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8000 साल पुराना है पॉपकॉर्न,मंदी में बना लोगों की पसंद, SC के फैसले से क्या होगा असर

  • Authored by: प्रशांत श्रीवास्तव
  • Updated Jan 4, 2023, 05:45 PM IST

Supreme Court Decision on Eating in Cinema Hall:पॉपकॉर्न और सिनेमा हाल का सैकड़ों साल पुराना नाता है। और 1930 के दशक में जब पूरी दुनिया मंदी के चपेट में थी, तो पॉप कॉर्न न केवल लोगों का सहारा बना।

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कैसे बना पॉपकॉर्न

Supreme Court Decision on Eating in Cinema Hall:सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हॉल के अंदर खाने-पीने की चीजों की बिक्री को लेकर अहम फैसला सुनाया बै। कोर्ट ने कहा है कि सिनेमा हॉल का प्रबंधन अंदर खाने-पीने की चीजों की बिक्री के लिए नियम और शर्तें तय करने का पूरी तरह से हकदार हैं। इस फैसले के बाद जम्मू हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द हो जाएगा, जिसमें उसने दर्शकों को सिनेमाघरों में बाहर से खाने-पीने की चीजों को ले जाने की इजाजत दी थी। इस फैसले के बाद इस बात पर बहस छिड़ गई है कि कैसे पॉपकॉर्न से लेकर दूसरी खाने-पीने की चीजें पर सिनेमा प्रबंधन मनमानी कीमतें वसूलता है। और इसमें सबसे ज्यादा चर्चा पॉप कॉर्न पर रहती है। असल में पॉपकॉर्न और सिनेमा हाल का सैकड़ों साल पुराना नाता है। और 1930 के दशक में जब पूरी दुनिया मंदी के चपेट में थी, तो पॉपकॉर्न न केवल लोगों का सहारा बना बल्कि सिनेमा हाल मालिकों को भी उम्मीद की किरण दिखाई।

8000 साल पुराना है इतिहास

वैसे तो पॉपकॉर्न आधुनिक समय में शहर की रेड़ियों से लेकर, शॉपिंग मॉल, सिनेमा हाल तक में लोगों की पसंद बना हुआ है। लेकिन इसका इतिहास करीब 8000 साल पुराना है। जो कि मक्के बना हुआ है। मक्का करीब 8000 साल पहले यह teosinte नाम की जंगली घास से बना था। जो कि मैक्सिको में पाई जाती थी। लेकिन बाद में इसका वाणिज्यिक उत्पादन होने लगा और यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय होता गया। और ऐसे साक्ष्य हैं कि भारत में यह 16 वीं शताब्दी में पहुंचा।

पहली मशीन शिकागो में बनी

18वीं शताब्दी में पॉपकॉर्न ने अमेरिका के घर-घर में जगह बना ली। और उसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि शिकागो में दुनिया की पहली पॉपकॉर्न बनाने वाली मशीन बनाई गई। इसके बाद पॉप कॉर्न ने लोगों को ऐसे दीवाना बनाया कि यह सिनेमाहॉल से लेकर घर पर लोगों के टाइमपास की पहली पसंद बन गया। साल 1929-30 में जब दुनिया में आर्थिक मंदी तो लोगों की उम्मीद बन गया। लोग कम कीमत की वजह से इसे पसंद करने लगे। और बिजनेसमैन ने इसका फायदा उठाया। समय के साथ बदलते इन्नोवेशन का ही असर है कि आज भारत में भी गली मार्केट से लेकर सिनेमा हॉल और मॉल तक यह पहुंच गया है। और कई बार तो इसकी कीमतें आम आदमी की जेब पर भारी पड़ जाती हैं।

प्रशांत श्रीवास्तव
प्रशांत श्रीवास्तवauthor

करीब 17 साल से पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ हूं। और इस दौरान मीडिया की सभी विधाओं यानी टेलीविजन, प्रिंट, मैगजीन, डिजिटल और बिजनेस पत्रकारिता में काम करने का मौका मिला। इस समय Timesnowhindi.com में टीम लीड के रुप में बिजनेस, ऑटो, यूटीलिटी, टेक सेक्शन में अपना योगदान दे रहा हूं। करियर का पहला ब्रेक हैदराबाद स्थित मीडिया संस्थान ईटीवी से टेलीविजन के जरिए हुआ। यहां पर टेलीविजन पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का मौका मिला। और उसके बाद अगला पड़ाव दिल्ली स्थित दैनिक भास्कर समूह का बिजनेस भास्कर रहा। यहां से बिजनेस पत्रकारिता में कदम रखा। और यह सफर वित्त मंत्रालय की रिपोर्टिंग से लेकर बैंकिंग, इंश्योरेंस, ऑटो, एफएमसीजी, एमएमएमई, टेलीकॉम सेक्टर की ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर कॉरपोरेट जगत की खबरें और इकोनॉमी से जुड़ी खबरों से गुजरते हुए अमर उजाला, मनी भास्कर वेबसाइट से होकर आउटलुक मैगजीन पहुंचा। यहां पर पॉलिटिकल खबरों को करने का मौका मिला। आउटलुक में रहते हुए भाजपा और कांग्रेस पार्टी को भी कवर किया। इस दौरान दिल्ली दंगों पर ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर सीएए आंदोलन, किसान आंदोलन और कृषि जगत, वाइल्ड लाइफ से जुड़ी ग्राउंड रिपोर्ट भी करने का मौका मिला। करियर के इस सफर में 2014 लोक सभा चुनाव, 2019 लोक सभा चुनाव, इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव, राजस्थान विधान सभा, मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव की ग्राउंड रिपोर्ट भी की। पिछले 16 साल से केंद्रीय बजट की बारीकियों को समझकर उसे आम भाषा में लोगों तक पहुंचाने का भी प्रयास किया है। 17 साल के करियर में करीब 10 साल डिजिटल मीडिया का अनुभव रहा है। पिछले 3 साल से टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। पत्रकारिता का ककहरा माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से सीखा है।

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