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इतना गुस्से में क्यों हैं किसान? दिल्ली ही नहीं यूरोपीय देशों में भी सड़क पर अन्नदाता, समझिए क्या है 'दिल्ली चलो' मार्च का बर्लिन लिंक

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Feb 13, 2024, 07:57 PM IST

Farmer protest in India: किसान आंदोलन सिर्फ दिल्ली या भारत तक ही सीमित नहीं है। सरकारी रवैये को लेकर अलग-अलग देशों का किसान काफी गुस्से में है और बीते एक साल से लगातार प्रदर्शन कर रहा है। हालांकि, किसानों की मांगे अलग-अलग हैं।

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किसान आंदोलन

Photo : Times Now Digital

India Farmer protest Berlin Connection: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आज काफी हलचल भरा माहौल रहा। संयुक्त किसान मोर्चा और किसान मजदूर मोर्चा के आह्वान पर हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं में दाखिल होने के लिए संघर्ष करते नजर आए। पुलिस भी दिनभर किसानों से जूझती रही और कई जगहों से पुलिस-किसानों की झड़प की भी खबरें सामने आईं। किसानों की मुख्य मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी है। इस मांग को लेकर विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा का किसान मुखर है और राशन से भरे टैंकरों और ट्रैक्टर पर सवार होकर दिल्ली के लिए निकल पड़ा है।

हालांकि, किसान आंदोलन सिर्फ दिल्ली या भारत तक ही सीमित नहीं है। सरकारी रवैये को लेकर अलग-अलग देशों का किसान काफी गुस्से में है और बीते एक साल से लगातार प्रदर्शन कर रहा है। पिछले साल की ही बात है, 18 दिसंबर को जर्मनी में सैकड़ों किसानों ने ट्रैक्टरों पर सवाल होकर राजधानी बर्लिन के लिए कूच कर दिया था। पूरी राजधानी जाम हो गई थी। किसान सरकार द्वारा कृषि सब्सिडी में हालिया कटौती का विरोध कर रहे थे। इसके बाद यह आंदोलन बुल्गारिया, फ्रांस, हंगरी, इटली, पोलैंड और स्पेन में भी शुरू हो गया। किसानों की प्रमुख मांग सरकारी समर्थन, ऊर्जा की कीमतों और हरित नीतियों में कटौती रही।

जर्मन सरकार को वापस लेनी पड़ीं नीतियां

जर्मनी में किसानों का गुस्सा इस कदर था कि सरकार को झुकना पड़ा। किसान आंदोलन को खत्म करने के लिए जर्मन सरकार ने अपनी कई नई पहलों को वापस ले लिया। इसमें ज्यादातर नीतियां ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने को लेकर थीं। हालांकि, सरकार के बैकफुट पर जाने से सरकार को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के टारगेट को पूरा करने में नुकसान जरूर पहुंचा।

फ्रांस में भी झुकी सरकार

जर्मनी के अलावा फ्रांस में भी किसानों का गुस्सा सरकार को झेलना पड़ा। यहां किसान कीटनाशकों के उपयोग के साथ ईंधन सब्सिडी पर प्रतिबंध के फैसले को वापस करने की मांग कर रहे थे। किसानों का प्रदर्शन इतना उग्र रहा कि फ्रांसीसी सरकार ने अपने फैसले को वापस ले लिया। जैसे ही यूरोप के अन्य हिस्सों में किसानों का विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, यूरोपीय आयोग भी अपनी नीतियों में संशोधन करना शुरू कर दिया।

भारत के किसानों में क्यों गुस्सा है?

अब बात भारत की करते हैं। किसानों का हालिया प्रदर्शन 2020-21 में कृषि कानूनों के खिलाफ हुए ऐतिहासिक आंदोलन से जुड़ा हुआ है। दरअसल, सरकार ने किसानों से कुछ वादे किए थे, जो अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। इसलिए किसान एक बार फिर दिल्ली की ओर कूच कर गए हैं। इसमें सबसे प्रमुख मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना है। दरससल, ये सिफारिशें किसानों को फसलों पर MSP की गारंटी देते हैं। इसके अलावा किसान लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा में मारे गए किसानों के परिजनों को सरकारी नौकरी और 10-10 लाख रुपये मुआवजे, किसान आंदोलन के समय दर्ज किए गए मुकदमे वापस लेने के साथ ही 60 साल से अधिक उम्र के किसानों के लिए 10,000 रुपये की पेंशन की भी मांग कर रहे हैं।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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