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Karnataka CM: कांग्रेस के 'पायलट' तो नहीं बनेंगे डीके शिवकुमार, उनकी नाराजगी के Congress के लिए क्या हैं मायने; कैसे फंसी है 2024 की सियासत

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated May 16, 2023, 08:58 AM IST

Karnataka CM: आइए जानते हैं डीके शिवकुमार की ताकत क्या है? उनकी नाराजगी कांग्रेस के लिए कितनी भारी पड़ सकती है? 2024 के लोकसभा चुनाव पर इसका क्या असर पड़ेगा? शिवकुमार के लिए कांग्रेस के पास क्या प्रस्ताव है? और राजस्थान के नेता सचिन पायलट से उनकी तुलना क्यों हो रही है?

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कर्नाटक सीएम का ऐलान आज संभव

Photo : PTI

Karnataka CM: कर्नाटक का मुख्यमंत्री (Karnataka CM post) कौन होगा? चुनाव जीतने के बाद से लेकर अब तक कांग्रेस (Congress) इस सवाल का हल नहीं ढूंढ पाई है। दिल्ली से लेकर कर्नाटक (Karnataka) तक इस सवाल को लेकर खूब मंथन हो रहा है। कांग्रेस के ऑब्जर्वर अपनी रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (Mallikarjun kharge ) को सौंप चुके हैं। संभव है कि मुख्यमंत्री (Karnataka CM) के नाम को लेकर आज ऐलान हो जाए।

इस बीच खबर है कि दिल्ली में कर्नाटक के दिग्गज नेता सिद्धारमैया (Siddaramaiah) के नाम पर सहमति बन चुकी है। उन्होंने कल संकेत भी दिया था कि उनके पास करीब 90 विधायकों का समर्थन है। सिद्धारमैया कल से दिल्ली में ही डेरा जमाए हुए हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री के नाम के ऐलान को लेकर एक बड़ा डर डीके शिवकुमार (DK Shivakumar) की नाराजगी है। कांग्रेस आलाकमान (Congress) किसी भी सूरत में शिवकुमार को नाराज नहीं करना चाहता है। पार्टी के बड़े नेताओं को डर है कि कहीं इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव (2024 Lok Sabha Election) पर न पड़े और डीके शिवकुमार राजस्थान की तरह दूसरे 'पायलट' न बन जाएं। ऐसे में पार्टी एक-एक कदम फूंक कर रख रही है।

ऐसे में आइए जानते हैं डीके शिवकुमार की ताकत क्या है? उनकी नाराजगी कांग्रेस के लिए कितनी भारी पड़ सकती है? 2024 के लोकसभा चुनाव पर इसका क्या असर पड़ेगा? शिवकुमार के लिए कांग्रेस के पास क्या प्रस्ताव है? और राजस्थान के नेता सचिन पायलट से उनकी तुलना क्यों हो रही है?

पहले शिवकुमार की ताकत क्या है?

कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी ऑर्गेनाइजेशनल स्किल है। राज्य में उन्होंने जिस तरह से पार्टी को एक किया और युवाओं को जोड़ा, उसकी मिसाल आलाकमान भी मानता है। दूसरी बात वह वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, जिसकी आबादी कर्नाटक में करीब 11 प्रतिशत है। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान इस समुदाय की नाराजगी भी मोल नहीं लेना चाहता है। तीसरी और सबसे अहम बात शिवकुमार कर्नाटक में कांग्रेस के संकटमोचक रहे हैं और उन्होंने समय-समय पर पार्टी के प्रति अपनी वफादारी का भी प्रमाण दिया है।

नाराजगी का क्या पड़ेगा असर?

शिवकुमार की ताकत को देखते हुए ही पार्टी उनकी नाराजगी को मोल नहीं लेना चाहता है। पार्टी आलाकमान को पता है कि इसका सीधा असर 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। दरअसल, कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं। वर्तमान में राज्य में कांग्रेस का सिर्फ एक सांसद है। पार्टी यहां कम से कम 15 से 20 सीटें जीतने का ख्वाब देख रही है और इसे पूरा करने के लिए उन्हें संगठन में डीके शिवकुमार की जरूरत पड़ेगी। दरअसल, जिस तरह से उन्होंने विधानसभा चुनाव को मैनेज किया और कांग्रेस को जीत दिलाई उसी तरह पार्टी लोकसभा चुनाव में भी उनकी भूमिका को देख रही है।

शिवकुमार के लिए क्या प्रस्ताव?

पार्टी सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि कांग्रेस आलाकमान शिवकुमार को डिप्टी सीएम और महत्वपूर्ण मंत्रालय का प्रभार दे सकता है। कांग्रेस में इस समय एक व्यक्ति एक पद का नियम है, लेकिन शिवकुमार के लिए इस नियम को भी तोड़ा जा सकता है। पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव तक शिवकुमार को राज्य कांग्रेस अध्यक्ष भी बनाए रख सकती है। ऐसे में शिवकुमार कर्नाटक कांग्रेस प्रेसीडेंट के साथ डिप्टी सीएम भी हो सकते हैं।

पायलट से क्यों रही तुलना?

डीके शिवकुमार की तुलना राजस्थान कांग्रेस के नता सचिन पायलट से हो रही है। दरअसल, राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी के कहने पर सचिन पायलट ने जयपुर में डेरा जमाया और युवाओं को पार्टी से जोड़ा, जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी ने जीत दर्ज की थी। हालांकि, जब सीएम बनाने की बात आई तो आलाकमान राजस्थान के दिग्गज नेता अशोक गहलोत को नकार नहीं सकी और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, जिसके बाद सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच तकरार खुलकर सामने आई और समय-समय पर पायलट आलाकमान को अपनी ताकत का अहसास भी कराते रहते हैं। ठीक इसी तरह पार्टी को डर है कि कहीं डीके शिवकुमार भी राजस्थान की तरह दूसरे पायलट न बन जाएं।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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