Anti Conversion Law in India: महाराष्ट्र के नागपुर में एक ऐसा केस सामने आया, जिससे कई सवाल उठने लगे। नागपुर के सोनेगांव पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर (FIR) के मुताबिक, एक वायुसेना कर्मी की पत्नी को उसके पुराने स्कूल परिचित अयाज ताज मदारे ने संपत्ति के सौदे के बहाने होटल में बुलाया। आरोप है कि वहां महिला के ड्रिंक में नशीला पदार्थ मिलाकर उसे बेहोश किया गया और उसके आपत्तिजनक वीडियो व तस्वीरें रिकॉर्ड कर ली गईं।
डरा-धमकाकर कराया धर्म परिवर्तन
इसके बाद आरोपी अयाज ने उन वीडियो के जरिए महिला को ब्लैकमेल करना शुरू किया, उसके पति को वीडियो भेजने की धमकी दी और उससे 3 से 4 लाख रुपये वसूले। 31 मई को अयाज और उसके साथी अमीन शेख ने महिला को जबरन कलमेश्वर के एक ठिकाने पर ले जाकर मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से बुलाए गए मौलाना (हजरत मौलाना) के जरिए जबरन 'कलमा' पढ़वाया और जबरदस्ती निकाह करा दिया। महिला का आरोप है कि उसे कोई नशीला लिक्विड पिलाकर 'सम्मोहन/काला जादू' करने की भी कोशिश की गई। पुलिस ने मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और फरार मौलाना की तलाश की जा रही है। FIR में रेप, बार-बार यौन शोषण, जबरन वसूली, ब्लैकमेलिंग और काला जादू व जबरदस्ती करने के खिलाफ कानूनों के तहत सख्त धाराएं शामिल हैं।
भारत के किन राज्यों में लागू है धर्मांतरण विरोधी कानून?
भारत में केंद्रीय स्तर पर (Federal Law) जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए कोई एक राष्ट्रीय कानून नहीं है। हालांकि, अलग-अलग राज्य अपने यहाँ 'Freedom of Religion Act' (धर्म की स्वतंत्रता का कानून) के तहत इसे रेगुलेट करते हैं। वर्तमान में देश के 12 राज्यों में यह कानून पूरी तरह प्रभावी है, जिसमें महाराष्ट्र सबसे नया राज्य बना है:
राज्य का नाम- कानून लागू होने/संशोधन का वर्ष
ओडिशा- 1967 (देश में सबसे पहले)
मध्य प्रदेश- 1968 (2021 में कानून को बेहद सख्त किया गया)
अरुणाचल प्रदेश- 1978 (हालांकि इसके नियम अभी पूरी तरह फ्रेम होना बाकी हैं)
छत्तीसगढ़- 2000 / 2006 (हाल ही में विधायी कड़ाई की गई)
गुजरात- 2003 (2021 में संशोधित)
हिमाचल प्रदेश- 2006 (2019 में नया और कड़ा कानून लाया गया)
झारखंड- 2017
उत्तराखंड- 2018
उत्तर प्रदेश- 2020
कर्नाटक- 2022
राजस्थान- हाल ही में एक नया कड़ा समेकित विधेयक पारित किया गया
महाराष्ट्र- मार्च 2026 में 'महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम 2026' पारित
कैसे काम करते हैं ये कानून और इनमें क्या हैं मुख्य प्रावधान?
इन कानूनों का मूल उद्देश्य बल (Force), धोखाधड़ी (Fraud), गलत बयानी (Misrepresentation), लालच (Allurement) या जबरदस्ती (Coercion) के जरिए कराए जाने वाले धार्मिक परिवर्तनों को रोकना है। नए कानूनों के तहत नियम और सजाएं काफी सख्त कर दी गई हैं:
'अवैध तरीकों' की परिभाषा: इसके तहत यदि किसी को मुफ्त शिक्षा, नौकरी, नकद राशि, बेहतर लाइफस्टाइल का लालच देकर या शादी का झांसा देकर (Allurement) धर्म बदलवाया जाता है, तो उसे अपराध माना जाएगा। महाराष्ट्र के नए 2026 के कानून में 'शिक्षा के माध्यम से ब्रेनवाश करना' भी अपराध के दायरे में शामिल है।
पहले से नोटिस देना अनिवार्य: यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से भी धर्म बदलना चाहता है, तो उसे और धर्म परिवर्तन कराने वाले गुरु/पादरी/मौलाना को कम से कम 30 से 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित नोटिस देना होता है। बिना प्रशासनिक अनुमति के किया गया धर्मांतरण कानूनी रूप से अमान्य घोषित कर दिया जाता है।
आरोपी पर सबूत का दारोमदार (Burden of Proof): सामान्य फौजदारी कानून में पुलिस या पीड़ित को गुनाह साबित करना होता है। लेकिन इन कानूनों के तहत 'बर्डन ऑफ प्रूफ' आरोपी पर होता है। यानी जिस व्यक्ति पर धर्म परिवर्तन कराने का आरोप है, उसे ही अदालत में साबित करना होगा कि उसने कोई जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लालच नहीं दिया।
शादी शून्य (Void) घोषित होना: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अब महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यदि यह पाया जाता है कि शादी का एकमात्र उद्देश्य केवल धर्म परिवर्तन कराना था, तो अदालत ऐसी शादियों को अमान्य घोषित कर देती है।
कड़ी सजा का प्रावधान: सामान्य उल्लंघन पर 1 से 5 साल की सजा होती है। लेकिन यदि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति नाबालिग, महिला या अनुसूचित जाति (SC)/अनुसूचित जनजाति (ST) से है, तो सजा बढ़कर 7 से 10 साल तक की कठोर कैद और भारी जुर्माने में बदल जाती है। महाराष्ट्र के नए कानून में भी महिलाओं/नाबालिगों के मामले में 5 लाख रुपये तक का जुर्माना और गैर-जमानती धाराओं का प्रावधान है।
संवैधानिक बहस: क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट?
धर्मांतरण विरोधी इन राज्य कानूनों की वैधता को लेकर देश के कानूनी हलकों में हमेशा से एक बड़ी बहस रही है।
स्टैनिसलॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977) ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस लैंडमार्क फैसले में साफ कहा था कि संविधान का अनुच्छेद 25 (Article 25) प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका अभ्यास करने और उसका प्रचार करने का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन इसमें किसी दूसरे व्यक्ति का जबरन धर्म परिवर्तन कराने का मौलिक अधिकार शामिल नहीं है। कोर्ट ने माना था कि लोक व्यवस्था (Public Order) बनाए रखने के लिए राज्य ऐसे कानून बना सकते हैं।
दूसरा पक्ष: नागरिक अधिकार संगठनों और अल्पसंख्यक निकायों का तर्क है कि इन कानूनों के नए संस्करण (जैसे जबरन एफआईआर का प्रावधान या 60 दिन पहले नोटिस देना) नागरिकों के गोपनीयता के अधिकार (Right to Privacy), व्यक्तिगत स्वायत्तता और अपनी पसंद से जीवन जीने की आजादी का उल्लंघन करते हैं। वर्तमान में कई राज्यों के इन कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष लंबित हैं।
