Supreme Court News: महिला वकीलों के लिए सुविधाओं और जूनियर अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाते हुए केंद्र-राज्यों को नोटिस जारी किया है। प्रधान न्यायाशीध सूर्य कांत ने कहा कि कई कोर्ट परिसरों में महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और युवा वकीलों के लिए सहायता कोष बनाने पर भी विचार करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की अदालतों में महिला वकीलों के लिए पर्याप्त सुविधाओं की कमी और युवा अधिवक्ताओं की आर्थिक चुनौतियों को गंभीर मुद्दा मानते हुए केंद्र सरकार, राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है।
जनहित याचिका पर SC में हुई सुनवाई
यह मामला महिला अधिवक्ताओं के एक समूह द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में कहा गया है कि देश के अनेक हाई कोर्ट, जिला अदालतों, तहसील अदालतों, ट्रिब्यूनलों और आयोगों में महिला वकीलों के लिए समुचित बार रूम और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत परिसरों में महिला वकीलों के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराना केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि गरिमा और समान अवसर से जुड़ा संवैधानिक दायित्व है। पीठ ने युवा वकीलों की आर्थिक चुनौतियों पर भी चिंता जताई और कहा कि प्रतिभाशाली अधिवक्ताओं को पेशा छोड़ने से रोकने के लिए संस्थागत सहायता व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
महिला वकीलों के लिए जरूरी सुविधाओं का अभाव
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि महिला वकीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन केवल पेशे में प्रवेश का अवसर मिल जाना पर्याप्त नहीं है। उनके लिए ऐसा कार्य वातावरण भी होना चाहिए, जहां वे सुरक्षित और सम्मानजनक परिस्थितियों में अपनी पेशेवर जिम्मेदारियां निभा सकें। अदालत के अनुसार कई अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए अलग बार रूम या तो मौजूद नहीं हैं या फिर वहां बैठने की पर्याप्त व्यवस्था, स्वच्छ शौचालय, चेंजिंग स्पेस और अन्य जरूरी सुविधाओं का अभाव है। न्यायालय ने कहा कि यह केवल सुविधा का नहीं बल्कि गरिमा और समान अवसर का भी प्रश्न है।
वित्तीय कठिनाइयों का सामना करते हैं प्रथम पीढ़ी के वकील
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें केवल न्यायिक कार्यवाही का स्थान नहीं हैं, बल्कि वकीलों के लिए कार्यस्थल भी हैं, जहां वे दिन का बड़ा हिस्सा बिताते हैं। ऐसे में बुनियादी सुविधाओं का उपलब्ध होना बेहद आवश्यक है। सुनवाई के दौरान अदालत ने युवा वकीलों की आर्थिक स्थिति पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि वकालत के शुरुआती वर्षों में आय का कोई निश्चित स्रोत नहीं होता। खासकर प्रथम पीढ़ी के वकीलों और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को गंभीर वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
युवा वकीलों के लिए बने विशेष सहायता कोष
न्यायालय ने कहा कि इसी वजह से कई प्रतिभाशाली युवा वकील शुरुआती संघर्ष के दौर में ही पेशा छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इससे विधि पेशे में योग्य प्रतिभाओं का नुकसान होता है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि युवा वकीलों के लिए एक विशेष सहायता कोष बनाया जाना चाहिए। अदालत की राय है कि इस कोष का संचालन संबंधित हाई कोर्ट या केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा गठित किसी स्वतंत्र निकाय के माध्यम से किया जा सकता है।
शुरुआती वर्षों में मासिक वित्तीय सहायता दी जा सकती है
न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकारें अदालत शुल्क से प्राप्त राशि का एक हिस्सा इस कोष में देने पर विचार कर सकती हैं। इसके अलावा न्यायिक मामलों में लगाए जाने वाले खर्च की राशि का कुछ भाग भी इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर और प्रथम पीढ़ी के युवा वकीलों को शुरुआती वर्षों में मासिक वित्तीय सहायता दी जा सकती है। यह सहायता धीरे-धीरे कम होती हुई कुछ वर्षों बाद समाप्त की जा सकती है, जब तक वे स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने में सक्षम न हो जाएं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ये सभी सुझाव प्रारंभिक विचार हैं और संबंधित पक्ष इस विषय पर अन्य विकल्प भी सामने रख सकते हैं। मामले की अगली सुनवाई में केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल, राज्यों के एडवोकेट जनरल तथा केंद्रशासित प्रदेशों के विधि अधिकारियों से अदालत की सहायता करने को कहा गया है।
