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अंकुर वारिकू का पैरेंटिंग मंत्र, जानिए क्यों हर माता-पिता को अपनाने चाहिए ये 3 नियम

अंकुर वारिकू के ये 3 नियम दिखाते हैं कि आधुनिक दौर में सख्त पाबंदियों के बजाय स्पष्ट संवाद, आपसी तालमेल और सम्मान के जरिए बच्चों की बेहतर परवरिश की जा सकती है।

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अंकुर वारिकू का पेरेंटिंग मंत्र (Photo: Ankur Warikoo Instagram)

डिजिटल क्रिएटर और उद्यमी अंकुर वारिकू अपनी लाइफस्टाइल और पर्सनल फाइनेंस की सलाह के लिए काफी लोकप्रिय हैं। वह पेरेंटिग पर भी लोगों का मार्गदर्शन करते रहते हैं। बड़ी संख्या में उनके फॉलोवर्स हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी पत्नी रूचि वारिकू के साथ मिलकर बच्चों की सही परवरिशको लेकर अपने घर के 3 खास नियम साझा किए हैं। इंटरनेट पर वायरल हो रहे इन नियमों पर पैरेंटिंग विशेषज्ञों और बाल मनोवैज्ञानिकों ने भी अपनी सहमति जताई है। आइए जानते हैं कि अंकुर और रूचि वारिकू के ये 3 पैरेंटिंग रूल्स क्या हैं और एक्सपर्ट्स इनके बारे में क्या राय रखते हैं:

'ना' का मतलब सिर्फ 'ना' है

अंकुर और रूचि का पहला नियम है कि अगर माता-पिता में से किसी एक ने बच्चे की किसी मांग पर 'ना' कह दिया, तो दूसरा पार्टनर उस फैसले को बदलेगा नहीं। अगर एक अभिभावक बच्चे को किसी चीज से मना करता है, तो बच्चा दूसरे के पास जाकर अपनी बात नहीं मनवा सकता।

एक्सपर्ट की राय: बाल विशेषज्ञों के अनुसार, माता-पिता के बीच यह तालमेल बच्चों को अनुशासन सिखाने के लिए बहुत जरूरी है। जब दोनों पेरेंट्स एक ही बात पर टिके रहते हैं, तो बच्चों को सीमाएं समझ में आती हैं और वे जिद या हेरफेर करना बंद कर देते हैं।

सार्वजनिक जगह पर कोई बहस या डांट नहीं

वारिकू दंपत्ति का दूसरा नियम यह है कि अगर बच्चा बाहर किसी सार्वजनिक जगह, पार्टी या रिश्तेदारों के सामने कोई गलती करता है, तो उसे तुरंत डांटने या उस पर गुस्सा करने से बचा जाता है। उस समय स्थिति को शांत रखा जाता है और घर वापस आकर अकेले में बच्चे से बात की जाती है।

एक्सपर्ट की राय: यह नियम बच्चे के आत्मसम्मान को बचाने में बहुत मददगार है। दूसरों के सामने डांटने से बच्चों में झिझक, गुस्सा या शर्मिंदगी की भावना पैदा होती है। शांत माहौल में अकेले में बात करने से बच्चा अपनी गलती को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाता है।

बच्चे की बात को ध्यान से सुनना और महत्व देना

तीसरा और सबसे अहम नियम है कि जब भी बच्चा अपनी कोई बात, परेशानी या दिनभर का अनुभव साझा करना चाहता है, तो माता-पिता अपने काम छोड़कर उसे पूरी गंभीरता से सुनते हैं। उसकी भावनाओं को खारिज करने के बजाय उसे बोलने का पूरा मौका दिया जाता है।

एक्सपर्ट की राय: विशेषज्ञों का मानना है कि एक्टिव लिसनिंग से बच्चों में यह आत्मविश्वास जगता है कि उनकी बात और भावनाएं मायने रखती हैं। इससे माता-पिता और बच्चों के बीच भरोसे का एक मजबूत रिश्ता बनता है, जिससे बच्चे बड़े होने पर भी अपनी समस्याएं आसानी से शेयर कर पाते हैं।

कुल मिलाकर अंकुर वारिकू और रूचि के ये 3 नियम दिखाते हैं कि आधुनिक दौर में सख्त पाबंदियों के बजाय स्पष्ट संवाद, आपसी तालमेल और सम्मान के जरिए बच्चों की बेहतर परवरिश की जा सकती है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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