वो दिया किसी ने बुझा दिया
जो शहीद-ए-ज़ौक़-ए-हयात हो उसे क्यूँ कहो कि वो मर गया
उसे यूँ ही रहने दो हश्र तक ये जनाज़ा किस ने उठा दिया
तिरी ज़िंदगी भी चराग़ थी तेरी गर्म-ए-ग़म भी चराग़ है
कभी ये चराग़ जला दिया कभी वो चराग़ जला दिया
जिसे ज़ीस्त से कोई प्यार था उसे ज़हर से सरोकार था
वही ख़ाक-ओ-ख़ूँ में पड़ा मिला जिसे दर्द-ए-दिल ने मज़ा दिया
जिसे दुश्मनी पे ग़ुरूर था उसे दोस्ती से शिकस्त दी
जो धड़क रहे थे अलग अलग उन्हें दो दिलों को मिला दिया
जो न दाग़ चेहरा मिटा सके उन्हें तोड़ना ही था आइना
जो ख़ज़ाना लूट सके नहीं उसे रहज़नों ने लुटा दिया
वो हमेशा के लिए चुप हुए मगर इक जहाँ को ज़बान दो
वो हमेशा के लिए सो गए मगर इक जहाँ को जगा दिया
- नुशूर वाहिदी
4. वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न
मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन
वही ज़मीं, वहीं ज़माँ, वही मकीं, वही मकाँ
मगर सुरूर-ए-यक-दिली, मगर नशात-ए-अंजुमन
वही है शौक़-ए-नौ-ब-नौ, वही जमाल-ए-रंग-रंग
मगर वो इस्मत-ए-नज़र, तहारत-ए-लब-ओ-दहन
तरक़्क़ियों पे गरचे हैं, तमद्दुन-ओ-मुआशरत
मगर वो हुस्न-ए-सादगी, वो सादगी का बाँकपन
शराब-ए-नौ की मस्तियाँ, कि अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ
मगर वो इक लतीफ़ सा सुरूर-ए-बादा-ए-कुहन
ये नग़्मा-ए-हयात है कि है अजल तराना-संज
ये दौर-ए-काएनात है कि रक़्स में है अहरमन
हज़ार-दर-हज़ार हैं अगरचे रहबरान-ए-मुल्क
मगर वो पीर-ए-नौजवाँ, वो एक मर्द-ए-सफ़-शिकन
वही महात्मा वही शहीद-ए-अम्न-ओ-आश्ती
प्रेम जिस की ज़िंदगी, ख़ुलूस जिस का पैरहन
वही सितारे हैं, मगर कहाँ वो माहताब-ए-हिन्द
वही है अंजुमन, मगर कहाँ वो सद्र-ए-अंजुमन
- जिगर मुरादाबादी
