Supreme Court : मुख्य चुनाव आयुक्त एवं चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाए जाने पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि चुनाव आयोग को न केवल स्वतंत्रतापूर्वक काम करना चाहिए बल्कि वह स्वतंत्रतापूर्वक काम करते हुए दिखना भी चाहिए। टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि कानून बनाते समय संसद ने चयन समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश को नहीं शामिल करने का फैसला क्यों किया? जस्टिस दीपंकर दत्ता एवं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि सीबीआई के निदेशक, लोकपाल की चयन समिति में सीजेआई शामिल हैं लेकिन सीईसी एवं ईसी की चयन प्रक्रिया से उन्हें बाहर रखने की वजह क्या हो सकती है। मामले की सुनवाई करने के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब यह मामला संवैधानिक पीठ के समक्ष जाएगा।
सरकार ने कहा-पीएम पद की एक गरिमा है
वहीं, सरकार ने सीईसी और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को विनियमित करने संबंधी कानून का बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय में बचाव किया। सरकार ने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि चयन प्रक्रिया में संख्यात्मक बहुमत होने के कारण प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री 'गलत मंशा’ से या 'लोकतंत्र के खिलाफ’ काम करेंगे। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत के समक्ष दलील दी कि प्रधानमंत्री पद की 'गरिमा’ है और चयन समिति के फैसले पर संदेह करना निर्वाचित संस्थाओं में जताए गए संवैधानिक विश्वास को कमजोर करेगा।
चयन समिति से सीजेआई को बाहर रखा गया है
मेहता ने न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष कहा, 'अगर उनके फैसले पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उसे हमेशा बुरी मंशा से लिया गया फैसला माना जाए तो फिर ऐसा प्रावधान क्यों नहीं बनाया जाता कि प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल का चयन करते समय भी किसी पूर्व न्यायाधीश या बाहरी व्यक्ति से परामर्श लें?’ उच्चतम न्यायालय मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कुछ याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। इस कानून के तहत निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को बाहर रखा गया है।
तुषार मेहता ने दीं दलीलें
मेहता ने कहा कि इस मामले को संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत बड़ी पीठ को भेजा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न शामिल है। अपनी दलील को विस्तार देते हुए मेहता ने कहा कि जिस क्षण अदालत यह कहती है कि चयन समिति पर्याप्त नहीं है, उसी समय संसद की समझ और निर्णय पर सवाल उठने लगते हैं तथा संवैधानिक विश्वास के सिद्धांत पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। मेहता ने कहा, 'जब कार्यपालिका किसी अन्य अंग के चयन में भाग लेना चाहती है, तो यह उस दूसरे अंग की स्वतंत्रता का सवाल बन जाता है। क्या तब न्यायपालिका से यह कहा जा सकता है कि हम आपकी नियुक्तियों पर भरोसा नहीं करेंगे क्योंकि उसमें कोई बाहरी व्यक्ति शामिल नहीं है? यह कोई विरोधी तर्क नहीं है। मैं इसे केवल कानून के एक छात्र के रूप में कह रहा हूं।’
'मुद्दा प्रधानमंत्री पर अविश्वास करने का नहीं है'
पीठ ने मेहता की दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'अपनी मृत्यु से डेढ़ साल पहले डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि भारत में लोकतंत्र विफल हो गया है। ये सभी आदर्शवादी विचार हैं...डॉ. आंबेडकर का निधन 1955-56 में हुआ था...हमें बस यह आंकड़ा दे दीजिए कि कितने राज्यों में ऐसे मंत्री हैं, जिनके खिलाफ मामले दर्ज हैं।’ न्यायमूर्ति दत्ता ने यह भी कहा कि मुद्दा प्रधानमंत्री पर अविश्वास करने का नहीं है। पीठ ने कहा, 'हम प्रधानमंत्री पर भरोसा करेंगे। लेकिन पिछले कुछ सालों में ऐसा नहीं हुआ है। मैं अपनी बात यहीं खत्म करता हूं। अब स्थिति 2:1 की है। दो सदस्य प्रधानमंत्री के पक्ष में हैं और एक विपक्ष के पक्ष में।’
निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए-कोर्ट
न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, 'निर्वाचन आयुक्त से एक स्वतंत्र व्यक्ति होने की अपेक्षा की जाती है। क्या चयन समिति में निष्पक्षता का कोई प्रदर्शन नहीं होना चाहिए? हम यह नहीं कह रहे कि निष्पक्षता हासिल नहीं हो रही है, लेकिन उसे दिखना भी चाहिए।’ सुनवाई शुरू होते ही अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी कि 2023 के अनूप बरनवाल फैसले से जुड़े मुद्दों में संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, जिन पर बड़ी पीठ द्वारा विचार किए जाने की जरूरत है।
