Science News: जब भी हम पृथ्वी पर किसी विनाशकारी एस्टेरॉयड के टकराने की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले 6.6 करोड़ (66 मिलियन) साल पुराना 'चिक्सुलब इम्पैक्ट' (Chicxulub impact) याद आता है। यह वही खौफनाक टक्कर थी जिसके बारे में माना जाता है कि पृथ्वी से डायनासोरों का नामोनिशान मिटा दिया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि डायनासोरों के विनाश से भी लगभग 74 करोड़ साल पहले, यानी आज से 800 मिलियन (80 करोड़) साल पहले हमारे सौरमंडल में इससे भी कहीं ज्यादा भीषण और प्रलयंकारी तबाही मची थी?
अमेरिका के 'साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट' (SwRI) के नेतृत्व में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की एक 'कॉस्मिक फॉरेंसिक' टीम ने एक चौंकाने वाली खोज की है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच स्थित एस्टेरॉयड बेल्ट में एक विशालकाय पैरेंट एस्टेरॉयड (मुख्य चट्टान) के परखच्चे उड़ गए थे। इस टकराव से पैदा हुआ खरबों टन मलबा एक दो दिन नहीं, बल्कि अगले 10 से 15 करोड़ सालों तक पृथ्वी, चंद्रमा और मंगल ग्रह पर काल बनकर बरसता रहा। वैज्ञानिकों का मानना है कि पत्थरों की इसी भयंकर बौछार ने पृथ्वी पर मौसम को पूरी तरह बदल दिया और शायद जीवन के विकास की दिशा भी तय की।
चांद के दाग बने गवाह
अब सवाल यह उठता है कि अगर इतनी बड़ी तबाही आई थी, तो हमें आज तक इसके बारे में पता क्यों नहीं चला? इसका जवाब पृथ्वी की अपनी बनावट में छिपा है। हमारी पृथ्वी एक गतिशील ग्रह है। यहां लगातार ज्वालामुखी फटते हैं, टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराकर बदलती रहती हैं, और हवा-पानी के कारण होने वाले 'वेदरिंग' से लाखों-करोड़ों साल पुराने निशान मिट जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे रेतीले तूफान में पैरों के निशान गायब हो जाते हैं। इसलिए, पृथ्वी पर 650 मिलियन साल से पुराने गड्ढों के सबूत ढूंढना लगभग असंभव है। लेकिन चंद्रमा के साथ ऐसा नहीं है। चांद पर न तो कोई वायुमंडल है, न बहता हुआ पानी और न ही टेक्टोनिक प्लेट्स की हलचल। नासा के अपोलो मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री चांद की सतह से 'इम्पैक्ट ग्लास' (Impact Glass) के नमूने लेकर आए थे। बता दें कि जब अंतरिक्ष से कोई विशाल पत्थर किसी ग्रह या उपग्रह से टकराता है, तो अत्यधिक गर्मी और दबाव के कारण वहां की चट्टानें तुरंत पिघलकर कांच (Glass) में बदल जाती हैं। इसी इम्पैक्ट ग्लास की रासायनिक जांच करके वैज्ञानिक यह सटीक पता लगा सकते हैं कि वह टक्कर कब हुई थी। जब वैज्ञानिकों ने अपोलो के नमूनों और चंद्रमा के बड़े गड्ढों की उम्र का आकलन किया, तो पता चला कि आज से ठीक 800 मिलियन साल पहले चांद पर अचानक बड़े एस्टेरॉयड की टक्करों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।
जुपिटर का 'ग्रेविटेशनल गेटवे' और एस्टेरॉयड का भागने का रास्ता
इस खोज के मुख्य लेखक और साउेथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सोलर सिस्टम साइंस डिवीजन के कार्यकारी निदेशक डॉ. विलियम बॉटके (Dr. William Bottke) ने बताया कि उनकी टीम ने कंप्यूटर डायनेमिकल मॉडल्स की मदद से अंतरिक्ष के उस 'अपराधी' को ढूंढ निकाला है जिसने यह तबाही मचाई थी। इस एस्टेरॉयड का नाम था 'यूलालिया पैरेंट बॉडी' (Eulalia parent body)। यह एक आदिम, कार्बन से भरी हुई (Carbonaceous Chondrite) विशाल चट्टान थी, जो सौरमंडल के शुरुआती दिनों के इतिहास को समेटे हुए थी। जब अंतरिक्ष में यह पैरेंट बॉडी किसी दूसरी बड़ी चट्टान से टकराकर चकनाचूर हुई, तो इसका स्थान सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ। यह टक्कर ठीक उस जगह पर हुई जिसे वैज्ञानिक 'जुपिटर 3:1 मीन मोशन रेजोनेंस' (Jupiter 3:1 Resonance) कहते हैं। अब ये तो आप जानते ही हैं, जब अंतरिक्ष में दो आकाशीय पिंड (जैसे कोई गर्ह या सेटेलाइटद्रमा) एक-दूसरे पर गुरुत्वाकर्षण प्रभाव डालते हैं, इसे ही ऑर्बिटल रेजोनेंस कहते हैं।
बृहस्पति का यह लगातार मिलने वाला गुरुत्वाकर्षण का झटका एक 'ग्रेविटेशनल गेटवे' या भागने के रास्ते की तरह काम करता है। यूलालिया एस्टेरॉयड के टूटने के बाद, उसके मलबे का लगभग 50% हिस्सा तुरंत इस गुरुत्वाकर्षण के जाल में फंस गया। बृहस्पति ने इस मलबे की कक्षा को इतना अंडाकार और अस्थिर कर दिया कि ये टुकड़े आंतरिक सौरमंडल की तरफ यानी बुध, शुक्र, पृथ्वी, चांद और मंगल की ओर तेजी से आए। बाकी बचे 25% मलबे को इस गेटवे तक पहुंचने में अगले 10 से 15 करोड़ साल लगे। इसका कारण बना 'यार्कोव्स्की इफेक्ट' (Yarkovsky effect)।
यार्कोव्स्की इफेक्ट का मतलब यह हुआ कि जब सूर्य की रोशनी किसी एस्टेरॉयड को गर्म करती है, तो उसका एक हिस्सा ज्यादा गर्म हो जाता है और वह जमा हुई गर्मी इन्फ्रारेड विकिरण (heat radiation) के रूप में बाहर निकलती है। गर्मी के निकलने से एक बहुत हल्का सा धक्का (Thrust) पैदा होता है। जो लाखों सालों में उसकी कक्षा यानी ऑर्बिट को धीरे-धीरे बदल देता है।
पृथ्वी और मंगल पर क्या हुआ इसका असर?
चूंकि पृथ्वी आकार में चंद्रमा से बहुत बड़ी है और इसका गुरुत्वाकर्षण बल भी काफी शक्तिशाली है, इसलिए गणितीय गणनाओं के अनुसार, चांद पर गिरने वाले हर एक बड़े पत्थर के मुकाबले पृथ्वी ने ऐसे 20 या उससे अधिक विनाशकारी झटके झेले होंगे। वैसे तो पृथ्वी पर उन गड्ढों के निशान मिट चुके हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि यह समय (800 मिलियन साल पहले) पृथ्वी के इतिहास में एक बड़े हिमयुग और जैव मंडल (Biosphere) में हुए बड़े बदलावों से मेल खाता है। वैज्ञानिक यह तो पक्के तौर पर नहीं कहते कि मौसम में बदलाव इसी एस्टेरॉयड बौछार के कारण हुआ था, लेकिन दोनों घटनाओं का एक ही समय पर होना एक बहुत बड़ा संकेत है। वहीं दूसरी ओर, मंगल ग्रह पर इन टक्करों ने भयानक भूकंपीय झटके पैदा किए होंगे और इसी के चलते वहां ज्वालामुखियों की सक्रियता में एक बड़ा उछाल देखा गया था।
डॉ. विलियम बॉटके कहते हैं, "यह पूरी रिसर्च इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे अंतरिक्ष की मुख्य बेल्ट में होने वाली एक दुर्घटना भी दूर बैठे ग्रहों और उनके पर्यावरण के पूरे इतिहास को बदलकर रख सकती है।" यह खोज भविष्य के वैज्ञानिकों को पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और उस पर अंतरिक्ष के प्रभावों को समझने का एक नया नजरिया देती है।
