गुजरात के कच्छ जिले के नलिया ग्रासलैंड में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (घोराड़) संरक्षण प्रयासों को बड़ा झटका लगा है। 26 मार्च को ‘जंप स्टार्ट’ तकनीक से जन्मा चूजा पिछले 3-4 दिनों से लापता है। वन विभाग और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की टीम द्वारा लगातार निगरानी और सर्च ऑपरेशन के बावजूद उसका कोई पता नहीं चल पाया है।
किसी जंगली शिकारी का शिकार हो गया होगा चूजा
अधिकारियों के अनुसार, चूजे को आखिरी बार 16 अप्रैल के आसपास देखा गया था। इसके बाद से वह अपनी टैग की गई मां के पास भी नजर नहीं आया, हालांकि मां के लोकेशन सिग्नल मिलते रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि यह चूजा किसी जंगली शिकारी का शिकार हो गया होगा, क्योंकि यह इलाका प्राकृतिक रूप से लोमड़ी, मॉनिटर लिज़र्ड और शिकारी पक्षियों का आवास है।
50 से अधिक गार्ड कर रहे थे निगरानी
इस चूजे को जन्म के बाद VVIP स्तर की सुरक्षा दी गई थी, जिसमें 50 से अधिक गार्ड, 24 घंटे निगरानी, वॉच टावर और सीमित प्रवेश जैसी व्यवस्थाएं शामिल थीं। बावजूद इसके, इसका गायब होना अब पूरे संरक्षण तंत्र पर सवाल खड़े कर रहा है।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की फाइल फोटो।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी
विशेषज्ञों का कहना है कि घोराड़ जमीन पर घोंसला बनाने वाली प्रजाति है, जिसके कारण शुरुआती महीनों में मृत्यु दर काफी अधिक रहती है। ‘जंप स्टार्ट’ तकनीक अंडों को सुरक्षित रखने में मददगार होती है, लेकिन जन्म के बाद जीवित रहने की संभावना को बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा पाती।
वन विभाग के अनुसार, वैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह सामने आया है कि करीब 40% अंडों से ही चूजे निकल पाते हैं और उनमें से भी लगभग 60% ही पहले दो महीनों तक जीवित रह पाते हैं। शुरुआती चरण में चूजे उड़ नहीं पाते, जिससे वे शिकारियों के लिए आसान लक्ष्य बन जाते हैं।
इस घटना के बाद सुरक्षा उपायों की समीक्षा की जा रही है। यह भी जांच हो रही है कि क्या घोंसले के आसपास सुरक्षा व्यवस्था समय पर और पूरी तरह लागू की गई थी या उसमें कोई चूक रह गई।
गौरतलब है कि गुजरात में पहले ही इस प्रजाति की स्थिति बेहद नाजुक है। 2018 में राज्य का एकमात्र नर घोराड़ लापता हो गया था, जिसके बाद अब केवल तीन मादा ही बची हैं। हाल ही में जन्मे चूजे के बाद दो मादा पक्षियों को टैग किया गया है ताकि भविष्य में बेहतर निगरानी हो सके।
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस झटके के बावजूद ‘जंप स्टार्ट’ तकनीक के जरिए संरक्षण प्रयास जारी रहेंगे। इसके तहत आवास सुधार, फेंसिंग मजबूत करने, पानी की व्यवस्था और शिकारी प्रजातियों के प्रभाव को कम करने जैसे कदम आगे भी उठाए जाएंगे।
