1 जनवरी 1998... वह तारीख जब बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने एक नई पार्टी के गठन का ऐलान हुआ। नाम रखा गया तृणमूल कांग्रेस। तृणमूल का शाब्दिक अर्थ होता है। तिनके की जड़ या घास की जड़। ममता दीदी ने पार्टी का सिंबल भी कुछ इसी तरह रखा जोड़ा फूल।
भले ही पार्टी की स्थापना 1998 में हुई, लेकिन सत्ता में आने के लिए में करीब 13 साल लग गए। 227 सीटें जीतकर टीएमसी 2011 में सत्ता में आई। इसके बाद 15 साल तक बंगाल में ममता दीदी का राज रहा। हालांकि, साल 2026 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के हाथों टीएमसी को करारी शिकस्त मिली। इतना ही नहीं, ममता दीदी को अपने ही गढ़ भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
साल 2011 में बंगाल में पहली बार टीएमसी की सरकार बनी थी। ANI
इस हार के बाद टीएमसी बंट गई। पार्टी, ममता बनर्जी गुट और ऋतब्रत बनर्जी गुट में बंट चुकी है। शनिवार को चुनाव आयोग ने आगामी नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव को देखते हुए आयोग ने दोनों गुटों को अस्थायी नाम और चुनाव चिन्ह भी दे दिए हैं।
ममता बनर्जी गुट को ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम मिला है और इनका चुनाव चिह्न 'फुटबॉल खिलाड़ी' है। ऋतब्रत बनर्जी / अरूप रॉय गुट को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम मिला है और इनका चुनाव चिह्न 'लिफाफा' है। वहीं, ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और उसके पारंपरिक ‘फूल और घास’ यानी जोड़ा घास फूल चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया। सवाल यह है कि आखिर किसी पार्टी में फूट पड़ने के बाद उसका पुराना नाम और चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलता है? चुनाव आयोग इसका फैसला कैसे करता है?
चुनाव आयोग ने अभी क्या फैसला दिया?चुनाव आयोग ने फिलहाल किसी भी गुट को मूल टीएमसी का नाम और पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न नहीं दिया है। आगामी उपचुनाव को देखते हुए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए हैं। ममता बनर्जी गुट को ‘ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न मिला है। वहीं, ऋतब्रत गुट को ‘लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया है।
आयोग के मुताबिक, पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद पर Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैरा 15 के तहत विस्तृत फैसला किया जाना बाकी है। यानी फिलहाल दोनों गुटों को मिली नई पहचान अंतरिम व्यवस्था का हिस्सा है। फिलहाल चुनाव आयोग का फैसला अंतरिम है। नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव के लिए दोनों गुट अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेंगे।
इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार की फोटो।
इसके बाद आयोग पैराग्राफ 15 के तहत मूल विवाद पर आगे सुनवाई करेगा और यह तय करेगा कि पार्टी के नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह पर किसका दावा स्वीकार किया जाए या किसी भी गुट को मूल पार्टी के रूप में मान्यता दी जाए अथवा नहीं।
इस बीच ममता बनर्जी गुट ने आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी है। इसलिए TMC के नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चिन्ह की अंतिम स्थिति आगे की कानूनी और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
किसे मिलेगा ‘जोड़ा घास फूल’ चिन्ह खत्म?
अगर दोनों पक्ष मूल पार्टी पर दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग को यह तय करना होता है कि दोनों में से कौन-सा गुट उस मान्यता प्राप्त पार्टी के रूप में माना जाए। कुछ मामलों में आयोग किसी एक गुट को मूल नाम और आरक्षित चिन्ह दे सकता है। वहीं, परिस्थितियों के अनुसार अलग अंतरिम व्यवस्था भी की जा सकती है। इसलिए टीएमसी के मामले में अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि स्थायी तौर पर ‘जोड़ा घास फूल’ किस गुट को मिलेगा।बात करें नियम की तो 1968 के आदेश का पैरा 15 कहता है, 'जब आयोग संतुष्ट हो जाता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह बन गए हैं और दोनों ही दल पर दावा कर रहे हैं। तब आयोग मामले के सभी उपलब्ध तथ्यों, परिस्थितियों को ध्यान में रखकर और उनके प्रतिनिधियों या सुनवाई के इच्छुक अन्य व्यक्तियों को सुनने के बाद निर्णय ले सकता है। यह निर्णय ऐसे सभी प्रतिद्वंद्वी वर्गों या समूहों पर बाध्यकारी होगा।'
बंगाल में टीएमसी दो हिस्सों में बंट चुकी है। istock
पहले भी हो चुके हैं ऐसे विवाद
बता दें कि टीएमसी का मामला पहला नहीं है। इससे पहले भी कई बड़ी राजनीतिक पार्टियों में विभाजन के बाद नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचे हैं।
शिवसेना विवाद
शिवसेना में उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच पार्टी के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद हुआ था। चुनाव आयोग ने बाद में शिंदे गुट को मूल पार्टी का नाम और धनुष-बाण चिन्ह दिया।
एनसीपी विवाद
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी NCP में शरद पवार और अजित पवार गुट के बीच भी पार्टी के नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद हुआ। चुनाव आयोग ने अजित पवार गुट को मूल नाम और चुनाव चिन्ह दिया।
समाजवादी पार्टी
2017 में समाजवादी पार्टी के भीतर अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर विवाद हुआ था। उस समय भी ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह को लेकर चुनाव आयोग के सामने मामला पहुंचा था।
एआईएडीएमके
एआईएडीएमके में भी अलग-अलग गुटों के बीच पार्टी के ‘दो पत्ती’ चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है।
इन मामलों से यह स्पष्ट होता है कि किसी राजनीतिक दल में विभाजन होने पर उसके नाम और चुनाव चिन्ह का सवाल सिर्फ पार्टी के अंदर का विवाद नहीं रहता, बल्कि चुनाव आयोग के सामने एक औपचारिक विवाद बन सकता है।
भारत में चुनाव चिह्नों की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत में चुनाव चिह्नों की व्यवस्था की जरूरत उस दौर में महसूस हुई, जब देश में साक्षरता दर काफी कम थी। 1947 के आसपास भारत की कुल साक्षरता दर करीब 14 प्रतिशत थी, जबकि महिला साक्षरता लगभग 8 प्रतिशत थी। बड़ी संख्या में मतदाता पढ़-लिख नहीं पाते थे, ऐसे में उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के नाम पहचानना उनके लिए आसान नहीं था।
इसी समस्या को देखते हुए चुनाव प्रक्रिया में चुनाव चिह्नों को महत्वपूर्ण पहचान के तौर पर इस्तेमाल किया गया। हर पार्टी और उम्मीदवार को अलग चुनाव चिह्न मिलने से मतदाताओं के लिए उनकी पहचान करना आसान हुआ। समय के साथ यही चुनाव चिह्न भारतीय चुनाव व्यवस्था और राजनीतिक दलों की पहचान का अहम हिस्सा बन गए।
चुनाव चिह्नों का आवंटन कौन करता है?
भारत में चुनाव चिह्नों के आरक्षण और आवंटन की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग की है। संविधान के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग के पास है।
राजनीतिक दलों की मान्यता, चुनाव चिह्नों के आरक्षण और उनके आवंटन से जुड़े नियमों को तय करने के लिए Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 लागू किया गया। यह व्यवस्था देशभर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर लागू होती है। यही नियम यह तय करने में भी अहम भूमिका निभाता है कि किसी राजनीतिक दल में विभाजन होने पर उसके मूल नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न पर किस गुट का दावा स्वीकार किया जाएगा।
