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World Thalassemia Day 2026: भारत क्यों बनता जा रहा है थैलेसीमिया की राजधानी? हर साल हजारों बच्चे हो रहे शिकार

हर साल 8 मई को मनाया जाने वाला विश्व थैलेसीमिया दिवस इस रोग की बढ़ती संख्या, जागरुकता और चुनौतियों की ओर इशारा करता है। आइए आज जानते हैं भारत में थैलेसीमिया के बढ़ते मामलों के बारे में..

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विश्व थैलेसीमिया दिवस 2026

World Thalassemia Day 2026: हर साल 8 मई को मनाया जाने वाला World Thalassemia Day सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की कहानी है जो इस गंभीर आनुवांशिक बीमारी से जूझ रहे हैं। इस वर्ष का थीम “Hidden No More: Finding the Undiagnosed, Supporting the Unseen” उन लोगों पर ध्यान केंद्रित करता है जो थैलेसीमिया के वाहक हैं, लेकिन खुद इससे अनजान हैं। भारत में यह विषय इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश को अक्सर “थैलेसीमिया की राजधानी” कहा जाता है। आइए जानते हैं क्या है थैलेसीमिया (Thalassemia in India) और क्यों बढ़ रहे इसके मामले?

क्या है थैलेसीमिया?

थैलेसीमिया एक आनुवांशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन की कमी के कारण शरीर में खून की कमी, कमजोरी, थकान और कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने लगती हैं। यह बीमारी माता-पिता से बच्चों में पहुंचती है। यदि दोनों माता-पिता इस बीमारी के वाहक हों, तो बच्चे में थैलेसीमिया होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

भारत में क्यों बढ़ रही है समस्या?

भारत में करीब 35 से 50 मिलियन लोग β-थैलेसीमिया के वाहक माने जाते हैं। हर साल हजारों बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह जागरूकता की कमी है। अधिकांश लोगों को यह तक पता नहीं होता कि वे इस बीमारी के कैरियर हैं।

देश के कई हिस्सों में निकट संबंधियों में विवाह की परंपरा भी इस बीमारी के फैलाव का एक बड़ा कारण मानी जाती है। इसके अलावा शादी से पहले स्क्रीनिंग और आनुवांशिक जांच को लेकर समाज में अभी भी गंभीरता की कमी है।

Thalassemia (थैलेसीमिया)

Thalassemia (थैलेसीमिया)

जिंदगी भर का इलाज और भारी खर्च

थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को हर 3 से 4 सप्ताह में ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। लगातार ब्लड ट्रांसफ्यूजन के कारण शरीर में आयरन बढ़ने लगता है, जिसके लिए अलग से दवाइयां और उपचार की आवश्यकता होती है। ऐसे में एक बच्चे के इलाज पर हर साल लाखों रुपये तक का खर्च आ सकता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट इस बीमारी का एक संभावित इलाज माना जाता है, लेकिन इसकी लागत इतनी अधिक होती है कि ज्यादातर परिवारों के लिए यह संभव नहीं हो पाता। आर्थिक दबाव के साथ-साथ मानसिक तनाव भी पूरे परिवार को प्रभावित करता है।

क्या थैलेसीमिया की रोकथाम संभव है?

सबसे राहत देने वाली बात यह है कि थैलेसीमिया पूरी तरह रोकथाम योग्य बीमारी है। यदि शादी से पहले दोनों लोगों की स्क्रीनिंग कराई जाए, तो बीमारी के जोखिम का पता लगाया जा सकता है। एक साधारण रक्त जांच से यह मालूम हो सकता है कि कोई व्यक्ति थैलेसीमिया का वाहक है या नहीं।

दुनिया के कई देशों ने प्री-मैरिटल स्क्रीनिंग और जनजागरूकता अभियानों के जरिए नए मामलों में बड़ी कमी लाई है। भारत भी इस दिशा में मजबूत कदम उठा सकता है, बशर्ते सरकार, स्वास्थ्य संस्थाएं और समाज मिलकर काम करें।

जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार

आज जरूरत इस बात की है कि थैलेसीमिया को लेकर डर नहीं, बल्कि जानकारी फैलाई जाए। स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग कैंप लगाए जाएं। युवाओं को शादी से पहले जांच कराने के लिए प्रेरित किया जाए। World Thalassemia Day हमें यह याद दिलाता है कि एक छोटी-सी जांच भविष्य की पीढ़ियों को बड़ी तकलीफ से बचा सकती है। आज किया गया एक रक्त परीक्षण कल किसी बच्चे की जिंदगी बदल सकता है।

gulshan kumar
गुलशन कुमारauthor

गुलशन कुमार टाइम्स नाउ हिंदी डिजिटल के हेल्थ सेक्शन से जुड़े हैं। फिटनेस और योग के प्रति उनकी रुचि उन्हें हेल्थ जर्नलिज्म की ओर लेकर आई, जहां वे आम लोगों की जीवनशैली, सेहत और वेलनेस से जुड़े विषयों पर लगातार काम कर रहे हैं। गुलशन अबतक 2,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। उनके लेखों में आसान भाषा में दी गई जानकारी, रिसर्च-बेस्ड टिप्स और रोजमर्रा की सेहत से जुड़े विषयों की स्पष्ट समझ दिखाई देती है। हेल्थ अवेयरनेस को बढ़ावा देना, फिटनेस को सरल तरीके से समझाना और बेहतर लाइफस्टाइल के लिए उपयोगी सुझाव देना—गुलशन की लेखन शैली की खासियत है।

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