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Jharkhand Assembly Election: झारखंड में किसकी बनेगी सरकार? टाइम्स नाउ नवभारत-मैट्रिज ओपिनियन पोल से हो गया साफ

Jharkhand Assembly Election 2024: झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले टाइम्स नाउ नवभारत ओपिनियन पोल (Times Now Navbharat-Matrix Opinion Poll) लेकर आया है। हेमंत सोरेन के जेल जाने से आगामी चुनाव पर कितना असर पड़ता दिखाई दे रहा है? राज्य की कितनी फीसदी जनता उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनते देखना चाहती है? इसके अलावा एनडीए गठबंधन को कितना फायदा होता दिखाई दे रहा है। एक नजर आगामी चुनाव की संभावित तस्वीर से समझ सकते हैं?

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झारखंड विधानसभा चुनाव ओपिनियन पोल,

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

Jharkhand Assembly Election 2024: झारखंड में इस बार विधानसभा चुनाव में ‘विरासत की सियासत’ के नए रंग दिखेंगे। फिलहाल, के चुनावी घटनाक्रमों से इस बार का चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। इस बार का चुनाव झारखंड मुक्ति मोर्चा, बीजेपी के बीच देखा जा रहा है। जेएमएम छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थानमे वाले पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने चुनाव को कड़ा बना दिया है। इदर, कुर्सी की चाहत में राज्य के एक दर्जन से भी ज्यादा सांसद, विधायक, मंत्री और नेता अपने बेटे-बेटियों व पत्नियों को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें पार्टियों का टिकट दिलाने की लॉबिंग शुरू हो गई है। कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहां पिता-पुत्र व पुत्री ने एक ही क्षेत्र से टिकट के लिए पार्टी में बायोडाटा पेश किया है। इसी बीच टाइम्स नाउ नवभारत ने झारखंड का ओपिनियन पोल लेकर आया है। आइये जानते हैं राज्य की कुल 81 सीटों के अनुमानित आंकड़े क्या हैं ? किसकी सरकार बनती दिखाई दे रही है और कौन मुख्यमंंत्री की रेस में आगे है?

ओपिनियन पोल की ऐसी है तस्वीर

टाइम्स नाउ नवभारत के ओपिनियन पोल की तस्वीर आपके सामने रखते हैं। ओपिनियन पोल चार्ट के हिसाब से जेएमएम प्लस यानी जेएमएम इंडिया गठबंधन (India Alliance) को 30.4 फीसदी वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं, जिससे उनके खाते में 24 से 29 सीटें आ सकती हैं। लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका बीजेपी एनडीए गठबंधित (NDA Alliance) पार्टियों का ग्राफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। सर्वे के मुताबिक, बीजेपी प्लस के खाते में 50.4 प्रतिशत वोट जा रहे हैं, जिस लिहाज उन्हें 43 से 48 सीटें मिलती प्रतीत हो रही हैं। वहीं, अन्य के खाते में 19.2 प्रतिशत वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं, जिससे 4 से 9 सीटें जीत रहे हैं।

हेमंत सोरेन के जेल जाने से चुनाव पर कितना असर?

A. INDIA गठबंधन को फायदा: 31%

B. NDA को फायदा: 29%

C. कोई फर्क नहीं: 34%

D. कह नहीं सकते: 6%

मुख्यमंत्री का सबसे पसंदीदा चेहरा कौन?

राज्य के लिए पसंदीदा मुख्यमंत्री के लिए किए गए सर्वे में चौंकाने वाले नतीजे दिखाई दे रहे हैं। सर्वे में मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे पसंदीदा चेहरा NDA गठबंधित बाबूलाल मरांडी (Babulal Marandi) बनते दिखाई दे रहे हैं। राज्य की 42 फीसदी जनता चाहती है कि बाबूलाल मरांडी राज्य की बागडोर संभालें। वहीं, इंडिया गठबंधन के वर्तमान सीएम हेमंत सोरेन (CM Hemant Soren) के जेल जाने के बाद आंकड़े एकदम विपरीत नजर आ रहे हैं। महज 29 फीसदी जनता ही हेमंत सोरेन को अगला मुख्यमंत्री देखना चाहती है।

चंपई सोरेन का भी बढ़ा ग्राफ

झारखंड के पूर्व सीएम और चार दशकों तक झामुमो के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे चंपई सोरेन को राज्य की 8 फीसदी जनता बतौर सीएम देख रही है। कुछ इसी तरह का आंकड़ा अर्जुन मुंडा के साथ है, उन्हें भी 8 फीसदी नंबर मिले हैं, जबकि 13 फीसदी वोटर्स अन्य को सीएम देखना चाहते हैं।

2019 में थी ऐसी तस्वीर

झारखंड में नवंबर माह तक चुनाव कराये जा सकते हैं। 2019 में पिछली बार चुनाव हुए थे, जिसमें मुख्य पार्टी जेएमएम को 30 सीटें हासिल हुई थीं और भारतीय जनता पार्टी को 25 सीटें प्राप्त हुई थीं। वहीं, कांग्रेस पार्टी को 16 सीटें और अन्य के खाते में 10 सीटें गई थीं। यहां सरकार बनाने के लिए मैजिक नंबर 41 है। लिहाजा, जेएमएम ने कांग्रेस के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई और हेमंत सोरेन ने बतौर मुख्यमंत्री राज्य की कमान संभाली। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार की चुनावी जंग दिलचस्प होने वाली है।

उपरोक्त सर्वे किसी भी पार्टी के पक्ष में नहीं किए। फिलहाल, प्राप्त आंकड़े चुनाव की असली तस्वीर को तय नहीं करते हैं।

Pushpendra kumar
पुष्पेंद्र कुमारauthor

पुष्पेंद्र कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में चीफ कॉपी एडिटर के रूप में सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं। जर्नलिज्म में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद से वे पिछले 7 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने 10,000 से अधिक खबरें लिखी हैं। पुष्पेंद्र हाइपर-लोकल मुद्दों, रेलवे, रोड, इंफ्रास्ट्रक्चर, डेवलपमेंट, कृषि और मौसम से जुड़ी खबरों पर गहरी पकड़ रखते हैं। शहर से लेकर गांव-देहात तक की संवेदनशीलताओं को समझते हुए वे लोकल खबरों को ऐसा रूप देते हैं जो न केवल तथ्यपूर्ण होता है, बल्कि पाठकों से भावनात्मक रूप से भी जुड़ता है।

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