Dowry Deaths in India: हर साल देश में हजारों बेटियां दहेज की आग में अपनी जिंदगी खो देती हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में देशभर में 5737 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज हुई। अकेले उत्तर प्रदेश में 2038 बेटियों ने अपनी जान गंवाई। शादी के बाद दहेज के लिए कहीं उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, कहीं तानों और अपमान के बीच जीने पर मजबूर किया जाता है, तो कहीं उनकी मौत को हादसा कहकर छिपा दिया जाता है।
भोपाल की ट्विशा शर्मा और नोएडा की दीपिका नागर जैसी लड़कियों की चीख कोई नहीं सुन पाता है। लेकिन अखबारों में महज खबर बनकर रह जाने वाली ये घटनाएं किसी मां-बाप की पूरी दुनिया उजाड़ देती हैं।
नोएडा गवर्नमेंट हॉस्पिटल में मनोवैज्ञानिक डॉ. नीति सिंह का कहना है कि ससुराल में लगातार ताने, तुलना, अपमान और आर्थिक मांगें बेटियों का आत्मविश्वास खत्म कर देती हैं। लड़की धीरे-धीरे खुद को दोष देने लगती है। उसे लगता है शायद वही अच्छी पत्नी नहीं बन पा रही या मां-बाप पर बोझ है। यही मानसिक थकान उसे भीतर से तोड़ देती है और नतीजा अकसर वो होता है दो ट्विशा और दीपिका जैसी लड़कियों के साथ हुआ।

महज खबर बनकर रह जाती हैं बेटियां
सब जानकर भी दहेज क्यों देते हैं लड़की वाले
सबसे ज्यादा दुखदायी यह है कि कई बार दहेज लोभ के संकेत शादी से पहले ही दिखने लगते हैं, लेकिन पेरेंट्स उन्हें समाज का चलन या इतना तो होता ही है समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। बेटी की शादी, अच्छे घर का सपना और सामाजिक दबाव कई परिवारों को सच देखने नहीं देता।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे रिटायर्ड प्रोफेसर इंद्र बहादुर सिंह यादव से जब हमने इस बाबत पूछा तो उन्होंने बताया कि कई माता-पिता ससुराल में अपनी बेटी के खुशहाल जीवन के लिए इच्छा से दहेज देते हैं। वह दहेज में बड़ी रकम को अपनी बेटी के भविष्य के आराम के लिए एक बीमा पॉलिसी की तरह देखते हैं। उन्हें डर रहता है कि अगर वे अपनी बेटी को पर्याप्त दहेज के साथ नहीं भेजेंगे, तो ससुराल वाले उसे नीचा दिखाएंगे, उसका उपहास करेंगे या उसके साथ दुर्व्यवहार करेंगे।
बहुत से मामले में पेरेंट्स दहेज देने को अपनी प्रतिष्ठा से भी जोड़ते हैं। गौतम बुद्ध नगर के सूरजपुर निवासी बाबूराम जिंदल समाज सेवी हैं। उम्र में 80 के पड़ाव पर पहुंच चुके बाबूराम बताते हैं कि बनिया, ठाकुर, बाभन, गुर्जर जैसे बहुत से समुदायों में शादियां हैसियत और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन होती हैं। दहेज में भारी रकम वाली भव्य शादी को सम्मान बढ़ाने वाला तो वहीं साधारण शादी को आर्थिक तौर पर कमजोर होने की निशानी माना जाता है। जगहंसाई से बचने के लिए भी मां-बाप दहेज देते हैं, भले उन्हें कर्जा ही क्यों ना लेना पड़े।

सब जानकर भी दहेज देकर विदा कर रहे बेटी (AI Image)
हमने इस तरह की सोच पर कई मनोवैज्ञानिकों से बात की। लगभग सबने इसके फेर में फंसने वालों को यही सलाह दी कि दहेज महज पैसों की मांग नहीं है, यह एक ऐसी मानसिकता है जिसमें लड़की को इंसान नहीं, सौदे का हिस्सा समझा जाता है। इसलिए शादी तय करने से पहले यह पहचानना बेहद जरूरी है कि सामने वाला परिवार सच में रिश्ते को महत्व देता है या केवल दिखावे और लालच को।
नासमझी में बन जाते हैं दहेज का शिकार
दूसरी ओर बहुत से मां बाप बेटी की शादी यही सोचकर करते हैं ससुराल वाले सज्जन हैं। मुंह खोलकर दहेज नहीं मांग रहे। बेटी ऐसे परिवार में खुश रहेगी। लेकिन वो सज्जनता की आड़ में छिपे दहेज लोभियों के असली चेहरे को नहीं पहचान पाते। हालांकि शादी से पहले कई बार संकेत मिलते हैं कि रिश्ता जुड़ने से पहले ही अलग होने में भलाई है। लेकिन बहुत से लड़की वाले समझ नहीं पाते। बाद में उनकी ये नासमझी बेटी की जिंदगी को नर्क में बदल देती है।
कैसे पहचानें दहेज के दानवों का असली चेहरा
दहेज उत्पीड़न और उससे जुड़ी तमाम रिपोर्ट्स और जर्नल्स पढ़ने के बाद आपको हम यहां कुछ ऐसे उपाय बता रहे हैं जिससे आप शादी से पहले ही पहचान सकते हैं कि जिस घर में आप अपनी बेटी को भेज रहे हैं वो इंसान की शक्ल में छिपे दहेज के दानव तो नहीं:
1. बार-बार पैसों और स्टेटस की बातें करना
अगर लड़के वाले हर बातचीत में घर, गाड़ी, सैलरी, प्रॉपर्टी या शादी के खर्च का जिक्र करें, तो यह पहला रेड फ्लैग हो सकता है। कई परिवार सीधे दहेज नहीं मांगते, लेकिन इशारों में अपनी अपेक्षाएं जताने लगते हैं। जैसे - हमारे यहां शादी बहुत ग्रैंड होती है, लड़के की पोस्ट के हिसाब से इंतजाम होना चाहिए, लोग क्या कहेंगे अगर कुछ कम हुआ तो...ऐसी बातें संकेत हैं कि भविष्य में भी उनकी डिमांड जारी रहेगी।
2. हमें कुछ नहीं चाहिए लेकिन…
कई बार परिवार शुरुआत में कहता है कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए, लेकिन धीरे-धीरे महंगे गिफ्ट्स, फर्नीचर, ज्वेलरी या कार की बातें सामने आने लगती हैं। अगर रिश्ता तय होने के बाद अचानक खर्चों की सूची बढ़ने लगे, तो यह साफ इशारा है कि आप इस रिश्ते को तोड़ दें।

दहेज के दरिंदे शादी से पहले ही दिखाने लगते हैं रंग
3. लड़की की नौकरी और कमाई पर जरूरत से ज्यादा फोकस
अगर लड़के का परिवार बार-बार लड़की की सैलरी, बैंक बैलेंस या नौकरी के फायदे पूछे, तो सावधान हो जाना चाहिए। क्योंकि शादी जैसा रिश्ता बराबरी और सम्मान पर टिका होना चाहिए, न कि आर्थिक फायदे पर।
4. हर बात में दिखावा और तुलना
दहेज का लालची परिवार अकसर दूसरों की शादियों से तुलना करता है। वे बताते रहते हैं कि फलां रिश्तेदार को शादी में क्या मिला था या किसने कितने महंगे गिफ्ट दिए। यह मानसिकता आगे चलकर लगातार अपेक्षाओं और दबाव में बदल सकती है।
समाज के डर से ना करें समझौता
कई परिवार रिश्ता टूटने के डर से सबकुछ सह लेते हैं। उन्हें लगता है कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि लालच और अपमान की शुरुआत अगर पहले से दिख रही हो, तो शादी के बाद उसके बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है।
लड़की के घरवाले ये सोच लेते हैं कि लड़का तो ठीक है, हमारी बेटी को तो लड़के के साथ रहना है, परिवार थोड़ा लालची भी है तो क्या ही करना। लेकिन ये सोच बहुत खतरनाक साबित होती है। शादी महज दो लोगों की नहीं होती, दो परिवार भी जुड़ते हैं। लड़की के लिए मां-बाप उसके सास ससुर ही होते हैं। ऐसे में बच्ची की जिंदगी को दांव पर लगाना कहीं से समझदारी नहीं है।
डॉ. नीति का मानना है कि जरूरत पड़े तो रिश्ता तोड़ दें। ये ना सोचें कि लोग क्या कहेंगे या समाज क्या कहेगा। आपको बस ये सोचना है कि आपका एक गलत फैसला आपकी बेटी की पूरी जिंदगी बर्बाद कर सकता है। समझें कि रिश्ते प्यार से बनते हैं, लेन-देन से नहीं।

दहेज नहीं सम्मान के साथ ससुराल विदा हो बेटी (AI Image)
वहीं प्रोफेसर इंद्रबहादुर यादव कहते हैं - हमें समझना होगा कि दहेज की समस्या केवल कानून से खत्म नहीं होगी, सोच बदलने से खत्म होगी। ये सोच दहेज लेने वालों के साथ ही देने वालों को भी बदलनी होगी। अगर लड़की वाले ठान लें कि हम एक फूटी कौड़ी भी दहेज नहीं देंगे तो अपने आप मांगने वालों का मुंह बंद होता जाएगा। उन्हें भी समझ आएगा कि शादी दो परिवारों का सम्मानजनक रिश्ता है, कोई सौदा नहीं।
एक सभ्य समाज के नाते किसी भी हाल में हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हर बेटी को ऐसे घर का हक है जहां उसे उसके व्यक्तित्व, सपनों और इंसानियत के लिए अपनाया जाए, न कि उसकी कीमत लगाई जाए।
