उत्तर प्रदेश की राजनीति दशकों से 'जातिगत समीकरणों' और सोशल इंजीनियरिंग के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राजनीतिक दल अपनी चुनावी रणनीतियां हमेशा से सामाजिक पहचानों, सामुदायिक वफादारी और पारंपरिक वोट बैंकों को ध्यान में रखकर बनाते आए हैं। लेकिन वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले, राज्य की सियासत के केंद्र में एक बिल्कुल नया और निर्णायक वोट बैंक उभरकर सामने आया है—जेन-जी (Gen-Z)। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और तुरंत सूचना हासिल करने की आदत के साथ पली-बढ़ी यह पीढ़ी अब राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय और मुखर हो चुकी है। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, पेपर लीक, पारदर्शी शिक्षा प्रणाली, महंगाई और आर्थिक अवसर इनके मुख्य मुद्दे हैं। यही कारण है कि आज भारतीय जनता पार्टी (BJP), समाजवादी पार्टी (SP), कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी (BSP) से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) तक हर कोई इस पीढ़ी को अपने पाले में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।
Gen-Z कैसे बनी बड़ी राजनीतिक ताकत?
'जेन-जी' (Gen-Z) से अर्थ उन युवाओं से है जिनका जन्म 1990 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 2000 के दशक के बीच हुआ है। अब इस पीढ़ी का एक बहुत बड़ा हिस्सा मतदान करने की उम्र में प्रवेश कर चुका है। पारंपरिक वोट बैंकों के उलट जेन-जी की पहचान किसी जातिगत निष्ठा, वंशानुगत राजनीतिक झुकाव या किसी एक नेता के प्रति स्थायी अंधे निष्ठा पर आधारित नहीं है। हालांकि इनका राजनीतिक माहौल इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब, 'एक्स' (ट्विटर) और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म से तय होता है, लेकिन इनके मुद्दे बेहद व्यावहारिक हैं—जैसे नौकरी, पेपर लीक, समय पर सरकारी भर्तियां और महंगाई।
जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन से मिला सियासी मोड़
इस पीढ़ी की राजनीतिक ताकत की शुरुआत दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों से हुई। प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, भर्ती में देरी और पेपर लीक के खिलाफ जब देश के युवा और अभ्यर्थी जंतर-मंतर की सड़कों पर उतरे, तो इस आंदोलन की रील्स और वीडियो सोशल मीडिया के जरिए पूरे देश में तेजी से फैल गए। इसने यह साबित कर दिया कि आज का डिजिटल युवा बिना किसी पारंपरिक राजनीतिक दल के झंडे के भी किसी बड़े मुद्दे पर संगठित हो सकता है। राहुल गांधी से लेकर पीएम मोदी तक हर कोई नई रणनीतियां बना रहा है।
राहुल गांधी का प्रयागराज में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम
युवाओं को साधने की इसी कड़ी में कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में छात्रों के सबसे बड़े केंद्र प्रयागराज में 8 अगस्त को "छात्रों की गूंज" कार्यक्रम को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से पेपर लीक, बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था पर फोकस किया गया। कांग्रेस का दावा है कि इस कार्यक्रम के लिए करीब 1.74 लाख छात्रों ने ऑनलाइन पंजीकरण कराया था। प्रतियोगी परीक्षाओं का गढ़ माने जाने वाले प्रयागराज को चुनकर राहुल गांधी ने सीधे उन युवाओं से जुड़ने का प्रयास किया जो सालों से नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का डिजिटल आउटरीच
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस पीढ़ी के साथ सीधे और अनौपचारिक संवाद पर जोर दे रहे हैं। पेपर लीक और परीक्षा की अनियमतताओं पर युवाओं के गुस्से के बीच पीएम मोदी ने एक देर रात सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर छात्रों से सीधा संवाद किया था और पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानूनों व कार्रवाई का भरोसा दिया। इसके अलावा, 'विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग' जैसे आयोजनों के माध्यम से पीएम मोदी लगातार जेन-जी को देश के निर्माण और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का संदेश दे रहे हैं। वहीं, बीजेपी का संगठन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, डिजिटल क्रिएटर्स, युवा उद्यमियों और छात्रों के बीच पैठ बनाने के लिए इंस्टाग्राम रील्स और एक्स का व्यापक इस्तेमाल कर रहा है।
अखिलेश यादव का 'डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स' मॉडल
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव पारंपरिक रैलियों से आगे बढ़कर डिजिटल-फर्स्ट रणनीति पर काम कर रहे हैं। अखिलेश यादव ने 200 से अधिक लोकप्रिय डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के साथ सीधे बैठकें की हैं। सपा अपने अभियानों में पेपर लीक, बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों को उठा रही है और पुष्पेंद्र सरोज व प्रिया सरोज जैसे नए, युवा सांसदों को आगे कर रही है। मैनपुरी से सपा सांसद डिंपल यादव ने भी जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शनों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर छात्र आंदोलन के साथ सपा की प्रतिबद्धता दिखाई है।
बीजेपी और संघ का मिला-जुला प्रयास
बीजेपी केवल डिजिटल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने विशाल सांगठनिक ढांचे का इस्तेमाल कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आने वाले समय में विश्वविद्यालयों और पेशेवर संस्थानों में सीधे छात्रों से जुड़ेंगे। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी जेन-जी और जेन-अल्फा की चिंताओं को संबोधित करते हुए कहा है कि आज की युवा पीढ़ी बेहद ईमानदार और तार्किक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी मांगों के लिए विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों को सीधे राष्ट्रविरोधी करार नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि उनके साथ सहानुभूति और संवाद की आवश्यकता है।
बसपा का पीढ़ीगत बदलाव
बहुजन समाज पार्टी (BSP) भी खुद को नए युवाओं के हिसाब से ढालने की कोशिश कर रही है। हाथरस में एक कार्यक्रम के दौरान बसपा नेता आकाश आनंद ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव को "अंकल" कहकर संबोधित किया। उनका यह बयान अपनी पार्टी को एक युवा और नए विकल्प के रूप में पेश करने की एक रणनीतिक कोशिश थी।
Gen-Z और चुनावी समीकरण में इसका महत्व
उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में इस नई पीढ़ी का प्रभाव कितना बड़ा है, इसे इन आंकड़ों से समझा जा सकता है। राजनीतिक अनुमानों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुल मतदाताओं में लगभग 15% हिस्सेदारी (करीब 2.07 करोड़ वोटर्स) जेन-जी की है। उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास में बहुत कम अंतर से बड़ी संख्या में सीटें बदल जाती हैं। अगर इस 15% युवा वोट बैंक में से मात्र 3% से 5% वोट भी किसी एक तरफ खिसकते हैं, तो वह दर्जनों सीटों के नतीजों को पूरी तरह पलट सकता है।
पुराने आंकड़े क्या कहते हैं?
- 2012 विधानसभा चुनाव: समाजवादी पार्टी को 29.15% वोट मिले थे और बसपा को 25.91%। दोनों के बीच महज 3.24% वोट का अंतर था, लेकिन सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई जबकि बसपा 80 सीटों पर सिमट गई।
- 2022 विधानसभा चुनाव में: बीजेपी को 41.29% वोट पर 255 सीटें मिलीं, जबकि सपा को 32.06% वोट पर 111 सीटें मिलीं।
वोट प्रतिशत का छोटा सा बदलाव भी लाएगा तूफान
यह आंकड़े साबित करते हैं कि यूपी में वोट प्रतिशत का छोटा सा बदलाव भी सीटों के समीकरण में भारी तबाही या जीत ला सकता है। इसीलिए डिजिटल रूप से जागरूक और मुद्दा-आधारित यह युवा वर्ग सभी पार्टियों की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर है। कुल मिलाकर जेन-जी इस चुनावी मंच के केंद्र में आ गई है। इस पीढ़ी की सबसे बड़ी खासियत इसकी तरलता है—यह किसी एक पार्टी या नेता से स्थायी रूप से नहीं बंधी है। उत्तर प्रदेश में पारंपरिक 'जातिगत गणित' पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन उस पर एक नया 'पीढ़ीगत गणित' चढ़ चुका है। आज का पहला वोट डालने वाला युवा भले ही किसी खास जाति में पैदा हुआ हो, लेकिन वोट देते समय उसका नजरिया सिर्फ जाति तक सीमित नहीं है; वह अपने रोजगार, अपनी परीक्षाओं की पारदर्शिता और अपने भविष्य को ध्यान में रखकर बटन दबाने वाला है। 2027 के महासमर से पहले यूपी के इस नए पावर सेंटर को साधने की यह जंग अब और तेज होने वाली है।