हाल की एक घटना से दिल्ली-एनसीआर फिर बेचैन है। वजह है एक बेटी के साथ हुई वारदात। जिसने सुना, वही कांप गया। जिस बस को एक लड़की को उसकी मंजिल तक पहुंचाना था, वही कथित तौर पर उसके लिए दरिंदगी का ठिकाना बन गई। नोएडा से दिल्ली के बीच चलती सड़क पर यह सब हुआ और एक बार फिर पूरा शहर घटना के बाद जागा। सवाल उठे। कार्रवाई के दावे हुए। निगरानी की कमियां गिनाई गईं। लेकिन कौन बताए कि घटना होने से पहले यह व्यवस्था कहां थी? बस की जांच किसने की? उसकी निगरानी कौन कर रहा था? और सबसे बड़ा सवाल, लड़की अपनी सुरक्षा के लिए आखिर और क्या करती?
इसी घटना के बीच जारी हुआ है करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन की फिल्म ‘दायरा’ का ट्रेलर। फिल्म की कहानी भी एक लड़की के साथ रूह कंपा देने वाली वारदात से जुड़ी है, जिसमें लीड किरदार अपराध, पुलिस की जांच और कानून तथा न्याय के बीच फंसे नजर आ रहे हैं।
इन दोनों खबरों ने एक साथ मिलकर एक बार फिर हमारे समाज और सिस्टम का असली ‘दायरा’ दिखा दिया है। यहां कानून की लकीरें बहुत हैं, लेकिन क्या कोई ऐसी लकीर भी है जिसके भीतर बेटी बेखौफ रह सके?
हर समय साथ है खौफ का साया
हमारे यहां हर लड़की को घर से निकलते समय एक अदृश्य नियम-पुस्तिका थमा दी जाती है।
फोन चार्ज रखना।
कैब का नंबर भेजना।
लाइव लोकेशन ऑन करना।
सुनसान रास्ते से मत जाना।
गलत नजर लगे तो सीट बदल लेना।
रात ज्यादा हो जाए तो अकेले मत लौटना।
और हां- ‘पहुंचकर फोन कर देना।’
बातें छोटी हैं। रुटीन की हैं। लेकिन गहराई से देखें तो इनमें एक मां की घबराहट है। पिता की बेचैनी है। पति का इंतजार है। सहेली का डर है। लड़की का फोन न उठे तो पहला ख्याल यह नहीं आता कि शायद फोन साइलेंट होगा। मन सीधे किसी अनहोनी की तरफ दौड़ पड़ता है। लाइव लोकेशन एक जगह अटक जाए तो नक्शे पर रुका वह छोटा-सा बिंदु पूरे परिवार की सांसें रोक देता है- कहीं किसी ने कुछ कर तो नहीं दिया!
एक बेटी के साथ हुआ अपराध कई मनोबल तोड़ देता है
शहर में बढ़ी चकाचौंध, बेटी की सुरक्षा अब भी अंधेरे में
शहर में मेट्रो दौड़ रही है। सड़कों पर कैमरे चमक रहे हैं। बसों में GPS और पैनिक बटन के दावे हैं। महिलाओं के लिए पिंक बसें हैं। हेल्पलाइन नंबर हैं। मोबाइल में सुरक्षा ऐप हैं। हर नई तकनीक के साथ सुरक्षा के दावे हैं। लेकिन लड़की के हिस्से क्या आया?
इन सबके बावजूद वही डर। वही पीछे मुड़कर देखना। वही सीट पर सिमटकर बैठना। वही किसी अनजान हाथ की हरकत को पहले समझना और फिर यह तय करना कि आवाज उठाए या चुप रहकर वहां से निकल जाए।
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चलती रही बस, सोता रहा पूरा सिस्टम
ग्रेटर नोएडा से दिल्ली की ओर जा रही स्लीपर बस में नाबालिग छात्रा से कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले ने फिर साबित कर दिया कि सड़क पर दौड़ती हर गाड़ी पर सिस्टम की नजर होने का दावा कितना खोखला हो सकता है।
घटना 4 अगस्त 2026 की बताई गई है। आरोप है कि बस के ड्राइवर और कंडक्टर ने छात्रा के साथ यौन हिंसा की, विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी और बाद में उसे कश्मीरी गेट के पास उतार दिया। पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया और मामले की जांच जारी है।
लेकिन इस केस का एक हिस्सा ऐसा है, जो घटना से आगे जाकर पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर देता है।
बस करीब 43 किलोमीटर तक चलती रही। रास्ते में सड़कें थीं। चौराहे थे। टोल और कैमरे थे। पुलिस की आवाजाही थी। नोएडा और दिल्ली की सीमाएं थीं। लेकिन बस के भीतर एक लड़की किस भय से गुजर रही थी, इसकी भनक किसी को नहीं लगी।
कैसे लगती?
बस में कथित तौर पर गहरे पर्दे लगे थे। अंदर लगा CCTV काम नहीं कर रहा था। उसकी निगरानी की व्यवस्था में भी गंभीर कमियां सामने आईं। खबरें बता रही हैं कि जिस गाड़ी को पहले ही कई यातायात उल्लंघनों के लिए चिह्नित किया गया था, वह फिर भी सड़क पर दौड़ रही थी।
तो अपराध केवल उन दो आरोपियों ने किया? या थोड़ी हिस्सेदारी उस लापरवाही की भी है, जिसने अपारदर्शी पर्दों वाली बस को चलने दिया? उस निगरानी की, जो कागजों में मौजूद थी लेकिन सड़क पर नहीं? उन चालानों की, जो कटते तो रहे मगर गाड़ी को रोक नहीं पाए?
हर घटना के बाद हम अपराधी का चेहरा खोज लेते हैं। लेकिन क्या कभी उस सुस्त व्यवस्था का चेहरा भी पहचानेंगे, जो अपराध के लिए अंधा कोना तैयार करती है?
निर्भया के बाद बदला कानून, क्या सड़क भी बदली
चलती बस। बंद पर्दे। भीतर फंसी लड़की।
इन तीन बातों का एक साथ आना देश को दिसंबर 2012 की उस रात में धकेल देता है, जिसे कोई याद नहीं करना चाहता और कोई भूल भी नहीं सकता। निर्भया केस के बाद सड़कों पर गुस्सा फूटा था। मोमबत्तियां जली थीं। नारे लगे थे। कानूनों में बदलाव हुए थे। सजा कड़ी की गई थी। महिला सुरक्षा के लिए अलग बजट, हेल्पलाइन, CCTV, GPS, पैनिक बटन और पुलिस सत्यापन के दावे सामने आए थे।
और फिर हमने मान लिया था कि अब व्यवस्था जाग गई है। लेकिन चौदह साल बाद फिर एक चलती बस कटघरे में है। फिर पर्दों के पीछे अपराध छिपा। फिर कैमरा बंद मिला। फिर कार्रवाई घटना के बाद शुरू हुई।
तो क्या बदला?
शायद मशीनें बढ़ीं, मगर निगरानी नहीं। नियम बढ़े, मगर पालन नहीं। कैमरे लगे, मगर यह देखने वाला कोई नहीं कि वे चल भी रहे हैं या नहीं। पैनिक बटन लगा देना आसान है। महीने में एक बार दबाकर जांचना मुश्किल लगता है। GPS खरीद लेना आसान है। उसकी लाइव मॉनिटरिंग के लिए जवाबदेह कंट्रोल रूम बनाना शायद ज्यादा मेहनत मांगता है।
यही फर्क है सुरक्षा के इंतजाम और सुरक्षा के प्रदर्शन में।
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मेट्रो के बाद खड़ी वह काली सड़क भी देखिए
यह तो एक घटना है जो सामने आई। लेकिन कुछ बातें घटनाओं में नहीं बदलतीं। वे हमारी आम जिंदगी का हिस्सा हैं और हर बार सिस्टम तथा समाज से सवाल करती हैं- मेरी सुरक्षा कहां है?
इस बात को ऐसे समझें कि दिल्ली मेट्रो के महिला कोच में बैठकर कोई लड़की कुछ देर सुरक्षित महसूस कर सकती है। लेकिन उसकी यात्रा ट्रेन के दरवाजे बंद होने पर शुरू और स्टेशन पर उतरने के साथ खत्म नहीं होती।
असली बेचैनी कई बार स्टेशन के बाहर इंतजार कर रही होती है।
बाहर निकली तो आधी लाइटें बंद। फुटपाथ पर अतिक्रमण। आगे सुनसान सर्विस लेन। बस स्टॉप पर कोई सुरक्षा कर्मी नहीं। ऑटो वाला किराया बताने से पहले लड़की को ऊपर से नीचे तक देख रहा है। अगर ई-रिक्शा ली तो बगल में बैठा आदमी अपनी कोहनी बार-बार उसकी तरफ खिसका रहा है। भीड़ का बहाना बनाकर किसी का हाथ उसकी निजी सीमा तोड़ रहा है।
वह समझ रही है कि यह गलती से नहीं हुआ। मगर क्या कहे?
आवाज उठाए तो सामने वाला बोलेगा- भीड़ है मैडम, लग गया होगा। बाकी यात्री उसे ही देखने लगेंगे। चुप रहे तो भीतर गुस्सा उबलेगा कि उसके शरीर को सार्वजनिक संपत्ति समझ लेने की यह हिम्मत आई कहां से? वह आज भी असुरक्षित क्यों है?
यही छोटे-छोटे हमले किसी FIR में दर्ज नहीं होते। किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस का विषय नहीं बनते। लेकिन लड़की के भीतर रोज एक नया डर छोड़ जाते हैं। अगली बार वह उसी रास्ते पर ज्यादा सतर्क होगी। बैग आगे कर लेगी। दुपट्टा समेटेगी। फोन में इमरजेंसी नंबर खोलकर रखेगी।
यानी अपराधी की जिंदगी जस की तस चलेगी। लेकिन लड़की अपनी चाल, सीट और रास्ता बदल लेगी।
पिंक बस का रंग सुरक्षा की गारंटी नहीं
पिंक बस हो, महिला स्पेशल सेवा हो या सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन का कोई और दावा- सवाल उसके रंग का नहीं, निगरानी का है।
क्या बस में लगा कैमरा चालू है? क्या उसका फुटेज सुरक्षित रहता है? पैनिक बटन दबे तो अलर्ट कहां जाता है? ड्राइवर और कंडक्टर का सत्यापन कब हुआ था? शिकायत दर्ज करने का नंबर बस के भीतर साफ दिखाई देता है? किसी महिला ने शिकायत की तो कितनी देर में प्रतिक्रिया मिली?
इन सवालों के जवाब नहीं हैं तो गुलाबी रंग केवल प्रचार है, सुरक्षा नहीं।
ऑटो और ई-रिक्शा की हालत भी अलग नहीं। कितने वाहनों पर चालक की सही पहचान साफ दिखाई देती है? कितनों की लोकेशन ट्रैक की जा सकती है? रात में मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़े अनियमित ऑटो की जांच कौन करता है? क्या शहर की सुरक्षा योजना में मेट्रो के भीतर का सफर शामिल है, लेकिन स्टेशन से घर तक का आखिरी दो किलोमीटर नहीं?
लड़की की यात्रा को टुकड़ों में बांटकर सुरक्षित नहीं किया जा सकता। मेट्रो सुरक्षित है, मगर बाहर की सड़क नहीं। कैब ट्रैक हो रही है, मगर ड्राइवर सत्यापित नहीं। बस में पैनिक बटन है, मगर काम नहीं करता। यह आधी सुरक्षा दरअसल सुरक्षा का भ्रम है।
बेटी पर नया नियम, अपराधी पर कब लगेगी पाबंदी
ऐसी कोई घटना सामने आती है और देश के हजारों घरों में बेटियों के लिए नई पाबंदियां बन जाती हैं।
अब अकेले मत जाना।
उस रूट की बस मत लेना।
देर तक ऑफिस मत रुकना।
अंधेरा होने से पहले लौट आना।
खाली वाहन में मत बैठना।
मां-बाप गलत नहीं हैं। उनका डर गलत नहीं है। लेकिन जरा इस तस्वीर को उलटकर देखिए।
अपराध किसी आदमी ने किया। रास्ता लड़की का बंद हो गया। हरकत किसी पुरुष ने की। नौकरी छोड़ने की सलाह महिला को मिली। बस में अपराध हुआ। अकेले सफर करने पर रोक बेटी की लग गई।
क्यों?
समाजशास्त्र की प्रोफेसर रीना शर्मा कहती हैं कि हर घटना के बाद परिवारों की पहली प्रतिक्रिया बेटी की आवाजाही सीमित करने की होती है। यह चिंता से उपजा कदम हो सकता है, लेकिन इससे अनजाने में यह संदेश भी जाता है कि सुरक्षित रहने की पूरी जिम्मेदारी लड़की की ही है। समाज को यह समझना होगा कि लड़की का घर से निकलना समस्या नहीं है। समस्या वह सोच और व्यवस्था है, जो उसे बराबरी और सुरक्षा के साथ सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल नहीं करने देती। पाबंदियां अपराधी पर लगनी चाहिए, बेटी की पढ़ाई, नौकरी और आजादी पर नहीं।
किसी लड़की के पंख काट देना सुरक्षा नहीं है। यह व्यवस्था की हार को परिवार के नियमों के पीछे छिपा देना है। यदि किसी सड़क पर खतरा है तो उस सड़क को सुरक्षित किया जाना चाहिए, लड़की को घर में नहीं बैठाया जाना चाहिए। यदि किसी बस ऑपरेटर ने नियम तोड़े हैं तो उसका परमिट रद्द होना चाहिए, बेटी का बाहर जाना नहीं।
अपराधी की आजादी बनी रहे और लड़की का ‘दायरा’ छोटा होता जाए- इसे सुरक्षा कैसे मान लें?
अपराध हुआ किसी और से, घर पीड़िता को छोड़ना पड़ा
इस मामले में पीड़ित परिवार के सामाजिक दखल, सवालों और पहचान उजागर होने के डर के कारण घर छोड़कर दूसरी जगह जाने की खबरें भी सामने आईं।
बस, यहीं समाज का असली चेहरा दिखता है।
अपराध लड़की ने नहीं किया। फिर भी चेहरा वही छिपाती है। घर वही छोड़ती है। स्कूल या कॉलेज जाने से वही डरती है। रिश्तेदारों की फुसफुसाहट उसी के हिस्से आती है। मोहल्ले वाले यह नहीं पूछते कि आरोपियों ने ऐसा क्यों किया। वे जानना चाहते हैं- लड़की वहां पहुंची कैसे? घर से निकली क्यों? किसके साथ झगड़ा हुआ था? पहले शिकायत क्यों नहीं की?
क्यों? क्यों? क्यों?
क्या उसके रास्ता भटक जाने से किसी को उसके शरीर पर अधिकार मिल गया? क्या अकेले होने का अर्थ असुरक्षित होने की सजा भुगतना है? क्या गलत बस में चढ़ जाना अपराधियों के लिए खुला निमंत्रण है?
पीड़िता की कहानी में ‘क्यों गई थी’ खोजने वाला समाज अनजाने में आरोपी के लिए बहाना खोजता है। शर्म अपराधी की होनी चाहिए, लेकिन लड़की के घर के दरवाजे पर जमा कर दी जाती है।
उसे कैमरा नहीं चाहिए। सहानुभूति के नाम पर घूरती नजरें नहीं चाहिए। उसकी पहचान खोजने की जासूसी नहीं चाहिए। उसे इलाज चाहिए। कानूनी मदद चाहिए। मानसिक सहारा चाहिए। और सबसे जरूरी बात—उसे यह भरोसा चाहिए कि जो हुआ, उसमें उसकी कोई गलती नहीं थी।
‘दायरा’ पर्दे पर है, असली जांच हमारे हिस्से की है
मेघना गुलजार की ‘दायरा’ बेशक एक इन्वेस्टिगेटिव क्राइम थ्रिलर है। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन पुलिस अधिकारियों की भूमिकाओं में अपराध, कानून और न्याय के उलझे सवालों से जूझते दिखाई देते हैं। फिल्म के ट्रेलर में कानूनी सीमाओं और न्याय के बीच का टकराव इसकी कहानी का अहम हिस्सा नजर आता है।
लेकिन पर्दे के बाहर भी एक जांच जरूरी है। अपने घरों की। अपनी सड़कों की। परिवहन व्यवस्था की। और उस सोच की, जो लड़की को हर समय अपनी सुरक्षा साबित करने पर मजबूर करती है।
हमने सुरक्षा को बड़े सुविधाजनक दायरों में बांट रखा है।
- घर सुरक्षित, बाहर असुरक्षित।
- दिन ठीक, रात खतरनाक।
- परिचित भरोसेमंद, अनजान संदिग्ध।
- महिला कोच सुरक्षित, सामान्य डिब्बा जोखिम भरा।
लेकिन अपराध हमारी बनाई इन सारी सीमाओं को तोड़ देता है। लड़की बस में असुरक्षित है। सड़क पर उसका पीछा होता है। मेट्रो में उसे गलत तरीके से छुआ जाता है। ऑफिस में उसके कपड़ों और शरीर पर टिप्पणी होती है। ऑनलाइन उसकी तस्वीर से छेड़छाड़ होती है। परिचित व्यक्ति उसकी ‘ना’ सुनने से इनकार कर देता है।
इन बातों का मतलब साफ है- खतरा केवल जगह में नहीं, उस सोच में है जो महिला की सहमति और निजी सीमा को महत्व नहीं देती।
पर्दे हटाने से काम नहीं चलेगा, व्यवस्था की आंखें खोलनी होंगी
बहरहाल, 4 अगस्त की घटना के बाद दिल्ली सरकार ने सभी बसों, अंतरराज्यीय बसों सहित, पर्दे और टिंटेड फिल्म हटाने तथा चालू पैनिक बटन और व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह (ओम प्रकाश सिंह) बताते हैं कि स्लीपर बसों की बनावट में यात्रियों की निजता और सुरक्षा के बीच संतुलन होना बेहद जरूरी है। पूरी तरह बंद पर्दे CCTV कैमरों और निगरानी व्यवस्था में बाधा डालने के साथ बस के भीतर ऐसे ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बना सकते हैं, जहां होने वाली गतिविधियां नजर न आएं। इसलिए स्लीपर बसों के लिए अलग और सख्त सुरक्षा मानक तय किए जाने चाहिए। इनमें चालू CCTV कैमरे, इमरजेंसी कम्युनिकेशन सिस्टम, GPS ट्रैकिंग और पैनिक बटन जैसी सुविधाएं अनिवार्य हों। व्यवस्था ऐसी हो कि यात्रियों की निजता भी बनी रहे और बस के भीतर कोई हिस्सा पूरी तरह निगरानी से बाहर भी न हो।
ओम प्रकाश सिंह इस बारे में यह भी स्पष्ट करते हैं कि ड्राइवर और कंडक्टर जैसे कर्मचारियों का केवल शुरुआती पुलिस सत्यापन करा लेना पर्याप्त नहीं है। परिवहन संचालकों के लिए एक नियमित कर्मचारी पृष्ठभूमि रजिस्ट्री और समय-समय पर दोबारा सत्यापन की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें कर्मचारी के पिछले रोजगार, कार्यस्थल पर अनुचित व्यवहार और उसके खिलाफ मिली गंभीर शिकायतों का रिकॉर्ड रखा जाए।
इसके साथ ही प्रत्येक सत्यापित कर्मचारी की पहचान, भूमिका और जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए। हालांकि, ऐसी व्यवस्था बनाते समय कर्मचारियों की निजता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का ध्यान रखना भी जरूरी है, ताकि किसी अपुष्ट शिकायत के आधार पर किसी को गलत तरीके से दोषी न ठहराया जाए।
महिलाओं से जुड़े मामले देखने वाले एडवोकेट प्रदीप मित्तल के मुताबिक, ऐसे मामलों में केवल आरोपी ड्राइवर या कंडक्टर की गिरफ्तारी से जवाबदेही पूरी नहीं हो जाती। यदि वाहन में अनिवार्य सुरक्षा उपकरण खराब थे, स्टाफ का सत्यापन अधूरा था या पहले के उल्लंघनों के बावजूद बस को चलने दिया गया, तो बस मालिक, ऑपरेटर और निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। पीड़िता नाबालिग हो तो उसकी पहचान, तस्वीर, पता, स्कूल या परिवार से जुड़ी ऐसी कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए, जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसकी पहचान सामने आए।
इस बार कार्रवाई का ‘दायरा’ बड़ा करना होगा।
- हर व्यावसायिक और अंतरराज्यीय बस में चालू CCTV, GPS और पैनिक बटन की नियमित जांच हो।
- सुरक्षा उपकरण खराब मिलने पर केवल चालान नहीं, बस का संचालन रोका जाए।
- ड्राइवर, कंडक्टर और स्टाफ का समय-समय पर पुलिस सत्यापन हो।
- बार-बार नियम तोड़ने वाले वाहन और ऑपरेटर का परमिट रद्द किया जाए।
- बस मालिक को भी लापरवाही के लिए जवाबदेह बनाया जाए।
- पर्दों और अवैध टिंट पर रोक केवल आदेश न रहे, नियमित जांच हो।
- मेट्रो स्टेशन से रिहायशी इलाकों तक सुरक्षित ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ बने।
- बस स्टॉप, सर्विस लेन और सुनसान सड़कों पर पर्याप्त रोशनी तथा कैमरे हों।
- अलग-अलग राज्यों की पुलिस अधिकार क्षेत्र में उलझने के बजाय शिकायत पर तुरंत कार्रवाई करे।
- पीड़िता को इलाज के साथ कानूनी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता मिले।
- सुरक्षा नियमों का स्वतंत्र और सार्वजनिक ऑडिट कराया जाए।
कड़ी सजा जरूरी है। लेकिन अपराध रोकने के लिए पकड़े जाने का यकीनी डर उससे भी जरूरी है। आरोपी को यह भरोसा ही न होने पाए कि पर्दे बंद हैं, कैमरा खराब है और देखने वाला कोई नहीं।
बेटियों को बचना सिखाया, बेटों को सीमा कब सिखाएंगे
हम बच्चियों को गुड टच और बैड टच समझाते हैं। स्कूल बैग में सेफ्टी कार्ड रखते हैं। आत्मरक्षा की क्लास में भेजते हैं। फोन में इमरजेंसी नंबर सेव करते हैं।
ठीक है। जरूरी है।
बेटों को बेटियों की सुरक्षा का दायरा सिखाएं
लेकिन बेटों से कितनी बार बैठकर कहा जाता है कि किसी लड़की का पीछा करना प्यार नहीं है? उसकी चुप्पी सहमति नहीं है? उसका हंसकर बात करना कोई वादा नहीं है? उसके कपड़े निमंत्रण नहीं हैं? और उसकी ‘ना’ का अर्थ केवल ‘ना’ है- उसे चुनौती समझकर जीतना नहीं?
फिल्मों में पीछा करने को रोमांस, दोस्तों के बीच भद्दी टिप्पणी को मजाक और पुरुष की आक्रामकता को मर्दानगी बताने वाली सोच भी इसी समस्या का हिस्सा है।
जब परवरिश में लड़की को सावधानी और लड़के को छूट मिलेगी तो कोई कानून पूरा नहीं पड़ेगा। महिला सुरक्षा केवल महिलाओं का विषय नहीं है। यह बेटों की परवरिश का भी सवाल है। स्कूल की पढ़ाई का भी। परिवार की भाषा का भी। पुलिस की जवाबदेही और समाज की नीयत का भी।
आखिर बेटियां कब बिना डरे घर लौटेंगी
हम लड़कियां बहुत बड़ी मांग नहीं कर रही हैं।
लड़की बस में बैठे और उसे ड्राइवर की नजर पढ़ने की जरूरत न पड़े। मेट्रो से उतरे और अंधेरी सड़क देखकर दिल न धड़के। ई-रिक्शा में उसके शरीर को कोई अपनी कोहनी से जांचने की कोशिश न करे। कैब में बैठे तो हर पांच मिनट बाद मैप न देखना पड़े। देर से लौटे तो घर में पहला सवाल यह न हो—इतनी देर क्यों कर दी?
बस इतना ही तो चाहिए।
‘घर पहुंचकर फोन कर देना’— इसमें दो राय नहीं है कि यह चिंता से निकला बहुत प्यारा वाक्य है। मगर यह किसी लड़की की आजादी की कीमत नहीं बनना चाहिए। उसकी सुरक्षित वापसी कोई रोज होने वाला चमत्कार नहीं, सामान्य बात होनी चाहिए।
‘दायरा’ केवल करीना कपूर की फिल्म का नाम नहीं रह गया है। यह हमारे सामने रखा आईना है। कानून का दायरा कितना मजबूत है? पुलिस की जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है? परिवहन विभाग की निगरानी कहां खत्म हो जाती है? और किसी पीड़िता के दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते समाज की संवेदनशीलता क्यों दम तोड़ देती है?
सुरक्षा का दायरा उस दिन पूरा होगा, जब किसी घटना के बाद पीड़िता नहीं, अपराधी अपना चेहरा छिपाएगा। जब बेटी के देर से लौटने पर सवाल उसकी आजादी से नहीं, सड़क की व्यवस्था से होगा। जब मां बेटी से ‘सावधान रहना’ कहने के साथ बेटे से भी कहेगी—हर लड़की की सहमति और सीमा का सम्मान करना।
जब लड़की घर पहुंचेगी और फोन पर सिर्फ इतना कहेगी- मां, पहुंच गई। और उधर से आने वाली सांस राहत की नहीं, रोजमर्रा के इत्मीनान की होगी।
तब तक GPS, कैमरे, पैनिक बटन और कानूनों से बनाया गया यह घेरा अधूरा है।
क्योंकि हर लड़की के सुरक्षित घर लौटने तक- ‘दायरा’ अधूरा है।
