Bewafa Kebab: कबाब- ये नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। यूं तो कई तरह के कबाब बनते हैं। हर कबाब अपने आप में एक अलग स्वाद लिये होता है। लेकिन एक तरह का कबाब ऐसा भी है, जो अपने स्वाद से पहले अपने अजीब नाम से लोगों का ध्यान खींचता है। हम बात कर रहे हैं बेवफा कबाब की। अब आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर कबाब भी कभी बेवफा हो सकता है? जब हो नहीं सकता तो इसका नाम बेवफा कबाब कैसे पड़ा। इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है, जिसका रिश्ता अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह से है।
वाजिद अली शाह खान-पान के बड़े शौकीन थे। उन्हें नए-नए तरह के व्यंजन चखने में बड़ा मजा आत। इसी लिए उनकी शाही रसोई में अकसर नए-नए प्रयोग होते रहते। नवाब शाही रसोई के बावर्चियों को आए दिन नई-नई चुनौतियां दिया करते। कभी किसी व्यंजन में नया स्वाद चाहिए होता, तो कभी कोई अनोखा रूप।
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किसी रोज की बात है जब नवाब साहब ने अपने प्रमुख रसोइए को बुलाया और कहा कि कई दिनों से कुछ अलग तरह का कबाब खाने का बड़ा मन कर रहा है। उन्होंने निर्देश दिया कि कोई ऐसा कबाब बनाया जाए जो इतना नर्म हो कि मुंह में जाते ही घुल जाए। शाही बावर्चियों ने कई दिनों तक मेहनत की। आखिरकार एक ऐसा कबाब तैयार हुआ, जो बेहद मुलायम और रसदार था। उसे खाते ही वह मुंह में घुल जाता था।
इस कबाब के साथ एक छोटी सी समस्या थी। इसका स्वाद जितनी तेजी से आता, उतनी ही जल्दी खत्म भी हो जाता था। नवाब साहब के सामने जब रसोइयों ने ये नया कबाब पेश किया तो उन्होंने एक टुकड़ा उठाया और मुंह में डाल लिया। खाने के बाद मुस्कुराते हुए कहा- यह तो बड़ा बेवफा निकला, आया और पल भर में साथ छोड़ गया। कहा जाता है कि तभी से इस खास कबाब को बेवफा कबाब कहा जाने लगा।
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यहां बताना जरूरी है कि बेवफा कबाब के नाम की ये कहानी लखनऊ में खूब प्रचलित है। हालांकि इतिहासकार मानते हैं कि इस कहानी के कई हिस्से लोककथाओं और किस्सागोई से भी जुड़े हैं। जो भी हो, करीब 250 साल बाद भी बेवफा कबाब अपने अनोखे नाम और स्वाद से लोगों को अपना मुरीद बना रहा है।
