इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Varma) के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। इस मामले की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना है। हालांकि, समिति को इस पूरे मामले में किसी साजिश के सबूत नहीं मिले। साथ ही, रिपोर्ट ने यह भी साफ किया कि बरामद नकदी का व्यक्तिगत मालिक जस्टिस वर्मा ही थे, ऐसा कोई आपराधिक निष्कर्ष समिति ने नहीं दिया है। तो आखिर तीनों आरोप क्या थे, समिति ने उन्हें कैसे साबित माना, नकदी के मालिकाना हक पर क्या कहा और साजिश के दावे को क्यों खारिज किया गया? इस एक्सप्लेनर में समझिए जांच समिति की रिपोर्ट की बड़ी बातें।
तीन सदस्यीय समिति ने की थी जांच
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। समिति के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार थे। समिति में बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य सदस्य थे। समिति ने मामले से जुड़े दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की है।
जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित
रिपोर्ट के अंतिम निष्कर्ष में समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि Articles of Charges I, II & III are proved, यानी जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोप सिद्ध हुए हैं।
पहला आरोप: सरकारी आवास में अघोषित नकदी
पहला आरोप नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रेसेंट स्थित आधिकारिक आवासीय परिसर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में ₹500 के नोट पाए जाने से संबंधित है। समिति ने कहा कि जज इस नकदी की मौजूदगी, स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। रिपोर्ट के मुताबिक, स्टोररूम में मिली इस नकदी को लेकर जस्टिस वर्मा की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण समिति को संतोषजनक नहीं लगा। इसी आधार पर समिति ने पहले आरोप को सिद्ध माना।
दूसरा आरोप: साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में विफलता
दूसरा आरोप मामले से जुड़े भौतिक साक्ष्यों को सुरक्षित और संरक्षित रखने में विफलता से संबंधित है। समिति ने पाया कि स्टोररूम की साक्ष्यगत स्थिति को कानूनी रूप से सील और निरीक्षण किए जाने से पहले बदल दिया गया था। बाद में करेंसी नोट उपलब्ध नहीं रहे और उनकी अनुपलब्धता का संतोषजनक स्पष्टीकरण भी नहीं मिला। समिति ने कहा कि यह निष्कर्ष इस आधार पर नहीं है कि जस्टिस वर्मा ने व्यक्तिगत रूप से करेंसी नोट हटाए थे। समिति का निष्कर्ष साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में विफलता, परिसर से जुड़े प्रतिष्ठान की ओर से हुई स्थिति में बदलाव को स्वीकार करने और उसके परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण भौतिक साक्ष्य के उपलब्ध न रहने पर आधारित है।
तीसरा आरोप: जवाब को माना टालमटोल वाला
तीसरा आरोप जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण से जुड़ा है। समिति ने विशेष रूप से 22 मार्च 2025 के उनके जवाब और इसके बाद अपनाए गए रुख की जांच की। रिपोर्ट में कहा गया है कि उनका स्पष्टीकरण परिस्थितियों के अनुरूप अपेक्षित स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी को प्रदर्शित नहीं करता था। समिति ने स्वतंत्र आधिकारिक गवाहों के बयानों और अन्य पुष्टिकारक सामग्री के आधार पर जस्टिस वर्मा के स्पष्टीकरण को टालमटोल वाला और असंतोषजनक पाया। इसके आधार पर तीसरे आरोप को भी सिद्ध माना गया।
रिपोर्ट में साजिश के नहीं मिले संकेत
समिति की रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह है कि जांच के दौरान किसी साजिश के संकेत नहीं मिले। इसके बावजूद समिति ने सरकारी आवास के स्टोररूम में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी पाए जाने की स्थिति को गंभीर माना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आधिकारिक आवास के भीतर इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का पाया जाना ऐसी परिस्थिति है जिसे सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि साजिश का कोई सबूत नहीं मिला।
घर पर मिली नकदी किसकी थी?
रिपोर्ट का पैरा 264 इस मामले में एक अहम कानूनी स्थिति स्पष्ट करता है। समिति ने कहा है कि वह करेंसी नोटों के प्रत्यक्ष व्यक्तिगत स्वामित्व के संबंध में आपराधिक अर्थ में कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं कर रही है। समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि Article I को सिद्ध करने के लिए नकदी का व्यक्तिगत स्वामित्व जस्टिस वर्मा का होना साबित करना आवश्यक नहीं था।
समिति के अनुसार, इतना स्थापित हुआ कि जस्टिस वर्मा के आधिकारिक परिसर के भीतर बड़ी मात्रा में ऐसी करेंसी मिली, जिसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। जिस स्टोररूम में नोट मिले थे, वह भी आधिकारिक परिसर का हिस्सा था। समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत या स्वामित्व के संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे।
जस्टिस वर्मा ने कार्यवाही से खुद को अलग किया
रिपोर्ट के मुताबिक, 17 मार्च 2026 को शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से साक्ष्य पूरा होने के बाद समिति ने जस्टिस वर्मा से बचाव पक्ष के उन गवाहों की सूची मांगी, जिन्हें वह पेश करना चाहते थे। उनसे यह भी कहा गया कि यदि जरूरी हो तो गवाहों के मुख्य बयान के बदले हलफनामे दाखिल किए जाएं।
जस्टिस वर्मा के अनुरोध पर इसकी समयसीमा बढ़ाकर 6 अप्रैल 2026 कर दी गई और अगली सुनवाई 10 अप्रैल को तय की गई। हालांकि, 10 अप्रैल को न तो बचाव पक्ष के गवाहों की सूची दाखिल की गई और न ही कोई हलफनामा। इसके बजाय समिति को 9 अप्रैल 2026 का जस्टिस वर्मा का पत्र मिला, जिसमें उन्होंने जांच कार्यवाही से हटने की बात कही थी।
समिति ने कहा- बचाव साबित करने के लिए गवाह बनना चाहिए था
रिपोर्ट में समिति ने कहा कि अपने बचाव और अपने पक्ष में दिए गए तर्कों को साबित करने के लिए जस्टिस वर्मा को गवाह के रूप में पेश होना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। समिति ने यह भी दर्ज किया कि नकदी की मौजूदगी को लेकर जस्टिस वर्मा की ओर से अलग-अलग और असंगत दावे किए गए थे। उन्होंने समिति के सामने पेश हुए गवाहों से जिरह के दौरान कुछ सुझाव भी दिए, लेकिन अपने बचाव के समर्थन में उन गवाहों को बुलाने का अनुरोध नहीं किया जिनके नाम उनकी प्रस्तावित गवाह सूची में थे। समिति ने कहा कि इस स्थिति में उनका बचाव बिना प्रमाणित हुए ही रह गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि जस्टिस वर्मा कम से कम गवाह के कटघरे में जाकर आरोपों से इनकार कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और जांच में आगे भाग लेने से खुद को अलग कर लिया।
वकीलों ने भी आगे पेश होने से इनकार किया
21 अप्रैल 2026 को समिति ने जस्टिस वर्मा की ओर से नियुक्त अधिवक्ताओं की ओर से दाखिल जवाब पर विचार किया। जस्टिस वर्मा की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने भी यह कहते हुए खुद को कार्यवाही से अलग करने की अनुमति मांगी कि उन्हें आगे पेश नहीं होने के निर्देश दिए गए हैं। समिति ने उनके अधिवक्ताओं को कार्यवाही से मुक्त कर दिया। रिपोर्ट में समिति ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जस्टिस वर्मा की ओर से यह वापसी उस समय हुई जब शिकायतकर्ता पक्ष के साक्ष्य पूरे हो चुके थे, गवाहों से जिरह हो चुकी थी, दस्तावेज रिकॉर्ड पर लिए जा चुके थे और मामला बचाव पक्ष के साक्ष्य के चरण में पहुंच गया था। समिति ने कहा कि इस तरह की वैधानिक कार्यवाही को बीच-बीच में चलाकर और फिर पर्याप्त भागीदारी के बाद एकतरफा तरीके से वापस लेकर रोका नहीं जा सकता।
अधिकारियों की भूमिका पर भी समिति की सख्त टिप्पणी
जांच समिति ने घटनास्थल पर पहुंचे फायर और पुलिस अधिकारियों की भूमिका में भी गंभीर चूक पाई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौके पर पहुंचने के बाद दोनों विभागों के अधिकारियों से कानून के मुताबिक अपनी जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा थी। इसके बावजूद करेंसी नोटों को जब्त करने, उनका ब्योरा तैयार करने और उन्हें सुरक्षित रखने में विफलता गंभीर चूक थी। समिति ने कहा कि घटनास्थल पर हुई शुरुआती कार्रवाई में ही साक्ष्यों के संरक्षण की व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी। हालांकि, यह टिप्पणी अधिकारियों की ओर से साक्ष्य संभालने में हुई चूक को लेकर है और इसे जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों से अलग संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट की दो बातें विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं
- पहली, समिति ने आपराधिक अर्थ में यह निष्कर्ष नहीं दिया कि बरामद करेंसी नोटों का व्यक्तिगत मालिक जस्टिस वर्मा ही थे।
- दूसरी, समिति ने यह भी निष्कर्ष नहीं दिया कि जस्टिस वर्मा ने खुद करेंसी नोट स्टोररूम से हटाए थे।
लेकिन समिति ने यह जरूर माना कि उनके आधिकारिक परिसर में बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी मिली, उसके स्रोत और मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में गंभीर चूक हुई और उनके स्पष्टीकरण और बचाव को समिति ने संतोषजनक नहीं माना।
साथ ही, समिति ने नकदी को साजिश के तहत प्लांट किए जाने की दलील को भी साबित नहीं माना।