Times Now Navbharat
live-tv
Premium

क्यों फिर शुरू हुई थर्ड फ्रंट की सुगबुगाहट, क्या कांग्रेस पर दरक रहा क्षेत्रीय दलों का भरोसा?

सूत्रों का कहना है कि लोकसभा चुनावों से पहले क्षेत्रीय दल एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को चुनौती देना चाहते हैं। इसी सिलसिले में मुलाकातों का क्रम शुरू हुआ है। खास बात यह है कि तीसरे मोर्चे से कांग्रेस को दूर रखने की कोशिश की जा रही है।

Image
शुरू हुई तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट। तस्वीर AI
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Sep 19, 2026, 14:53 IST
Follow on Google News

Third Front: विपक्ष में एक बार फिर सुगबुगाहट शुरू हुई है। इस सुगबुगाहट ने दक्षिण के राज्य तमिलनाडु से जोर पकड़ा है। दरअसल, पिछले कुछ दिनों में DMK सांसद कनिमोझी मुंबई में उद्धव ठाकरे से मिलीं, इसके बाद दिल्ली में शरद पवार और सुप्रिया सुले से उनकी मुलाकात हुई और फिर गुरुवार को वह कोलकाता में ममता बनर्जी के घर पहुंचीं। बताया जा रहा है कि बंद कमरे में दोनों नेताओं के बीच एक घंटे से ज्यादा बातचीत हुई। इन मुलाकातों को तीसरे मोर्चे के गठन से जोड़कर देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि लोकसभा चुनावों से पहले क्षेत्रीय दल एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को चुनौती देना चाहते हैं। इसी सिलसिले में मुलाकातों का क्रम शुरू हुआ है। खास बात यह है कि तीसरे मोर्चे से कांग्रेस को दूर रखने की कोशिश की जा रही है। क्षेत्रीय दलों को लगता है कि कांग्रेस के नेतृत्व में वे अपने राज्य में भाजपा को चुनौती दे सकने की स्थिति में नहीं रहेंगे लेकिन यह बात अभी खुले तौर से जाहिर होने नहीं दिया जा रहा है लेकिन भीतर ही भीतर एक राजनीतिक गठजोड़ तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

राजनीति में मुलाकातों का एक संदेश होता है

DMK का कहना है कि ये सिर्फ मुलाकातें हैं लेकिन राजनीति में मुलाकातों का क्रम अपने आप में एक संदेश होता है। तो क्या कांग्रेस को बाहर रखकर तीसरा मोर्चा बनाने की जमीन तैयार हो रही है? द प्रिंट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कनिमोझी जो DMK की नेता और लोकसभा सांसद हैं, ने गुरुवार को कोलकाता में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से उनके कालीघाट वाले आवास पर मुलाकात की। इससे पहले पिछले हफ्ते उन्होंने मुंबई में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे से मातोश्री में मुलाकात की। रिपोर्ट के अनुसार वहां परिसीमन बिल के गिरने, INDIA गठबंधन के भविष्य और क्षेत्रीय दलों की भूमिका पर चर्चा हुई।

डीएमके-कांग्रेस के रिश्ते में आई है खटास

फिर दिल्ली में उन्होंने NCP (शरद पवार गुट) के प्रमुख शरद पवार और उनकी बेटी, सांसद सुप्रिया सुले से अलग-अलग बातचीत की। यानी महाराष्ट्र, दिल्ली और बंगाल, यह पूरा सिलसिला एक के बाद एक चला। इस साल के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद DMK और कांग्रेस के संबंधों में और खटास आई। कांग्रेस ने सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA) छोड़ दिया। और उसके बाद DMK ने INDIA गठबंधन की बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया। पश्चिम बंगाल में TMC और कांग्रेस के बीच भी मतभेद रहे हैं। 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजिनगर सीटों पर उपचुनाव हैं, और दोनों दलों ने तय किया था कि वे अलग-अलग लड़ेंगे।

Mamata Banerjee

Mamata Banerjee

अभी गठबंधन नाम देने से बच रहे क्षेत्रीय दल

लेकिन कनिमोझी से मुलाकात के अगले ही दिन, यानी शुक्रवार को, ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन दे दिया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने उन्हें फोन किया था और BJP के खिलाफ लड़ाई में वे साथ हैं। DMK और TMC, दोनों ने इस मुलाकात को गठबंधन-निर्माण नहीं कहा है। DMK सूत्रों के मुताबिक यह सिर्फ शिष्टाचार भेंट थी। DMK प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई के अनुसार मकसद यह सुनिश्चित करना था कि तमिलनाडु के राष्ट्रीय मुद्दों पर क्षेत्रीय दल एक ही पेज पर हों। सूत्रों का कहना है कि ममता का यह कदम बताता है कि कोई भी क्षेत्रीय नेता अभी सारे दरवाजे नहीं बंद करना चाहता। कांग्रेस से बातचीत भी चालू है और नए विकल्प भी खुले हैं। राजनीति में इसे ही 'हेजिंग' कहते हैं।

कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच भरोसे की कमी?

राजनीतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन का कहना है कि तीसरे मोर्चे की संभावना इसलिए उभरी है क्योंकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच भरोसे की कमी है। उनके मुताबिक कांग्रेस-शासित राज्यों में भी मतभेद सामने आए हैं। अगर उत्तर प्रदेश में सीट-बंटवारे की बात नहीं बनी, तो अखिलेश यादव भी समर्थन दे सकते हैं, और दिल्ली में AAP भी जुड़ सकती है। उनका यह भी कहना है कि DMK को इस चर्चा में देर नहीं करनी चाहिए। राजनीतिक टिप्पणीकार श्री कुमार कन्नन का तर्क अलग है। उनके मुताबिक कांग्रेस अगला चुनाव 'BJP बनाम कांग्रेस' बनाना चाहती है, जबकि क्षेत्रीय दल केंद्र की द्विध्रुवीय राजनीति को तोड़ना चाहते हैं। यानी लड़ाई सिर्फ BJP के खिलाफ नहीं, नैरेटिव की भी है कि विपक्ष का चेहरा कौन होगा।

नया नहीं है तीसरे मोर्चे का विचार

रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्रीय नेताओं की बातचीत में परिसीमन बड़ा विषय रहा, खासकर वे मुद्दे जो दक्षिणी राज्यों को प्रभावित करते हैं। यहां बहस सीटों की संख्या और राज्यों के राजनीतिक वजन की है, यानी केंद्र बनाम राज्य की। यह मुद्दा तीसरे मोर्चे के लिए सबसे मजबूत साझा जमीन बन सकता है।

तीसरा मोर्चा भारत के लिए नया विचार नहीं है। 1989 का नेशनल फ्रंट और 1996 का यूनाइटेड फ्रंट, दोनों गैर-कांग्रेस, गैर-BJP प्रयोग थे। दोनों सरकारें बनीं, पर स्थिरता के सवाल हमेशा बने रहे। आम चुनाव अभी तीन साल दूर हैं। यानी यह शुरुआती दौर है, जिसमें दल एक-दूसरे को परखते हैं और अपने विकल्प तौलते हैं। रिपोर्ट कहती है कि अभी किसी नए मोर्चे की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। NCP (शरद पवार गुट) के सूत्रों ने इन मुलाकातों को 'प्रारंभिक' बताया है और पार्टी ने कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई। DMK और TMC, दोनों ने इसे राजनीतिक गठबंधन बनाने की कोशिश कहने से बचा है।

stalin

stalin

मुलाकातें सिर्फ सौदेबाजी का दबाव हैं?

DMK ने कोई मोर्चा नहीं बनाया, लेकिन उसने मोर्चे की चर्चा को जिंदा कर दिया है। कांग्रेस से दूरी, क्षेत्रीय दलों में बेचैनी और परिसीमन जैसे मुद्दे इसे हवा दे रहे हैं। वहीं ममता का कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन बताता है कि अभी हर विकल्प खुला है। असली सवाल यह है कि क्या क्षेत्रीय दल किसी साझा चेहरे और साझा एजेंडे पर आ पाएंगे? इतिहास बताता है कि यही सबसे कठिन हिस्सा होता है। सवाल है कि क्या 2029 में तीसरा मोर्चा बनेगा, या ये सारी मुलाकातें सिर्फ सौदेबाजी का दबाव हैं?

End of Article