‘अगर भाषा के लिए आवाज उठाना बीमारी है, तो देश के ज्यादातर राज्य बीमार हैं'; राज ठाकरे का मोहन भागवत पर पलटवार
- Edited by: शिव शुक्ला
- Updated Feb 10, 2026, 11:31 PM IST
राज ठाकरे ने मोहन भागवत के उस बयान पर तीखा पलटवार किया जिसमें भाषा के पक्ष में आंदोलन को 'बीमारी' कहा गया था। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा है तो देश के ज्यादातर राज्य इससे ग्रस्त हैं। उन्होंने आरएसएस पर अप्रत्यक्ष राजनीति करने का आरोप लगाया।
राज ठाकरे और मोहन भागवत।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने भाषा विवाद को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत पर तीखा हमला बोला है। ठाकरे ने कहा कि अगर अपनी भाषा और राज्य के पक्ष में प्रदर्शन करना “बीमारी” है, तो देश के अधिकांश राज्य इससे ग्रस्त हैं। सोमवार को ‘एक्स’ पर की गई पोस्ट में राज ठाकरे ने दावा किया कि सात और आठ फरवरी को आयोजित आरएसएस के शताब्दी समारोह में शामिल हुए लोग संघ प्रमुख के प्रति प्रेम के कारण नहीं, बल्कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के डर से पहुंचे थे।
राज ठाकरे ने का ये दावा
राज ठाकरे ने कहा कि तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों में क्षेत्रीय पहचान बेहद मजबूत है, वहीं पंजाब, पश्चिम बंगाल और गुजरात में भी यही भावना दिखाई देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब कुछ राज्यों से बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों में जाकर स्थानीय संस्कृति और भाषा का अपमान करते हैं तथा अलग वोट बैंक बनाने की कोशिश करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से स्थानीय लोगों में नाराजगी पैदा होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या संघ प्रमुख इन हालातों को भी “बीमारी” कहेंगे।
ठाकरे ने यह भी कहा कि जब गुजरात से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को निकाला गया था, तब भागवत ने वहां इस तरह के उपदेश क्यों नहीं दिए। गौरतलब है कि पिछले सप्ताहांत मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से संवाद करते हुए भाषा विवाद पर कहा था कि इस 'स्थानीय बीमारी' को फैलने नहीं देना चाहिए।
उन्होंने पूछा कि कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब में ऐसे बयान क्यों नहीं दिए गए। उन्होंने दावा किया मोहन भागवत इस तरह की टिप्पणी करने का साहस इसलिए दिखा सकते हैं, क्योंकि मराठी मानुष सहिष्णु हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा, सत्ता में बैठे लोगों में दम नहीं हैं। पिछले महीने हुए नगर निगम चुनाव में एमएनएस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने मराठी अस्मिता और ’भूमिपुत्र’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था।
आरएसएस और राजनीति पर टिप्पणी
मनसे प्रमुख ने कहा कि वह संघ के सामाजिक कार्यों का सम्मान करते हैं, लेकिन आरएसएस को अप्रत्यक्ष राजनीतिक रुख नहीं अपनाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर संघ को वास्तव में सद्भाव की चिंता है, तो पहले उस सरकार को फटकार लगानी चाहिए जो पूरे देश में हिंदी थोपने की कोशिश कर रही है, जबकि हिंदी कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है।
देवेंद्र फडणवीस का पलटवार
राज ठाकरे के इन बयानों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कड़ा एतराज जताया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता देवेंद्र फडणवीस ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आरएसएस के कार्यक्रमों में लोग स्वेच्छा से और अनुशासन के साथ भाग लेते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिन्हें आमंत्रण नहीं मिला, वही लोग ऐसी टिप्पणियां कर रहे हैं। भाजपा ने यह भी कहा कि मराठी अस्मिता गौरव का विषय है, लेकिन किसी भी भाषा को टकराव का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि संवाद का जरिया बने रहना चाहिए।
भाजपा ने भी दिया जवाब
प्रदेश भाजपा के मुख्य प्रवक्ता केशव उपाध्याय ने ‘एक्स’ पर लिखा कि राज ठाकरे को इस गलतफहमी से बाहर निकलना चाहिए कि लोग डर के कारण आरएसएस के कार्यक्रमों में जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस ने सौ वर्षों में सामाजिक स्वीकृति अर्जित की है, जबकि मनसे जैसी पार्टियां कुछ दशकों में ही सिमट गईं।
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