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क्यों 78 साल से हिंसा की आग में जल रहा बलूचिस्तान, किस मजबूरी में पाकिस्तान में होना पड़ा था शामिल?

क्षेत्रफल के लिहाज सेपाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान भू-राजनीतिक नजरिए से जितना महत्वपूर्ण है, यह क्षेत्र हिंसा, अलगाववाद और अस्थिरता से उतना ही घिरा हुआ है। आखिर कैसे बलूचिस्तान को उसकी मर्जी के बिना ही पाकिस्तान में शामिल होना पड़ा था,...

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बलूचिस्तान को दिया पाकिस्तान ने धोखा (AI Image)
Authored by: Amit Mandal
Updated Aug 11, 2026, 13:26 IST
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हाल ही में बलूचिस्तान में बलूच विद्रोहियों द्वारा किए गए आतंकी हमलों में 27 पुलिसकर्मियों और 5 नागरिकों की मौत के बाद भड़के जनआक्रोश ने पाकिस्तान सरकार को हिलाकर रख दिया। मृतकों के परिवारों ने न्यायिक आयोग के गठन तक शवों को दफनाने से इनकार करते हुए 10 दिनों तक धरना प्रदर्शन किया। यह घटना बलूचिस्तान में लंबे समय से चले आ रहे रक्तपात, उग्रवाद और पाकिस्तानी सेना के दमन का एक और नया अध्याय है। क्षेत्रफल के लिहाज सेपाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान भू-राजनीतिक नजरिए से जितना महत्वपूर्ण है, यह क्षेत्र हिंसा, अलगाववाद और अस्थिरता से उतना ही घिरा हुआ है। आखिर कैसे बलूचिस्तान को उसकी मर्जी के बिना ही पाकिस्तान में शामिल होना पड़ा था, क्या है इससे जुड़ा विवाद और संघर्ष, और क्या है इस समृद्ध इलाके का इतिहास, विस्तार से जानते हैं।

11 अगस्त 1947 का समझौता और आजादी का दावा

इस विद्रोह के बीच भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान ही पड़ गए थे। 15 अगस्त 1947 से ठीक चार दिन पहले (11 अगस्त 1947 को), कलात के शासक मीर अहमद यार खान (खान ऑफ कलात) ने मोहम्मद अली जिन्ना और ब्रिटिश प्रतिनिधियों की उपस्थिति में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कलात की स्वतंत्र स्थिति को स्वीकार किया गया था। खान ऑफ कलात ने अपना संविधान बनाया और दो सदनों (दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम) वाली संसद का गठन किया। जब संसद की बैठकें हुईं, तो सदस्यों ने सर्वसम्मति से पाकिस्तान में शामिल होने का विरोध किया और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रहने का प्रस्ताव पारित किया।

रियासत को अलग-थलग करने की रणनीति

जब जिन्ना और पाकिस्तान सरकार को यह समझ आ गया कि कलात की संसद पाकिस्तान में विलय के लिए तैयार नहीं है, तो उन्होंने कलात के अधीन आने वाली अन्य तीन छोटी रियासतों (मकरान, लसबेला और खारान) के प्रमुखों पर कूटनीतिक दबाव बनाना शुरू किया। 17 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने कलात के मातहत आने वाली इन तीनों रियासतों के विलय को अलग से स्वीकार कर लिया। इस कदम से कलात का समुद्री मार्ग और पड़ोसी राज्यों से संपर्क कट गया, जिससे कलात भौगोलिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। कलात को अलग-थलग करने के तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना ने कार्रवाई शुरू की।

पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों को बलूचिस्तान के तटीय क्षेत्रों (जैसे पासनी और जीवानी) में तैनात कर दिया गया और कलात की घेराबंदी शुरू कर दी गई। 26 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना ने कलात की राजधानी की ओर बढ़ना शुरू किया और खान ऑफ कलात को अंतिम अल्टीमेटम दिया गया। चारों तरफ से सेना द्वारा घिरे होने और कोई अन्य विकल्प न बचने पर, दबाव में आकर मीर अहमद यार खान ने 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।

विलय का विरोध और पहले सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत

पाकिस्तानी सेना के दबाव में किए गए इस विलय को कलात की संसद या बलूच जनता ने स्वीकार नहीं किया। राजकुमार अब्दुल करीम ने विद्रोह कर दिया। खान ऑफ कलात के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने इस विलय को अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया। जुलाई 1948 में वे अपने समर्थकों के साथ अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में चले गए और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ बलूचिस्तान के पहले सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत की।

बलूचिस्तान में विद्रोह की 5 वजहें

1.बंटवारे और रियासत (कलात) के विलय का विवाद

अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया था। उस समय 'कलात' के खान (मीर अहमद यार खान) स्वतंत्र रहना चाहते थे। पाकिस्तान द्वारा लगातार सैन्य दबाव और अन्य पड़ोसी रियासतों के पाकिस्तान में शामिल होने के बाद, कलात के खान को 27 मार्च 1948 को मजबूरी में पाकिस्तान में विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े। इस जबरन विलय को बलूच राष्ट्रवादियों ने कभी दिल से स्वीकार नहीं किया और यही बलूच उग्रवाद की वैचारिक नींव बना।

2. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बनाम गरीबी

बलूचिस्तान प्राकृतिक संसाधनों के मामले में पाकिस्तान का सबसे अमीर प्रांत है, लेकिन वहां के निवासी अत्यधिक गरीबी और पिछड़ेपन का सामना कर रहे हैं। यहां तांबा, सोना (रैको डिक और सैंदक खदानें), और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं। बलूच नागरिकों का आरोप है कि उनके संसाधनों का इस्तेमाल इस्लामाबाद/पंजाब की तिजोरियां भरने के लिए किया जाता है। स्थानीय निवासियों को बड़ी परियोजनाओं में उच्च प्रबंधकीय और तकनीकी नौकरियों से दूर रखा जाता है, जो मुख्य रूप से पंजाब और सिंध के लोगों को दी जाती हैं।

3. चीनी निवेश और CPEC प्रोजेक्ट्स का विरोध

अरब सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित ग्वादर पोर्ट 'चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे' (CPEC) का प्रमुख केंद्र है। बलूच विद्रोही (जैसे BLA - बलूच लिबरेशन आर्मी) चीन के इस निवेश को विदेशी शोषण के रूप में देखते हैं। इसी वजह से बलूच उग्रवादी अक्सर चीनी इंजीनियरों, परियोजनाओं और सीपेक इंफ्रास्ट्रक्चर को सीधे निशाना बनाते हैं।

4. 'लापता लोग' और मानवाधिकार हनन

बलूचिस्तान में सबसे संवेदनशील मुद्दा 'गायब लोगों' का है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों द्वारा अब तक 5,000 से अधिक बलूच युवाओं, छात्रों और कार्यकर्ताओं को जबरन उठाया गया है। कई सालों तक गायब रहने के बाद इनमें से कई लोगों के शव सड़कों के किनारे या सामूहिक कब्रों में मिलते हैं। पाकिस्तानी सेना का यह दमनकारी चक्र बलूच युवाओं को हथियार उठाने और विद्रोह की तरफ धकेल रहा है।

5. पाकिस्तानी सेना की कठोर सैन्य कार्रवाई

जब-जब बलूचिस्तान में असंतोष बढ़ता है, पाकिस्तानी शासन संवाद के बजाय सैन्य अभियानों (जैसे हालिया ऑपरेशन शाबान) का सहारा लेता है। 2005 में सुई गैस प्लांट पर एक बलूच महिला डॉक्टर के साथ सेना अधिकारी द्वारा बलात्कार और 2006 में लोकप्रिय बलूच नेता नवाब अकबर बुगटी की पाकिस्तानी सेना द्वारा हत्या के बाद शुरू हुआ यह सशस्त्र विद्रोह आज भी जारी है।

पाकिस्तान ने किया दमन, लोगों को किया गायब

पाकिस्तान सरकार लगातार इस अशांति का दोष भारत या बाहरी शक्तियों पर मढ़ने की कोशिश करती है। हालांकि, स्वतंत्र विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक पाकिस्तान बलूच लोगों के शोषण को बंद नहीं करता, जबरन गायब करने की प्रथा को नहीं रोकता और वहां के संसाधनों का लाभ स्थानीय बलूच समुदाय को नहीं देता, तब तक सिर्फ बंदूक और सैन्य बल के दम पर इस उग्रवाद को खत्म नहीं किया जा सकता। बलूचिस्तान के लोग अब खुलकर भारत से मदद मांगने लगे हैं। पाकिस्तान को लगातार डर सताता रहा है कि अगर हालात और बेकाबू हुए और भारत खुलकर दखल देने लगे तो उसे 1975 बांग्लादेश विभाजन जैसा एक और झटका लग सकता है। जिस तरह से आसिम मुनीर की पाकिस्तानी सेना ने यहां कत्लेआम और हिंसा मचाई है, और लोगों के मन में आक्रोश है, उसकी कीमत एक न एक दिन पाकिस्तान को जरूर चुकानी होगी।

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