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UPI MDR Rules Explained: क्या 2000-2000 रुपये के टुकड़ों में पेमेंट लेकर दुकानदार बचा सकते हैं चार्ज? समझें NPCI के नियम

UPI MDR Rules Explained: 5 अक्टूबर 2026 से बड़े व्यापारियों को 2000 रुपये से अधिक के UPI पेमेंट्स पर 0.4% फीस देनी होगी। हालांकि, बिल स्प्लिटिंग जैसे तरीकों से फीस बचने की संभावना है।

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UPI का नया नियम: बड़े पेमेंट्स पर 0.4% चार्ज, लेकिन 'बिल स्प्लिटिंग' से कैसे बचेगा मर्चेंट? (AI-generated image)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Sep 20, 2026, 15:50 IST
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UPI MDR Rules Explained : अगर आप रोजाना खरीदारी, शॉपिंग या यूटिलिटी बिल भरने के लिए यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) का इस्तेमाल करते हैं, तो 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नए नियम आपके और दुकानदारों के लिए बेहद अहम हैं। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के नए ढांचे के मुताबिक, बड़े व्यापारियों को अब 2,000 रुपये से अधिक के UPI पेमेंट्स पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) देना होगा। हालांकि, इस नए नियम की घोषणा के साथ ही बाजार में इसके कुछ संभावित तोड़ या लूपहोल्स को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या व्यापारी इस चार्ज से बचने के लिए बड़े बिलों को 2,000-2,000 रुपये के छोटे हिस्सों में तोड़कर पेमेंट लेंगे? आइए इस पूरे मामले को आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं।

क्या है नया नियम और कितना लगेगा चार्ज?

15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नियमों के तहत अगर कोई ग्राहक किसी बड़े मर्चेंट (दुकानदार या बिजनेस) को एक बार में 2,000 रुपये से अधिक का भुगतान करता है, तो मर्चेंट को उस ट्रांजेक्शन पर 0.4% का MDR चार्ज देना होगा। मार्जिन और मर्चेंट की सुरक्षा के लिए इस फीस की एक अधिकतम सीमा भी तय की गई है। 75,000 रुपये या उससे अधिक के किसी भी एकल UPI भुगतान पर यह चार्ज अधिकतम 300 रुपये तक ही सीमित रहेगा। इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि आपने किसी बड़े स्टोर से 10,000 रुपये की खरीदारी की और UPI से पेमेंट किया। इस स्थिति में दुकानदार को 0.4% के हिसाब से 40 रुपये की MDR फीस देनी होगी। वहीं, अगर कोई पेमेंट 100000 रुपये का होता है, तो 0.4% के हिसाब से चार्ज 400 रुपये बनता है, लेकिन कैपिंग नियम के कारण मर्चेंट से अधिकतम 300 रुपये ही लिए जाएंगे।

बिल स्प्लिटिंग: शुल्क से बचने का आसान रास्ता?

जैसे ही इस नियम की रूपरेखा सामने आई, बैंकिंग और पेमेंट इंडस्ट्री के जानकारों ने इसमें एक बड़े व्यावहारिक लूपहोल की ओर इशारा किया। इसे 'बिल स्प्लिटिंग' यानी बिल को टुकड़ों में बांटना कहा जा रहा है। अगर किसी ग्राहक का कुल बिल 10,000 रुपये है, तो दुकानदार उसे एक बार में 6,000 रुपये का भुगतान करने के बजाय 2,000-2,000 रुपये के 5 अलग-अलग भुगतान करने के लिए कह सकता है। चूंकि प्रत्येक ट्रांजेक्शन 2,000 रुपये की मुफ्त सीमा के भीतर होगा, इसलिए मर्चेंट को कोई MDR फीस नहीं देनी पड़ेगी और वह अपने 40 रुपये बचा लेगा। फिलहाल NPCI के गाइडलाइंस और FAQ में ऐसा कोई नियम शामिल नहीं है जो एक ही बिल के लिए ग्राहक द्वारा किए जाने वाले मल्टिपल पेमेंट्स को क्लब (जोड़ने) करने के लिए बाध्य करता हो। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक NPCI से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगर ग्राहक और व्यापारी दोनों आपस में सहमत होकर 2000-2000 रुपये का अलग-अलग पेमेंट करते हैं, तो ट्रांजेक्शन लेवल पर इसे रोकने का कोई प्रत्यक्ष सिस्टम अभी मौजूद नहीं है।

NPCI का रुख: दैनिक सीमा क्यों नहीं लगाई गई?

कई एक्सपर्ट्स का मानना था कि NPCI को एक ही मर्चेंट को एक ही ग्राहक द्वारा किए जाने वाले दैनिक पेमेंट्स पर एक सीमा (Daily Cap) तय कर देनी चाहिए थी, ताकि बिल स्प्लिटिंग को रोका जा सके। लेकिन NPCI ने फिलहाल ऐसा कोई सीमा तय करने से मना कर दिया है। NPCI का मानना है कि इस तरह के तरीके शुरुआती दौर में कुछ छोटे या मध्यम व्यापारी आजमा सकते हैं, लेकिन लंबे समय में यह कोई बड़ा ट्रेंड नहीं बनेगा। किसी बड़े रिटेल स्टोर या मॉल में जहां ग्राहकों की लंबी लाइन लगी होती है, वहां एक ही ग्राहक से तीन-चार बार QR स्कैन करवाकर अलग-अलग भुगतान लेना व्यावहारिक रूप से बहुत कठिन और समय बर्बाद करने वाला होगा। इसलिए NPCI को भरोसा है कि यह तरीका बड़े पैमाने पर सिस्टम को प्रभावित नहीं करेगा।

छोटे मर्चेंट्स के लिए zero-MDR की शर्तें और चुनौतियां

नए ढांचे में छोटे व्यापारियों को राहत देने के लिए स्मॉल मर्चेंट कैटेगिरी (Person-to-Person-Merchant यानी P2PM) बनाई गई है, जो zero-MDR के तहत आती है। हालांकि, इसके लिए भी सख्त नियम तय किए गए हैं। बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर (PSP) छोटे व्यापारियों के UPI कलेक्शन पर लगातार नजर रखते हैं। अगर किसी P2PM मर्चेंट का कलेक्शन लगातार तीन महीनों तक 1 लाख रुपये प्रति माह से अधिक हो जाता है, तो उसे खुद-ब-खुद रेगुलर मर्चेंट कैटेगरी में शिफ्ट कर दिया जाता है, जहां 2,000 रुपये से ऊपर के पेमेंट्स पर MDR लागू होता है। लेकिन यहां भी एक अस्पष्टता बनी हुई है। NPCI के FAQ में यह साफ नहीं किया गया है कि क्या किसी व्यापारी के कुल कलेक्शन की गणना उसके सभी अलग-अलग बैंक खातों, अलग-अलग QR कोड्स या अलग-अलग पेमेंट ऐप्स को मिलाकर की जाएगी या नहीं।

बिक्री छिपाने और गलत कैटेगिरी चुनने के अन्य रास्ते

इंडस्ट्री के जानकारों के अनुसार, MDR चार्ज से बचने के लिए व्यापारी कुछ अन्य रास्तों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

  • मल्टीपल बैंक अकाउंट्स और QR कोड्स:- व्यापारी अपने बिजनेस के पेमेंट्स को अलग-अलग बैंक खातों और विभिन्न कंपनियों (जैसे PhonePe, Paytm, Google Pay) के QR कोड्स पर बांट सकते हैं। इससे किसी भी एक खाते का मासिक कलेक्शन 1 लाख रुपये की सीमा को पार नहीं करेगा और वे P2PM कैटेगरी का फायदा उठाते रहेंगे।
  • पर्सनल UPI आईडी का इस्तेमाल:- कई छोटे और मध्यम व्यवसायी कमर्शियल मर्चेंट QR कोड के बजाय अपने पर्सनल UPI ID या पर्सनल फोन नंबर पर पैसे ट्रांसफर करने को कह सकते हैं। पर्सन-टू-पर्सन (P2P) पेमेंट्स पूरी तरह से मुफ्त हैं, चाहे रकम कितनी भी हो। हालांकि, बैंकिंग जानकारों का कहना है कि अगर बैंक खातों में व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े बड़े पेमेंट्स लगातार आते हैं, तो बैंक उन्हें डिटेक्ट करके मर्चेंट अकाउंट में री-क्लासिफाई कर सकते हैं।
  • गलत मर्चेंट कैटेगरी कोड (MCC) का इस्तेमाल:- नए नियमों के तहत रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, फ्यूल (पेट्रोल पंप) और यूटिलिटी बिलों (बिजली, पानी) जैसी कुछ जरुरी सेवाओं को रियायती दर पर रखा गया है, जहां 0.4% के बजाय केवल 5 रुपये की फ्लैट फीस लगती है। अगर कोई सामान्य व्यापारी ऑनबोर्डिंग के समय खुद को गलत तरीके से इन रियायती कैटेगरी में रजिस्टर करवा लेता है, तो वह कम फीस में काम चला सकता है। हालांकि, ऐसा करना नियमों का सीधा उल्लंघन है और पकड़े जाने पर पेनल्टी लग सकती है।
  • गलत ऑटोपे (AutoPay) का दावा:- ऑटोमैटिक और समय-समय पर होने वाले रिकरिंग पेमेंट्स (जैसे OTT सब्स्क्रिप्शन या EMI) को MDR से छूट दी गई है। किसी साधारण खरीदारी को रिकरिंग पेमेंट बताकर छूट का दावा करना भी मिस-क्लासिफिकेशन की कैटेगरी में आता है।
15 अक्टूबर से बदलेंगे UPI के नियम  (तस्वीर-AI)

15 अक्टूबर से बदलेंगे UPI के नियम (तस्वीर-AI)

2000 रुपये से ऊपर के ट्रांजेक्शन का गणित

भले ही देखने में 2,000 रुपये की सीमा छोटी लगे, लेकिन UPI इकोसिस्टम के लिए इसका आर्थिक गणित बेहद बड़ा है। आंकड़ों के मुताबिक UPI पर होने वाले कुल मर्चेंट पेमेंट्स में से 95% से अधिक ट्रांजेक्शन 2,000 रुपये से कम के होते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि देश के आम नागरिकों द्वारा की जाने वाली रोजमर्रा की 95% खरीदारी पूरी तरह से मुफ्त रहेगी। हालांकि, दूसरा पहलू यह है कि संख्या में भले ही 2,000 रुपये से ऊपर के ट्रांजेक्शन केवल 5% हों, लेकिन कुल मर्चेंट पेमेंट्स की वैल्यू (रकम) का करीब दो-तिहाई (66%) हिस्सा इन्हीं 2,000 रुपये से ऊपर वाले पेमेंट्स से आता है। इसी वजह से अगर व्यापारी बिल स्प्लिटिंग या अन्य तरीकों से इन बड़े पेमेंट्स पर MDR देने से बचते हैं, तो NPCI और बैंकों को मिलने वाले कुल राजस्व पर इसका सीधा और बड़ा असर पड़ सकता है।

MDR से मिलने वाले पैसे का कहां होगा इस्तेमाल?

NPCI ने यह साफ कर दिया है कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से जो भी राजस्व इकट्ठा होगा, उसका उपयोग किसी फायदे के लिए नहीं बल्कि डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए किया जाएगा। इस फंड का मुख्य रूप से तीन जगहों पर इस्तेमाल होगा:-

  • UPI इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना:- ताकि त्योहारों या पीक आवर्स के दौरान सर्वर डाउन होने या पेमेंट फेल होने की समस्याएं खत्म हों।
  • साइबर सिक्योरिटी:- डिजिटल धोखाधड़ी और ऑनलाइन फ्रॉड को रोकने के लिए नए और सुरक्षित सुरक्षा मापदंड तैयार करना।
  • स्टमर सर्विस और सपोर्ट:- ग्राहकों की शिकायतों के तुरंत निपटारे और विवाद सुलझाने के सिस्टम को बेहतर बनाना।

15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला नया MDR ढांचा भारत के डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। जहां 95% छोटे पेमेंट्स को पूरी तरह सुरक्षित और मुफ्त रखा गया है, वहीं बड़े पेमेंट्स पर मामूली फीस लगाकर UPI के विशाल इन्फ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, बिल स्प्लिटिंग और अकाउंट्स को बांटने जैसे लूपहोल्स शुरुआती चुनौतियां पैदा कर सकते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि NPCI और बैंक इन लूपहोल्स पर केवल मॉनिटरिंग के जरिए लगाम लगा पाते हैं या आगे चलकर दैनिक ट्रांजेक्शन लिमिट जैसे कठोर कदम उठाने पड़ते हैं।

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