मुहम्मद बिन तुगलक को दिल्ली सल्तन के साभ सुलतानों में सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा बादशाह माना जाता है। उसे अरबी, फारसी, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा जैसे विषयों का गहरा ज्ञान था। वह पहला सुलतान था जिसने हिंदुओं और निचली जाति के लोगों को ऊंचा पद दिया। इस सब के बावजूद भारतीय इतिहास में मुहम्मद बिन तुगलक सबसे 'बुद्धिमान मूर्ख' बादशाह के रूप में दर्ज है।
सत्ता संभालने के 2 साल बाद ही मुहम्मद बिन तुगलक ने राजधानी बदलने का फरमान सुना दिया। बादशाह ने दिल्ली से 1500 किलोमीटर दूर दौलताबाद को राजधानी बनाने का फैसला किया। अरब यात्री इब्न बतूता का मानना था कि सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने ऐसा दिल्ली की जनता को सजा देने के लिए किया था। दरअसल, बादशाह को कई पत्र मिले थे, जिसमें प्रजा ने उसकी बुराईयां की थी। इस बात से नाखुश होकर वो राजधानी बदलना चाहता था।सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो वो खुद और मंत्रियों के साथ-साथ प्रजा को भी दिल्ली से दौलताबाद शिफ्ट करना चाहता था। इतिहासकार की मानें तो उसने कहा था कि दिल्ली से कुत्ते, बिल्लियों को भी वो दौलताबाद ले जाना चाहता था।
तुगलाकाबद बनाने के लिए उसने काफी मेहनत की। सड़कें बनवाए। शहर के दोनों तरफ पेड़ लगावाए। कैंप बनवाए, लेकिन वो सबसे मूलभूत चीज का ध्यान रखना भूल गया। दरअसल, दिल्ली से तुगलाकाबाद वाले रास्ते में उसने पर्याप्त पानी और खाना उपलब्ध नहीं करााय, जिसकी वजह से रास्ते में ही कई लोगों ने दम तोड़ दिए।तुगलाकाबाद जाने के बाद भी प्रशासन ठीक तरीके से काम नहीं कर पा रहा था। आखिरकार,बादशाह ने 1335 में फिर से दिल्ली को राजधानी बनाने का आदेश दिया। सभी को फिर से दिल्ली वापस ले जाया गया।
राजधानी को बदलने और फिजूलखर्ची की वजह से उसके प्रशासन पर राजस्व बोझ काफी बढ़ गया। उसके पास अपने सैनिकों को तनख्वा देने के लिए पैसे भी नहीं बच रहे थे। ऐसे में उसने एक 'तुगलकी फरमान' सुनाया।मुहम्मद तुगलक ने पैसा जमा करने के लिए हुक्म दिया कि तांबे और पीतल के सिक्के टकसाल में ढाले जाएं और उनकी कीमत सोने और चांदी के सिक्कों के बराबर रखी जाए, लेकिन इस सब में एक चूक हो गई। नए सिक्कों की नकल करना आसान था। आम लोगों ने घर पर ही सिक्के ढालने शुरू कर दिए। सिक्के इतने ज्यादा हो गए कि उनकी वैल्यू ढेले के बराबर हो गई। हारकर, मुहम्मद बिन तुगलक ने नए सिक्कों का हुक्म वापस ले लिया
एक तरफ जहां उसकी राजकोष की स्थिति अच्छी नहीं थी। वहीं, दूसरी ओर बादशाह तुगलक ने सैन्य अभियान चालू रखा। खुरासान का अभियान (1332-1333 ई.) में तुगलक ने 3 लाख 70 हजार और लोगों को अपनी सेना में भर्ती किया। इतना ही नहीं सैनिकों को एडवांस सैलरी देकर लुभाया। खुरासान में जीतने के तुरंत बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने हिमाचल प्रदेश के कुल्लू कांगड़ा क्षेत्र को कब्जा करने का फैसला किया। हालांकि, ऐसा करना उसके लिए संभव न हो सका। महामारी और भारी बारिश की वजह से तुगलक की सेना पीछे हट गई।
तुगलक भारत में अपना विस्तार चाहता था, इसीलिए 1329 तक उसने करीब 30 लाख सैनिक इकट्ठा कर लिए। इस दौरान उसकी सेना में कुछ ऐसे भी लोग भी भर्ती थे जो सैनिक थे ही नहीं। वह लड़ना ही नहीं जानते थे, सिर्फ संख्या बल बढ़ाने के लिए सैनिक बनाए गए थे। तुगलक ने इन सैनिकों को साल भर तक भुगतान करने का जिम्मा ले रखा था, इसलिए इस तरह उसके राजस्व पर इसका गहरा असर पड़ा।
जब मुहम्मद बिन तुगलक को इस समस्या का एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसने उन्हें उनके घरों में वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास किया और उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए हर तरह की कृषि सहायता और ऋण प्रदान किए। इसके बावजूद, उसकी प्रजा ने उसे गलत समझा।