Aurangabad name change: शहरों के बसने की कहानी दिलचस्प होती है। खासतौर से जब इस देश पर इस्लामी शासन था तो उस समय सुल्तानों और बादशाहों ने अलग अलग शहर बनाए उन्हें नाम भी दिया। लेकिन बहुत से ऐसे शहर भी रहे जिनकी पहचान यानी नाम को खुन्नस में बदल दिया। यहां हम महाराष्ट्र के दो शहरों में से एक औरंगाबाद का जिक्र करेंगे जिसे एकनाथ शिंदे सरकार ने संभाजीनगर(sambhji nagar) नाम दिया गया है। महाराष्ट्र की आधुनिक सियासत आज भी छत्रपति शिवााजी महाराज और उनके वंशजों के चारों तरफ घूमती है। महाराष्ट्र सरकार ने जब औरंगाबाद को शंभाजी नगर करने का फैसला लिया तो कहा भी कि हमने शहर के पुराने गौरव को फिर से स्थापित किया है। इन सबके बीच हम यहां जिक्र करेंगे कि औरंगाबाद का नाम शुरू से लेकर आजतक बदलने के क्रम में कितने पड़ावों से गुजरा।
सातवाहन काल से संबंध
औरंगाबाद शहर(अब संभाजीनगर) का इतिहास मध्यकाल नहीं बल्कि उससे भी करीब हजार साल पहले सातवाहन काल से जुड़ा है। जैसे जैसे इतिहास का पहिया आगे के सफर पर निकला तो इस शहर का जिक्र राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में भी हुआ है। सातवाहन काल में खाम नदी के किनारे कई गांव से उनमें से एक को औरंगाबाद था। 1400 एडी के करीब देवगिरी पर कृष्ण देव राय के वंशजों का शासन था और इस शहर का संबंध उनसे भी जोड़ा जाता है। लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि निजामशाही वंश ने इस शहर को बसाया। निजामशाह मुर्तजा द्वितीय के वंशज ने मलिक अंबर ने औरंगाबाद शहर को बसाया और उसने शहर का नाम बदलकर फतेहनगर रख दिया।
कितनी बार बदला नाम
- मलिक अंबर के बेटे फतेह खान ने 17वी सदी के के तीसरे दशक में फतेहनगर नाम दिया
- मुगल बादशाह शाहजहां ने औरंगजेब को डेक्कन का गवर्नर बनाकर भेजा तो नाम बदल कर खुजिस्ता बुनियाद हो गया
- जब औरंगजेब खुद बादशाह हुआ तो उसने 1657 में नाम बदलकर औरंगाबाद कर दिया।
- 331 साल बाद 1988 में बालासाहेब ठाकरे ने औरंगाबाद नाम बदलने का विरोध किया और संभाजी नगर नाम दिया।
- 1995 में शिवसेना बीजेपी की सरकार ने औरंगाबाद और उस्मानाबाद दोनों शहरों के नाम बदलने का फैसला किया लेकिन मामला अदालत में चला गया
- कांग्रेस ने 1999 में अदालत को बताया कि वो शहरों के नाम बदलने के प्रस्ताव को वापस ले रही है।
- जून 2022 में उद्धव ठाकरे ने नाम बदले जाने की मंजूरी दी।
- जुलाई 2022 में शिंदे सरकार ने भी नाम बदलने की मंजूरी दे दी।
क्या कहते हैं जानकार
अब इस विषय पर सियासत को विराम लग गया है। क्योंकि उद्धव ठाकरे सरकार ने जब नाम बदलने की मंजूरी दी थी तो उस वक्त एनसीपी और कांग्रेस दोनों उनकी सरकार के हिस्सा थे। जानकार कहते हैं कि शहरों के नाम के बदले जाने के पीछे मनोवैज्ञानिक सोच है। मसलन इस तरह के प्रयासों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि जो कुछ देख रहे हैं वही इतिहास है। इसके साथ ही राजनीतिक दल खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के साथ साथ अपने कोर वोटर्स को भी संदेश देने की कोशिश करते हैं पार्टी अपने मूल विचारों से बंधी हुई है।
