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क्या कहीं नहीं दिखती सरस्वती नदी, या छिपी है रेगिस्तान में? जानें इससे जुड़ा वैज्ञानिक तथ्य

Saraswati River History: पौष पूर्णिमा के मौके पर माघ मेले की शुरुआत के साथ प्रयागराज में श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ संगम तट पर आस्था की डुबकी लगा रही है। त्रिवेणी संगम पर गंगा और यमुना का मिलन स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि पौराणिक सरस्वती नदी अदृश्य मानी जाती है। हिंदू मान्यताओं में इसे ज्ञान, कला और रचनात्मकता की देवी सरस्वती से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके अदृश्य होने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। तो आइए जानें इसके बारे में।

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कहां है सरस्वती नदी?

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

Saraswati River History: पौष पूर्णिमा के अवसर पर माघ मेले की शुरुआत के साथ ही प्रयागराज में बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम तट पर आस्था की डुबकी लगा रहे हैं। लाखों लोग अपने पितरों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने और पुण्य स्नान के लिए पवित्र नदियों के घाटों पर पहुंचे हैं। यहां त्रिवेणी संगम पर गंगा और यमुना का मिलन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जबकि सरस्वती नदी अदृश्य मानी जाती है। सरस्वती को पौराणिक नदी कहा गया है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद सहित कई उत्तर-वैदिक ग्रंथों में मिलता है। इसे प्लाक्ष्वती, वेदस्मृति और वेदवती जैसे नामों से भी जाना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह नदी ज्ञान, कला, संगीत और रचनात्मकता की देवी सरस्वती से जुड़ी मानी जाती है। लेकिन इससे परे आज हम आपको इस नदी के गायब या न दिखने से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य के बारे में बताएंगे। तो आइए बिना देर किए जानें इसके बारे में।

Where is Saraswati River?

सरस्वती नदी कहां है?

हजारों साल पुरानी नदी

National Remote Sensing Centre (NRSC) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरस्वती वैदिक काल (लगभग 8000–5000 वर्ष पूर्व) में उत्तर-पश्चिम भारत की सबसे पवित्र और शक्तिशाली नदियों में से एक थी। इसके किनारों पर फैले हड़प्पा सभ्यता के अनेक स्थलों की खोज इस बात का संकेत देती है कि यह नदी अत्यंत विस्तृत और समृद्ध प्रवाह वाली थी। पौराणिक और भूवैज्ञानिक विवरणों के अनुसार, यह नदी हिमालय से निकलकर पश्चिम में सिंधु और पूर्व में गंगा के बीच बहती हुई पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी राजस्थान और गुजरात से होकर गुजरती थी और अंततः अरब सागर के कच्छ की खाड़ी में मिलती थी।

कैसे खत्म हुआ सरस्वती नदी का प्रवाह?

माना जाता है कि लगभग 5000 वर्ष पूर्व जलवायु में बदलाव और भू-सरण (टेक्टोनिक गतिविधियों) के कारण इस नदी का प्रवाह समाप्त हो गया। फिर भी, वैज्ञानिकों का मत है कि थार मरुस्थल के नीचे आज भी इसके जल का हिस्सा भूमिगत रूप में प्रवाहित हो सकता है और इसका हिमालयी स्रोत किसी रूप में सक्रिय है। इस विलुप्त नदी के अवशेष आज रेतीली/अवसादी (Aeolian Sand/Alluvium) परतों के नीचे प्राचीन नदी-मार्ग (पैलियोकैनल/Palaeochannels) के रूप में सुरक्षित पाए जाते हैं।

Origin Point of Saraswati Nadi

यहां दिखती है सरस्वती नदी

आज यहां दिखती है सरस्वती नदी

सरस्वती नदी आज मुख्यतः एक भूमिगत नदी (Subterranean River) के रूप में बहती है, जिसके संकेत हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में मिले हैं। इसका स्रोत माणा गांव (उत्तराखंड) में है, जहां से यह अलकनंदा नदी में मिलती है, जिसे केशव प्रयाग के नाम से जाना जाता है। इस नदी को यहां देखा जा सकता है। भूगर्भीय बदलावों के कारण इस नदी का सतही प्रवाह समाप्त हो गया, लेकिन इसके प्राचीन मार्ग (पैलियोचैनल) आज भी थार रेगिस्तान के नीचे बहते हुए माने जाते हैं। वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से इस नदी के अवशेषों का अध्ययन लगातार जारी है।

Nilesh DwivedI
निलेश द्विवेदीauthor

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अपडेट्स पर लगातार काम करते हैं। निलेश महत्वपूर्ण विवरणों को चुनने और पाठकों की रुचि के हिसाब से कंटेंट को प्रभावी तरीके से पेश करने के लिए जाने जाते हैं। डिजिटल न्यूजरूम के रफ्तार भरे माहौल में वे हर खबर को सटीक एंगल, आसान भाषा और उपयोगी जानकारी के साथ पेश करने पर फोकस करते हैं और अबतक 2,000 से अधिक खबरें लिख चुके हैं।

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