पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 2021 से आगे बढ़ते हुए ऐतिहासिक परिणाम हासिल किए हैं। मगर यह कोई साल दो साल की मेहनत या मैनेंजमेंट का कमाल नहीं है। दरअसल, अगर देखें तो पाएंगे कि पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय तक करिश्माई नेतृत्व,आक्रामक चुनावी अभियान और पहचान-आधारित राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही है। बंगाल के इस पारंपरिक ढांचे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उभार भीतर धीरे-धीरे, लेकिन बेहद योजनाबद्ध तरीके से हुआ। 2026 के विधानसभा चुनाव को लेकर जो नैरेटिव सामने आता है,उसमें दिखता है कि बंगाल में'दीदी के तिलस्म'को कमजोर करने आरएसएस की लंबी और माइक्रो मैनेजमेंट रणनीति का सबसे अहम योगदान रहा। हालांकि इसे समझने के लिए बंगाल में आरएसएस के इतिहास और उसके संगठनात्मक विस्तार के साथ ही सामाजिक हस्तक्षेप और चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट, इन सभी बिंदुओं को जोड़कर देखना होगा।
2021 के परिणाम से सीखकर बनाई खास रणनीति
अभी के परिणामों का मंथन करने से पहले हम चलते हैं 2021 के विधानसभा चुनाव की ओर, जब पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया और 2016 में मिली तीन सीटों की तुलना में 77 सीटें हासिल कर सभी को चौंका दिया। हालांकि भगवा पार्टी तब भी सत्ता तक नहीं पहुंच सकी थी। लेकिन यहीं से पश्चिम बंगाल में भाजपा ने खुद को मजबूत विकल्प के रूप में पेश करना शुरू कर दिया।उन परिणामों के बाद RSS ने भी निष्कर्ष निकाला कि बंगाल में सिर्फ 'लहर'से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से धीरे-धीरे आगे बढ़ना होगा। 2021 के तुरंत बाद संघ ने तीन स्तरों पर काम शुरू किया:
- संगठन को गहराई तक ले जाना,
- सामाजिक मुद्दों की पहचान,
- स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल।
बंगाल से संघ का रिश्ता सदियों पुराना
RSS का बंगाल से रिश्ता नया नहीं है। 1930 के दशक से ही यहां शाखाएं और वैचारिक गतिविधियां शुरू हो चुकी थीं। एम.एस. गोलवलकर, दत्तोपंत ठेंगड़ी, एकनाथ रानाडे जैसे नेताओं ने बंगाल को संगठन विस्तार के लिहाज से अहम माना, इतना ही नहीं वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत के दौर में भी संघ का बंगाल पर फोकस रहा। हालांकि,वामपंथी राजनीति और बाद में तृणमूल के उभार ने आरएसएस को बंगाल में लंबे समय तक 'सीमित प्रभाव'वाले संगठन के रूप में ही बनाए रखा। वहां टर्निंग पॉइंट 2012-13 में आया,जब स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती के कार्यक्रमों ने युवाओं के बीच एक नई वैचारिक ऊर्जा पैदा की। यहीं से 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'का बीज तेजी से बोया जाने लगा। फिर 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार आई और आरएसएस ने बंगाल फतह करने की अपनी तैयारी और तेज कर दी। जिसका परिणाम 2021 के विधानसभा चुनावों में दिखा।
शाखाओं का प्रसार
2026 से पहले बंगाल में आरएसएस के तीन क्षेत्रीय प्रभागों के तहत काम करता था। इनमें उत्तर बंग प्रांत, मध्य बंग प्रांत और दक्षिण बंग प्रांत थे। 2023 से 2025 के बीच RSS ने बंगाल में अपने ढांचे का तेज विस्तार किया। इसके तहत इन प्रांतों में शाखाओं की संख्या में विस्तार किया गया। नए कार्यकर्ता जोड़े गए।
- उत्तर बंग प्रांत में 2023 से 2025 के बीच शाखाओं की सख्या 1,034 से बढ़कर 1,153 हो गई।
- मध्य बंग प्रांत जिनमें पूर्व व पश्चिम बर्द्धमान,बीरभूम,बांकुड़ा,मुर्शिदाबाद और पुरुलिया जैसे जिले आते थे, वहां भी 2023 से 2025 के बीच 500 से अधिक नई शाखाएं जोड़ी गईं। इन जिलों में मार्च 2023 में जहां 1,320 शाखाएं थी,वहीं 2025 में यह संख्या 1,823 हो गई।
- ऐसा ही कुछ दक्षिण बंग प्रांत में दिखा। इस प्रांत में अधिकांश जिले दक्षिण बंगाल के थे। इनमें 2023 से 2025 के बीच शाखाओं की सख्या 1,206 से बढ़कर 1,564 हो गई।
वहीं, मार्च 2026 में संघ ने अपना सांगठनिक पुनर्गठन किया। इसके तहत पश्चिम बंगाल में भी पहले से मौजूद तीन प्रांतों (उत्तर, मध्य और दक्षिण)के स्थान पर अब 5 संभाग बनाए गए। इससे निर्णय लेने की गति,स्थानीय रणनीति और माइक्रो-मैनेजमेंट में सुधार हुआ।
सहयोगी संगठनों के इकोसिस्टम के सहारे समाज के हर वर्ग तक पहुंच
आरएसएस को जानने वाले यह बात अच्छे से जानते हैं कि वह अकेले नहीं काम करता, उसका पूरा 'संगठन परिवार'है। आरएसएस के इस सांगठनिक परिवार में समाज के हर वर्ग के बीच काम करने वाला एक उपसंगठन भी है। बंगाल में संघ का यह नेटवर्क उसके साथ ही कई स्तरों पर सक्रिय रहा। संघ के इस मल्टी-लेयर नेटवर्क ने समाज के अलग-अलग वर्गों में वैचारिक और भावनात्मक पहुंच बनाई,जो चुनावी समय पर उसके काम आया।

संघ के काम को इन संगठनों ने दी धार। (फोटो-AI)
'हिंदू सम्मेलनों के जरिए सांस्कृतिक राजनीति'
RSS ने शताब्दी वर्ष को एक बड़े मोबिलाइजेशन टूल के रूप में इस्तेमाल किया।संगठन की इकाइयों ने 2026 की शुरुआत से ही हिंदू जागरण मंच और विश्व हिंदू परिषद जैसे सहयोगियों की मदद से राज्य भर में करीब दो हजार से अधिक हिंदू सम्मेलन आयोजित किए।इनमें पंच परिवर्तन जैसे विषयों पर जोर दिया गया। इन पंच परिवर्तन में सामाजिक समरसता, पारिवारिक मूल्य, पर्यावरण, स्वदेशी स्वाभिमान और नागरिक कर्तव्य पर फोकस किया गया। इसके साथ ही बंगाल में हिंदुओं की एकता,भ्रष्टाचार,सांस्कृतिक सुरक्षा,जिहादी आक्रामकता और जनसांख्यिकीय चिंताओं पर भी जोर दिया। यहां दिलचस्प बात यह है कि संघ से वाम प्रभाव से भरे हुए बंगाल में सीधे राजनीतिक अपील के बजाय सांस्कृतिक और सामाजिक विमर्श के जरिए एक वैचारिक माहौल तैयार किया, जिसे बाद में चुनावी व्यवहार में बदला जा सके।
2026 के लिए संघ का साइलेंट कैंपेन
आमतौर पर देखें तो न सिर्फ बंगाल बल्कि ज्यादातर राज्यों में चुनावी प्रचार प्रसार आक्रामक ही होता है। मसलन बड़ी-बड़ी रैलियां, पोस्टरबाजी, जनसभाएं और रोड शो आदि। 2026 में बंगाल में चुनाव प्रचार में भी ऐसा ही दिखा। जहां अन्य पार्टियां सिर्फ इसी आक्रामक चुनाव प्रचार में लगी रहीं, वहीं, भाजपा और आरएसएस ने दोहरा गेम खेला। भाजपा और उसके नेता एक ओर रैलियां, रोड शो आदि कर रहे थे वहीं, दूसरी ओर आरएसएस ने इसका उल्टा मॉडल अपनाया उसने ‘माइक्रो-कनेक्ट’की रणनीति अपनाई। जिलों और कस्बों में फैले स्वयंसेवकों के नेटवर्क ने लोगों से घर-घर संपर्क साधा। चाय की दुकानों, मोहल्ला क्लबों,मंदिर प्रांगणों में करीब दो लाख से अधिक छोटी बैठकें आयोजित की। जो ज्यादा निजी और प्रभावी थे।
हिंदुत्व की प्रस्तुति में भी बदलाव
इस बार संघ ने हिंदुत्व की प्रस्तुति में भी बदलाव किया। सीधे राजनीतिक टकराव से बचते हुए परिचय और ‘पुनरावृत्ति’ पर जोर दिया गया। उसने अपनी विचारधारा लोगों के बीच किसी बड़े नेता के भाषण से नहीं, बल्कि परिचित लोगों जैसे दोस्तों,पड़ोसियों,स्थानीय चेहरों के जरिए धीरे-धीरे लोगों तक पहुंचाई। राजनीतिक मनोविज्ञान के लिहाज से यह तरीका ज्यादा भरोसेमंद होता है,क्योंकि व्यक्ति बाहरी प्रचार से ज्यादा अपने सामाजिक दायरे पर विश्वास करता है।
संघ का 'लोक मत परिष्कार' अभियान
इस चुनाव में RSS का सबसे दिलचस्प प्रयोग रहा उसका लोक मत परिष्कार अभियान। इसके जरिए उसने एक नैरेटिव कंस्ट्रक्शन मॉडल बनाया। इसके तहत उसने महिला सुरक्षा,भ्रष्टाचार और घुसपैठ जैसे मुद्दों को हथियार बनाकर लोगों को जागरूक किया। इन्हें उनके अस्तित्व,सुरक्षा और भविष्य से जोड़ा। साथ ही इन मुद्दों के खिलाफ लड़ाई के लिए लोगों को वोटिंग के अस्त्र का प्रयोग करने के लिए तैयार किया। जो बंगाल में बंपर मतदान के रूप में दिखा भी।
सामान्य हिंदू वोट की बजाय सामाजिक विस्तार पर फोकस
इस बार संघ ने केवल सामान्य हिंदू वोट पर निर्भर रहने के बजाय दलित और आदिवासी समुदायों से संपर्क साधा। मतुआ और राजबंशी जैसे समूहों पर फोकस किया। इसके अलावा, सीमावर्ती इलाकों में जागरूकता अभियान चलाकर हिंदू एकता का व्यापक सामाजिक आधार तैयार करने का प्रयास किया। व्हाट्सएप,लोकल वीडियो और सोशल मीडिया ने इस पूरी रणनीति को गति दी।
भाजपा-आरएसएस का बूथ मैनेजमेंट
चुनाव का असली खेल बूथ पर होता है, और भाजपा के साथ मिलकर संघ ने इसे बारीकी से संभाला। संघ ने हर बूथ पर 10 युवा स्वयंसेवकों को तैनात किया। अपने स्वयंसेवकों के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को वोटिंग के लिए न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि उन्हें मतदान केंद्र तक लेकर भी गए। टीएमसी की हलचलों पर नजर रखी और किसी भी अव्यवस्था को लेकर ऊपर बैठे पदाधिकारियों तक जानकारी पहुंचाई, जिससे टीएमसी के लोग किसी तरह की अव्यवस्था नहीं कर पाए।
