BMC Mayor: शिंदे की रणनीति, फडणवीस की चुप्पी और मुंबई-ठाणे का सत्ता संतुलन
- Authored by: Rakesh Kamal Trivedi
- Updated Jan 19, 2026, 12:18 PM IST
महाराष्ट्र में बीएमसी मेयर पद को लेकर दिख रही राजनीतिक हलचल दरअसल भीतर पहले से तय संतुलन का हिस्सा है। शिंदे गुट की पहल, फडणवीस की रणनीतिक चुप्पी और बीजेपी का संख्याबल संकेत देता है कि मुंबई में मेयर बीजेपी का ही होगा, ठाणे में शिवसेना (शिंदे) को सत्ता में संतुष्ट किया जाएगा।
बीएमसी मेयर पद को लेकर फडणवीस के दावोस से लौटने पर ही होगा फैसला
मुंबई महानगरपालिका के मेयर पद को लेकर जिस राजनीतिक हलचल को बाहर से देखा जा रहा है, वह दरअसल जितनी दिख रही है, उतनी है नहीं। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे द्वारा नवनिर्वाचित 29 पार्षदों को तीन दिनों के लिए ताज लैंड्स एंड में ठहराना औपचारिक तौर पर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम बताया गया, लेकिन महाराष्ट्र की सत्ता-राजनीति में ऐसे किसी भी आयोजन को सिर्फ प्रशिक्षण मान लेना भोलेपन से कम नहीं होगा। असली कहानी आयोजन की प्रकृति में नहीं, उसकी टाइमिंग में छिपी है।
यह तीन दिन का कार्यक्रम 21 तारीख को समाप्त हो रहा है, जबकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस 24 जनवरी तक दावोस में हैं। यानी जब तक फडणवीस मुंबई में उपस्थित नहीं होंगे, तब तक मेयर को लेकर कोई ठोस राजनीतिक निर्णय सामने नहीं आएगी। सत्ता के जानकार इसे संयोग नहीं मानते, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति बताते हैं, जिसके जरिए शिंदे गुट यह संदेश देना चाहता है कि वह सिर्फ संख्या में छोटा साझेदार नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों में एक आवश्यक घटक है।
मेयर पद पर बीजेपी के लिए सहमति!
बीएमसी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 89 पार्षदों का जो ऐतिहासिक जनादेश मिला है, उसने पार्टी के भीतर एक स्पष्ट मनोवृत्ति बना दी है। इतने बड़े जनसमर्थन के बाद मेयर जैसे सर्वोच्च पद या स्टैंडिंग कमिटी जैसे शक्ति-केंद्र पर किसी भी प्रकार की साझेदारी स्वीकार करना बीजेपी नेतृत्व के लिए न सिर्फ राजनीतिक रूप से कठिन है, बल्कि अपने कैडर के सामने भी असहज स्थिति पैदा कर सकता है। यही वजह है कि शिंदे गुट की हर पहल की एक स्वाभाविक सीमा तय हो जाती है।
शिंदे की प्रेशर पॉलिटिक्स
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि शिंदे गुट को यह बात भली-भांति पता है कि ढाई-ढाई साल का मेयर फॉर्मूला या मुंबई स्टैंडिंग कमिटी चेयरमैन की मांग बीजेपी के लिए अस्वीकार्य है। इसके बावजूद इन प्रस्तावों का सामने आना किसी अंतिम सौदे की उम्मीद से ज्यादा, बातचीत की प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप देने की कवायद है। यह एक तरह की प्रेशर पॉलिटिक्स है, जिसका असली उद्देश्य बीजेपी पर दबाव डालना नहीं, बल्कि अपने संगठन और समर्थकों को यह दिखाना है कि पार्टी ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की।
सौदे की असल धुरी मुंबई नहीं, ठाणे
असल राजनीतिक सौदे की धुरी मुंबई नहीं, ठाणे है। ठाणे, जिसे एकनाथ शिंदे की राजनीतिक ताकत का केंद्र माना जाता है, वहां सत्ता और नियंत्रण बनाए रखना शिंदे गुट की प्राथमिकता है। सत्ता के गलियारों में यह आम धारणा है कि मुंबई में बीजेपी के मेयर को लेकर कोई वास्तविक अनिश्चितता नहीं है और बदले में ठाणे महानगरपालिका में शिवसेना (शिंदे) को निर्णायक पदों पर संतुष्ट किया जाएगा। यानी जो बाहर संघर्ष दिखाई दे रहा है, वह भीतर एक संतुलित लेन-देन का हिस्सा है।
पहले से तय फैसला और देवा भाऊ की चुप्पी
इस पूरे घटनाक्रम में देवेंद्र फडणवीस की भूमिका सबसे अधिक अर्थपूर्ण है। उनकी चुप्पी, कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया न देना और निर्णय को दावोस से वापसी तक टालना इस बात का संकेत है कि बीजेपी नेतृत्व किसी भी तरह की जल्दबाजी या दबाव में निर्णय लेना नहीं चाहता। फडणवीस की राजनीतिक शैली में चुप्पी अक्सर पहले से तय फैसले की भूमिका होती है, न कि अनिर्णय की।
शिवसेना UBT की भूमिका भी अहम
इसी बीच शिवसेना (यूबीटी) इस पूरे घटनाक्रम को किनारे से देख रही है और मौके की राजनीति कर रही है। यूबीटी खेमे से यह संकेत दिया जा रहा है कि उनके 65 पार्षद सदन से अनुपस्थित रह सकते हैं। ऐसी स्थिति में बीजेपी अपने 89 पार्षदों के दम पर अकेले मेयर चुनने की स्थिति में आ जाएगी और शिंदे गुट की सौदेबाजी पूरी तरह अप्रासंगिक हो सकती है। यह यूबीटी की ओर से शिंदे गुट की प्रेशर पॉलिटिक्स को कमजोर करने की रणनीतिक कोशिश मानी जा रही है।
गठबंधन में कोई दरार नहीं!
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों की सर्वसम्मत राय यही है कि इस पूरे घटनाक्रम में न तो कोई टकराव है और न ही गठबंधन में कोई दरार। जो कुछ सामने दिख रहा है, वह सत्ता के भीतर पदों और प्रभाव के संतुलन को सार्वजनिक रूप से साधने की प्रक्रिया भर है। अंततः तस्वीर बेहद साफ है - मुंबई में मेयर बीजेपी का होगा और ठाणे में शिवसेना (शिंदे) को उसकी राजनीतिक जमीन सुरक्षित रखने का आश्वासन मिलेगा।
बीएमसी की यह राजनीति रिसॉर्ट की नहीं, बल्कि रियल-टाइम मैनेजमेंट की राजनीति है, जहां फैसले पहले लिए जाते हैं और उनके संकेत बाद में दिखाई देते हैं। अब बस औपचारिक ऐलान का इंतजार है, जो देवेंद्र फडणवीस की दावोस से वापसी के साथ सामने आएगा।