रॉयल रसोई (Royal Rasoi): ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि खाना पेट भरने और स्वाद की चीज है। ऐसे लोग अगर अवध के नवाब रहे वाजिद अली शाही की रसोई के किस्से सुनेंगे तो उन्हें यकीन ही नहीं होगा। सबसे हैरानी की बात ये है कि शाही रसोइये पाक कला की ऐसी विधि अपनाते जहां खाना समय देखकर नहीं, संगीत के सुर और ताल के हिसाब से बनता था। अपनी खास सीरीज रॉयल रसोई में आज हम वाजिद अली शाही की उसी रसोई के किस्से बताएंगे जहां बिना संगीत के सुरों से तय होता कि आज क्या पकेगा।
कौन थे नवाब वाजिद अली शाह
वाजिद अली शाही अवध के आखिरी नवाब थे। उन्होंने 1847 से 1856 तक अवध के नवाब की गद्दी संभाली। अपने 9 साल के शासन में वाजिद अली शाह ने बहुत कुछ ऐसा किया जिसे उनसे पहले किसी राजा या नवाब ने नहीं किया था। उनके शौक भी इतने अजीब थे कि अंग्रेजों तक को हैरानी होती। इन्हीं अजीबोगरीब शौक में से एक था संगीत के सुरों से रसोई चलाना।
वाजिद अली शाह को बचपन से संगीत का बड़ा शौक था। वह जमीन पर बैठते तो पैरों से ताल देते रहते। मिर्जा अली अजहर की 'किंग वाजिद अली शाह ऑफ अवध' के मुताबिक पैरों से ताल देने की इस आदत से उनके एक उस्ताद बुरी तरह नाराज हो गए थे। उन्होंने उनके सिर पर इतने जोर से मारा कि उनके एक कान की सुनने की ताकत हमेशा के लिए चली गई।
अवध के आखिरी नवाब: वाजिद अली शाह
समय बदला। सत्ता बदली। अधिकार बदले। कुछ नहीं बदला तो वो थी संगीत के लिए वाजिद अली शाह की दीवानगी। खुद भी संगीत में पारंगत वाजिद अली शाह सुबह से शाम तक सुर ताल में डूबे रहते थे। बात भोजन की हो तो उनका मानना था कि भूख भी एक सुर है और खाना उसका राग। इसी कारण उनकी रसोई में बनने वाले हर पकवान का अपना मूड, अपना राग और अपनी कहानी होती थी।
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द लास्ट नवाब: वाजिद अली शाह ऑफ लखनऊ और मेमोरीज ऑफ सिटी जैसी किताबों में विस्तार से लिखा गया है कि कैसे नवाब साहब की शाही रसोई में हर वक्त संगीत बजता रहता। जिस तरह का संगीत होता उसी तरह का भोजन बनता।
रसोई में दिन के अलग-अलग समय के लिए अलग-अलग राग निर्धारित थे। सुबह का समय राग भैरवी का माना जाता था। इसलिए नाश्ता और सुबह का भोजन हल्का, सुगंधित और सात्विक रखा जाता था। वहीं रात में अगर राग दरबारी गूंजता तो, तो रसोई में भारी और मांसाहारी व्यंजन तैयार किए जाते थे।
वाजिद अली शाह की शाही रसोई में एक खास व्यंजन ईजाद की गई थी। इसका नाम रखा गया कोफ्ता-ए-नरगिसी। फूड हिस्टोरियन सदफ हुसैन ने अपनी किताब 'दस्तरखान-ए-अवध' में लिखा है कि जब भी वाजिद अली शाह की रसोई में कोफ्ता-ए-नरगिसी पकता हमेशा राग यमन में एक ठुमरी गाई जाती थी - नैन मिलाय के, प्रेम बताय के…।
पाक कला के साथ संगीत के भी महारथी होते थे बावर्ची (AI Image)
बावर्चियों को सिखाया जाता था संगीत
शाही बावर्ची हमेशा संगीत को समझ और उसके सुर ताल के साथ जुगलबंदी करते हुए खाना पकाया करते थे। उन्हें सिखाया गया था कि खाना संगीत सुनकर पकाया जाए, घड़ी देखकर नहीं। इसके लिए बकायदा उन्हें संगीत की ट्रेनिंग दी जाती थी।
अब्दुल हलीम शरर 'गुजिश्ता लखनऊ' में लिखते हैं कि वाजिद अली शाह की शाही रसोई में बावर्ची बनने के एक सबसे बड़ी शर्त ये थी कि आपने संगीत सीखा हो। इसी कारण रसोई के सारे बावर्ची पाक कला के साथ ही संगीत के भी महारथी होते।
वाजिद अली शाह ने अपनी रसोई में संगीत का जो अनूठा प्रयोग किया वो ना तो उनसे पहले और ना उनके बाद किसी और ने किया।
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जब लखनऊ छोड़ा, तो रसोई भी ले गए साथ
1856 में जब अंग्रेजों ने अवध पर अपना कब्जा कर लिया और वाजिद अली शाह को लखनऊ छोड़कर कोलकाता जाना पड़ा, तब वे अकेले नहीं गए। उनके साथ दरबारी कलाकार, कथक नर्तक, शायर, संगीतकार, जनानखाना और पूरी शाही रसोई भी गई।
अपनी रानियों के साथ नवाब वाजिद अली शाह
कहा जाता है कि उन्होंने कोलकाता के मटियाबुर्ज में एक छोटा-सा लखनऊ बसाने की कोशिश की। यही कारण है कि आज भी कोलकाता की बिरयानी, कबाब और कई पाक परंपराओं में वाजिद अली शाह की रॉयल रसोई की छाप दिखाई दे जाती है।
