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लूना-25 से सबक: चंद्रयान-3 के सामने ये 5 बड़ी चुनौतियां, अगर पार कर ली बाधा तो चांद पर लहराएगा तिरंगा

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Aug 21, 2023, 05:50 AM IST

Chandrayaan-3: रूस का लूना-25 चांद की सतह से टकराकर यह क्रैश हो गया। इस खबर के साथ ही भारत के लोगों की धड़कनें भी बढ़ गई हैं। लूना-25 से सबक लेते हुए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो चंद्रयान-3 की चांद पर सुरक्षित लैंडिंग कराने के लिए एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रही है। ऐसे में आइए जानते हैं चंद्रयान-3 के सामने अब पांच बड़ी चुनौतियां क्या हैं...

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चंद्रयान-3 के सामने बड़ी चुनौतियां

Photo : Twitter

Chandrayaan-3: भारत का मून मिशन चंद्रयान-3 इतिहास रचने से बस चंद कदम दूर है। चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग के अंतिम चरणों में है। अगर सबकुछ ठीक रहा तो 23 अगस्त को 6 बजकर 4 मिनट पर चांद पर तिरंगा लहराएगा और ऐसा करने वाला भारत दुनिया में चौथा देश बन जाएगा। हालांकि, चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग से पहले रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने एक दुखद खबर सुनाई है।

रूस का चंद्र मिशन फेल हो गया है। इसके साथ ही चांद पर फिर से पहुंचने का रूस का सपना भी टूट गया। लूना-25 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर 21-22 अगस्त को लैंडिंग करनी थी। हालांकि, यह चांद की सतह से टकराकर यह क्रैश हो गया। इस खबर के साथ ही भारत के लोगों की धड़कनें भी बढ़ गई हैं। लूना-25 से सबक लेते हुए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो चंद्रयान-3 की चांद पर सुरक्षित लैंडिंग कराने के लिए एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रही है। ऐसे में आइए जानते हैं चंद्रयान-3 के सामने अब पांच बड़ी चुनौतियां क्या हैं...

1. 100 किलोमीटर ऊंचाई पर वायुमंडल की कमी

चंद्रमा पर वायुमंडल की कमी का मतलब है कि पैराशूट जैसे पारंपरिक तरीके से लैंडर की गति को धीमा नहीं किया जा सकता है। ऐसे में चंद्रयान की गति को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती है। 100 किमी प्रति घंटे की गति को नियंत्रित करने के लिए पूरी तरह से थ्रस्टर्स पर निर्भर रहना पड़ता है। किसी भी गलत अनुमान से असफल लैंडिंग हो सकती है, जैसा कि लूना-25 के साथ देखा गया है।

2. 30 किमी प्रति घंटे और 100 मीटर की ऊंचाई के बीच

यह एक महत्वपूर्ण चरण है। यह वह चरण है जहां चंद्रयान-2 को विफलता का सामना करना पड़ा था। इसी चरण को लेकर वैज्ञानिक सबसे ज्यादा चिंतित भी हैं। लैंडिंग के इस चरण के दौरान गति पर सटीक नियंत्रण आवश्यक है, और सॉफ़्टवेयर त्रुटियों के परिणामस्वरूप नियंत्रण खो सकता है। एक सेकंड की देरी या समय से पहले गलत कमांड से भी नुकसान हो सकता है।

3. 100 मीटर पर अप्रत्याशित भू-भाग परिवर्तन

चंद्रमा की सतह भू-भागों के अचानक परिवर्तनों से भरी हुई है। इसमें क्रेटर और चट्टानें शामिल हैं जो लैंडिंग पाथ में अप्रत्याशित बदलाव का कारण बन सकती हैं। ये बदलाव लैंडर को निर्देशित करने वाले सेंसर में त्रुटियां पैदा कर सकते हैं। इसके लिए मजबूत एल्गोरिदम की आवश्यकता होगी।

4. लैंडिंग के दौरान चंद्रमा पर धूल

थ्रस्टर्स का फोर्स अंतिम चरण के दौरान चंद्रमा पर धूल पैदा कर सकता है, जिससे संभावित रूप से कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। धूल सेंसर के साथ समस्या पैदा कर सकती है, जिससे गलत रीडिंग और गलत समायोजन हो सकता है। धूल कैमरे के लेंस को भी अस्पष्ट कर सकती है, जिससे गति कम होने के बाद भी बाधा उत्पन्न हो सकती है। इससे थ्रस्टर शटडाउन भी हो सकता है।

5. चंद्रमा पर भूकंपी गतिविधियां

चंद्रमा की सतह पर भूकंपीय गतिविधियां अप्रत्याशित रूप से हो सकती हैं। लैंडिंग के दौरान एक भी भूकंप लैंडर के संतुलन को बाधित कर सकता है। खास बात यह है कि भूकंप की पूरी तरह से योजना नहीं बनाई जा सकती या उसे कम नहीं किया जा सकता है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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