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सुप्रीम कोर्ट से एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम को बड़ी राहत, 149 करोड़ लीटर अतिरिक्त एथेनॉल खरीद को मंजूरी

सुनवाई के दौरान भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की ओर से पेश होते हुए कहा कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के तहत सभी सप्लायर्स को समान अवसर दिया जाएगा। इसमें वे इकाइयां भी शामिल होंगी, जिनके पास ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के साथ लॉन्ग टर्म ऑफटेक एग्रीमेंट (एलटीओए) नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

सुप्रीम कोर्ट ने एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम (ईबीपीपी) से जुड़े मामलों में बड़ा अंतरिम आदेश पारित करते हुए एथेनॉल सप्लाई (2025-26) के लिए चौथी तिमाही के टेंडर में 149 करोड़ लीटर अतिरिक्त एथेनॉल खरीद की अनुमति दे दी है। अदालत के इस आदेश के बाद ऑयल मार्केटिंग कंपनियां अब चौथी तिमाही के सफल बोलीदाताओं से अतिरिक्त एथेनॉल की खरीद कर सकेंगी। इस आदेश को ईबीपीपी के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

सुनवाई के दौरान भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की ओर से पेश होते हुए कहा कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के तहत सभी सप्लायर्स को समान अवसर दिया जाएगा। इसमें वे इकाइयां भी शामिल होंगी, जिनके पास ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के साथ लॉन्ग टर्म ऑफटेक एग्रीमेंट (एलटीओए) नहीं है।

मामले की सुनवाई मोदी बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड और अन्य बनाम वीआईएनपी शुगर्स एंड डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड मामले में हुई। यह याचिका कर्नाटक हाई कोर्ट के 16 जून 2026 के आदेश को चुनौती देते हुए दाखिल की गई थी।

कर्नाटक हाई कोर्ट की एकल पीठ ने अपने आदेश में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को वीआईएनपी शुगर्स एंड डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड की उस मांग पर विचार करने का निर्देश दिया था, जिसमें कंपनी ने अपनी डिजाइन क्षमता तक एथेनॉल खरीदने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए यह भी टिप्पणी की कि वह यह समझने में असमर्थ है कि हाई कोर्ट के आदेश का आधार और औचित्य क्या था।

यह मामला केंद्र सरकार के एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के व्यापक प्रभाव से जुड़ा हुआ है। सुनवाई के दौरान कई गैर-एलटीओए इकाइयों, इंडियन शुगर मिल्स एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) और वीआईएनपी शुगर्स एंड डिस्टिलरीज ने अंतरिम व्यवस्था का विरोध किया था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस प्रस्ताव का समर्थन याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार और अमित सिब्बल ने किया। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी पेश हुए। वहीं, वर्ष 2023-24 में स्थापित एलटीओए इकाइयों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अंतरिम व्यवस्था का विरोध किया।

मुख्य याचिकाकर्ता मोदी बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार और अमित सिब्बल ने पक्ष रखा। उनके साथ करंजावाला एंड कंपनी की टीम भी मौजूद रही। वीआईएनपी शुगर्स एंड डिस्टिलरीज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और इंडियन शुगर मिल्स एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनींदर सिंह पेश हुए।

क्या था कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश?

कर्नाटक हाई कोर्ट का मूल तर्क यह था कि जिन एथेनॉल कंपनियों ने ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) के साथ लॉन्ग टर्म ऑफटेक एग्रीमेंट (एलटीओए) किया था और उस समझौते के भरोसे सैकड़ों करोड़ रुपये निवेश करके अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाई थी, उन्हें उनकी डिजाइन क्षमता के मुताबिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

आसान भाषा में समझें तो हाई कोर्ट यह कहना चाह रहा था कि वीआईएनपी शुगर्स ने ओएमसी के साथ हुए समझौते के आधार पर बड़ा एथेनॉल प्लांट लगाया था। समझौते की धारा 6.8 के मुताबिक, अगर किसी कंपनी को शुरुआत में उसकी पूरी क्षमता के मुकाबले कम आवंटन मिला है, तो बाद में ओएमसी अतिरिक्त खरीद के समय उसे प्राथमिकता दे सकती हैं। कंपनी का दावा था कि उसने अपनी पूरी उत्पादन क्षमता तैयार कर ली है, लेकिन ओएमसी ने एथेनॉल खरीद का आवंटन करते समय उसकी अतिरिक्त क्षमता को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

हाई कोर्ट का मानना था कि जिन कंपनियों को केवल ओएमसी को ही एथेनॉल बेचने की अनुमति है, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी वजह से हाई कोर्ट ने ओएमसी को वीआईएनपी शुगर्स के प्रतिनिधित्व पर दोबारा विचार करने और उसकी डिजाइन क्षमता के अनुरूप खरीद पर फैसला लेने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को तर्कसंगत क्यों नहीं माना?

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिक चिंता यह थी कि अगर केवल एलटीओए वाली इकाइयों को अतिरिक्त फायदा दिया गया, तो बिना एलटीओए वाली इकाइयों के साथ भेदभाव हो सकता है और राष्ट्रीय एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सभी आपूर्तिकर्ताओं के लिए समान व्यवस्था बनाए रखने का रास्ता चुना।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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