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'सड़कें खुद करेंगी अपनी मरम्मत', क्या हैं Self Healing Roads? जिनको भारत में भी लॉन्च करने की हो रही है तैयारी

Self Healing Roads: राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) सड़क निर्माण के लिए सेल्फ हीलिंग रोड्स तकनीक के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है। इसके तहत सड़क निर्माण में सेल्फ-हीलिंग मटीरियर को शामिल किया जाएगा, जिससे सड़कों को खुद मरम्मत करने में सक्षम बनाया जा सके। इस तकनीक के इस्तेमाल से हर साल सड़क निर्माण पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये बचाए जा सकते हैं।

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Self Healing Roads

Photo : BCCL

Self Healing Roads: भारत में गड्ढा युक्त सड़कें एक आम समस्या है। शायद ही देश का कोई कोना ऐसा होगा, जहां गड्ढे न हों। हर साल बारिश के बाद तो यह समस्या काफी विकराल हो जाती है और सड़क दुर्घटनाओं में कई लोगों को जान चली जाती है। इतना ही नहीं, इन सड़कों की मरम्मत के लिए हजारों करोड़ रुपये भी खर्च होते हैं, लेकिन नतीजा सिफर है।

इस बड़ी समस्या से निजात पाने के लिए अब भारत में ऐसी तकनीक लाने की तैयारी हो रही है, जिसमें सड़कें अपनी मरम्मत खुद-ब-खुद कर लेंगी। यानी जिस तरह हमारे शरीर के घाव भरते हैं, सड़के अपने गड्ढों को भी खुद ठीक कर लेंगी। यह बात भले ही चौंकाने वाली हो, लेकिन सच है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) सड़क निर्माण के लिए सेल्फ हीलिंग रोड्स तकनीक के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है। इसके तहत सड़क निर्माण में सेल्फ-हीलिंग मटीरियर को शामिल किया जाएगा, जिससे सड़कों को खुद मरम्मत करने में सक्षम बनाया जा सके।

क्या है यह तकनीक और कैसे करेगी काम?

जानकारी के अनुसार, सड़क निर्माण के लिए मिक्सचर में बिटुमेन और स्टील फाइबर का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे अगर सड़क में कोई गैप होता है तो बिटुमेन उन्हें भरने के लिए फैल जाएगा। दरअसल, बिटुमेन डामर में चिपकने वाला तत्व है। इसको स्टील बूल के छोटे-छोटे टुकड़ों के साथ मिलाकर डामर तकनीक विकसित की जाती है। अधिकारियों ने बताया स्टील वूल को मिलाने से बिटुमेन कंडक्टिव बन जाता है, जिससे बिटुमेन को इंडक्शन डिवाइस से गर्म करना आसान हो जाता हैऔर गर्म होने पर यह डामर के अंदर बजरी और पत्थरों से चिपक कर दरारों को सील करने लगता है। अधिकारियों का कहना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल करके देश में सड़क निर्माण में लगने वाले हजारों करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं। दरअसल, हर साल बारिश के बाद सड़कें गड्ढायुक्त हो जाती हैं, जिनकी मरम्मद में कराड़ों रुपये खर्च होते हैं।

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