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क्या है दल बदल विरोधी कानून? क्या हैं इसके प्रावधान; AAP के दो-तिहाई बागी MP के BJP में जानें के क्या मायने

आम आदमी पार्टी के तीन राज्यसभा सांसदों राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक के पार्टी छोड़ने और भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की बात पर ये जानना जरूरी है कि दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) क्या है? क्या ये राजनेताओं के किसी सवैंधानिक पद पर रहते हुए ये करने की इजाजत देता है?

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क्या है दल-बदल विरोधी कानून (फोटो-AI)

अक्सर आप सुनते होंगे कि फलां पार्टी के माननीय सवैंधानिक पद पर रहते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया या पार्टी छोड़ दी। राजनीति में अक्सर 'आया राम, गया राम' जैसी घटनाओं ने कई सवाल खड़े किए। इन्हीं घटनाओं पर रोक लगाने के लिए देश में दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) लागू किया गया था। यह कानून जनप्रतिनिधियों को पार्टी बदलने से रोकता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने का प्रयास करता है। इस कानून की चर्चा अब इसलिए भी तेज हो गई है क्योंकि 24 अप्रैल 2026 को आम आदमी पार्टी (AAP) के तीन सांसदों राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 'आप' को आधिकारिक तौर पर अलविदा कह दिया और भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने दावा किया कि उन्हें पार्टी के दो-तिहाई सांसदों का समर्थन हासिल है। लिहाजा वे पार्टी (AAP) को भारतीय जनता पार्टी के साथ विलय करेंगे।

भारतीय राजनीति में ये एक बड़ी घटना के तौर पर देखी जा रही है। यानी जिस पार्टी को बड़े आंदोलन के बाद खड़ा किया गया, आज वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती दिखाई देगी। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव ने अरविंद केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाए और साथ ही दावा किया कि आम आदमी पार्टी के दो तिहाई से ज्यादा सांसद हमारे साथ हैं।

आप से दूर होने वाले सांसद कौन हैं

  • राघव चड्ढा
  • संदीप पाठक
  • राजिंदर गुप्ता
  • विक्रमजीत सिंह साहनी
  • अशोक मित्तल
  • स्वाति मालीवाल
  • हरभजन सिंह

क्या कहता है कानून

कानून ये कहता है कि अगर किसी पार्टी से दो तिहाई सदस्य टूटकर किसी अन्य पार्टी में शामिल होते हैं तो उनका पद बना रहेगा। यानी विधायक, सांसद का पद बचा रहेगास लेकिन अगर संख्या कम होती है तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। ऐसे में न तो दलबदल रहे सदस्यों पर कानून लागू होगा और न ही राजनीतिक दल पर।

अपवाद : यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। सदन में दल-बदल से संबंधित अयोग्यता का फैसला लेने का अंतिम अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी (स्पीकर या अध्यक्ष) को होता है। इसमें स्पीकर का निर्णय अंतिम होता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस पर न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य हो जाता है।

दरअसल, नेताओं की पार्टियों में अस्थिरता को लेकर वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए देश में दलबदल विरोधी कानून पारित किया गया और इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय राजनीति में दलबदल के चलन को समाप्त करना था। इस कानून के तहत किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि -:

  • एक निर्वाचित मेंमर अपनी स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।
  • कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
  • किसी सदस्य द्वारा सदन में पार्टी के रुख के विपरीत वोट किया जाता है।
  • कोई सदस्य स्वयं को वोटिंग प्रक्रिय से अगल रखता है।
  • छह महीने की अवधि के बाद कोई भी मनोनित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
  • कानून कहता है कि सदन के अध्यक्ष के पास सदस्यों को अयोग्य करार देने संबंधी निर्णय लेने की शक्ति है। अध्यक्ष जिस दल से है, यदि शिकायत उसी दल से संबंधिक है तो सदन की ओर से चुने गए किसी अन्य सदस्य को इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है।

क्यों दलबदल कानून की पड़ी जरूरत

स्वतंत्रता के कुछ समय बाद ही यह एक परिपाटी चली की राजनीतिक दल अपने सामूहिक जनादेश की अनदेखी करने लगे। विधायकों सांसदों को जोड़-तोड़ से सरकारें बनने और गिरने लगीं। इसमें सबसे अहम किरदार 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने महज 15 दिनों के भीतर तीन बार दल बदलकर इस मुद्दे को राजनीति की मुख्यधारा में ला दिया। उस दौर में आया राम गया की राजनीति देश में काफी प्रचलित हो गई थी। तमाम तस्वीरें और राजनीतिक अस्तित्व के लिए आखिरकार 1985 में संविधान में संशोधन कर यह काननू लाया गया। हालांकि, इसके बाद भी हालात कुछ ज्यादा नहीं बदले।

शिवसेना बड़ा उदाहरण

हालिया के दिनों में कई ऐसी राजनीतिक घटनाओं में महाराष्ट्र में दिखी जब शिवसेना के दो फाड़ हो गये। इससे पार्टी के दो तिहाई विधायकों का समर्थन लेकर एकनाश शिंदे ने मूलत: बाला साहेब ठाकरे की पार्टी के आधिकारिक उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे को कड़ी चुनौती दी और पार्टी और वास्तविक चुनाव चिन्ह अपने पाले में कर लिया।

दरअसल, शिंदे शिवसेवा के जमीनी स्तर के नेता थे और विधायकों के बीच उनकी काफी पकड़ थी। उन्होंने विधायकों को विश्वास दिलाया कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में वे अगला चुनाव नहीं जीत पाएंगे, जिसके बाद उनके साथ 37 विधायक गए। शिंदे गुट ने असली शिवसेना होने का दावा किया। फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने बहुमत के आधार पर शिंदे को 'शिवसेना' का नाम और धनुष-बाण का चुनाव चिन्ह सौंप दिया।

Pushpendra kumar
पुष्पेंद्र कुमारauthor

पुष्पेंद्र कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में चीफ कॉपी एडिटर के रूप में सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं। जर्नलिज्म में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद से वे पिछले 7 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने 10,000 से अधिक खबरें लिखी हैं। पुष्पेंद्र हाइपर-लोकल मुद्दों, रेलवे, रोड, इंफ्रास्ट्रक्चर, डेवलपमेंट, कृषि और मौसम से जुड़ी खबरों पर गहरी पकड़ रखते हैं। शहर से लेकर गांव-देहात तक की संवेदनशीलताओं को समझते हुए वे लोकल खबरों को ऐसा रूप देते हैं जो न केवल तथ्यपूर्ण होता है, बल्कि पाठकों से भावनात्मक रूप से भी जुड़ता है।

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