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मुख्यमंत्री : नाम दारोगा और एक कंडक्टर के कारण सरकार गंवा बैठे बिहार के 10वें CM

बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हम आपके लिए बिहार के सभी मुख्यमंत्रियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। मुख्यमंत्री सीरीज के तहत आज हम 10वें मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय के बारे में जानेंगे। जिनकी राजनीति एक बस कंडक्टर के निलंबन से हिल गई थी। वह लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक गुरु रहे और बाद में उनकी पोती की शादी लालू यादव के बेटे से हुई।

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बिहार के 10वें मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय

बिहार राजपथ परिवहन के एक कंडक्टर को सस्पेंड कर दिया गया। उस पर अपनी नौकरी में कोताही का आरोप था। कंडक्टर आदिवासी था। निलंबन से नाराज कंडक्टर सीधे झारखंड पार्टी के बड़े नेता बागुन सुम्ब्रई के पास पहुंच गया और अपनी पूरी कहानी बयां कर दी। सुम्ब्रई ने तुरंत मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय को फोन लगाया और और कंडक्टर को फिर से बहाल करने को कहा। मुख्यमंत्री ने कुछ नहीं कहा, लेकिन कंडक्टर बहाल भी नहीं हुआ। कुछ दिन बाद बागुन सुम्ब्रई, सीएम दारोगा प्रसाद राय से मिलने गए और फिर से कंडक्टर को बहाल करने की बात कही। मुख्यमंत्री ने फिर से गोलमोल जवाब दिया। इस बात को भी समय बीत गया और अब बारी थी बागुन सुम्ब्रई के बिगड़ने की। बात न मानने पर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने दारोगा प्रसाद राय की सरकार गिराने का मन बना लिया। उन्होंने अपने 11 विधायकों के साथ सरकार से समर्थन वापस ले लिया और दारोगा प्रसाद राय की सरकार गिर गई। ये कहानी बिहार के 10वें मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय की है। हाल के समय में उनका जिक्र उनकी पोती एश्वर्या राय के संबंध में आपने सुना होगा। जो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप राय की पत्नी थीं। चलिए दारोगा प्रसाद राय के बारे में और विस्तार से जानते हैं -

दारोगा प्रसाद राय का प्रारंभिक जीवन कैसा रहा

दारोगा प्रसाद राय का जन्म 2 सितंबर 1922 को बिहार में सारण जिले के बजहिया गांव में हुआ था। एक साधारण किसान परिवार में जन्मे दारोगा प्रसाद राय के पिता का सपना था कि उनका बेटा बड़ा होकर पुलिस में भर्ती हो। यही कारण था कि उन्होंने बेटे का नाम दारोगा रख दिया। गांव के ही स्कूल में दारोगा प्रसाद की पढ़ाई हुई। वह काफी बुद्धिमान और संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी थे। जब वह बड़े हो रहे थे, उस समय स्वतंत्रता आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था। वह भी स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। अब उनकी रुचि राजनीति में भी बढ़ी, लेकिन घर चलाने के लिए उन्होंने टीचर के तौर पर नौकरी करना शुरू कर दिया। इस दौरान उनकी शादी भी हुई और पांच बेटे व 2 बेटियां भी हुईं।

महात्मा गांधी के विचारों से जुड़े

दारोगा प्रसाद राय पर महात्मा गांधी के विचारों का काफी असर पड़ा। महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनके विचारों और सिद्धांतों के आधार पर अप्रैल 1948 में आचार्य विनोबा भावे ने एक सर्वोदयी संघ बनाया। दारोगा प्रसाद भी इससे जुड़ गए। एक बार दारोगा प्रसाद के स्कूल में ही सर्वोदयी संघ का कार्यक्रम हुआ। बिहार के बड़े कांग्रेस नेता और नेहरू कैबिनेट में मंत्री बाबू जगजीवन राम इसमें मुख्य अतिथि बनकर आए थे। इस कार्यक्रम में दारोगा प्रसाद ने भी भाषण दिया। उनके तेवर, अंदाज और तर्क से बाबू जगजीवन राम प्रभावित हुए और कार्यक्रम के बाद उनसे कांग्रेस के लिए काम करने की बात कही।

दारोगा प्रसाद राय का कांग्रेस से जुड़ाव

बाबू जगजीवन राम के कहने पर दारोगा प्रसाद कांग्रेस के कार्यक्रमों में आने-जाने लगे। देश के आजाद होने के बाद साल 1952 में पहली बार बिहार विधानसभा के चुनाव हुए। बाबू जगजीवन राम ने परसा विधानसभा क्षेत्र से दारोगा प्रसाद राय का नाम आगे बढ़ा दिया, टिकट भी मिल गई। दारोगा प्रसाद ने पहले ही चुनाव में जीत दर्ज की। साल 1957 के विधानसभा चुनाव में भी दारोगा प्रसाद ने परसा से ही चुनाव लड़ा और जीते भी। इस बार वह श्रीबाबू की सरकार में मंत्री भी बने। फिर 1962 और 1967 में भी वह चुनाव जीते और इस दौरान कई मंत्रालयों की कमान उनके हाथों में रही।

आयाराम-गयाराम सरकार में दारोगा बने सीएम

1967 के विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला और पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार बिहार में बनी। लेकिन जोड़तोड़ का खेल ऐसा चला कि 1967 से 1969 के बीच राज्य ने चार मुख्यमंत्री देख लिए। आखिरकार 1969 में मध्यावधि चुनाव कराने पड़े और एक बार फिर किसी दल को बहुमत नहीं मिला। कभी राष्ट्रपति शासन लगा तो कभी किसी नेता ने जोड़-तोड़ करके सरकार बनाई। इस पांचवी विधानसभा में थोड़े-थोड़े समय के लिए कुल पांच मुख्यमंत्री बने और दो बार राष्ट्रपति शासन लगा। हरिहर सिंह के नाम पर दारोग प्रसाद ने गठबंधन और विधायकों को एकजुट किया और स्वयं भी मंत्री बन गए। लेकिन उनकी सरकार 116 दिन तक ही चल पायी। 9वें मुख्यमंत्री सरदार हरिहर सिंह की सरकार गिरने के बाद एक बार फिर भोला पासवान शास्त्री को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन इस बार भोला पासवान सिर्फ 13 दिन तक ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे। 4 जुलाई 1969 को मुख्यमंत्री की कुर्सी से भोला पासवान की विदायी के बाद अगले 225 दिनों तक सीएम की कुर्सी खाली रही। आखिर 16 फरवरी 1970 को बिहार को अपना 10वां मुख्यमंत्री मिला। अब बारी दारोगा प्रसाद राय की थी। क्रांग्रेस नेता दारोगा प्रसाद राय हरिहर सिंह के धुर विरोधी गुट के थे और दारोगा प्रसाद राय शुरुआत से ही उनकी सरकार गिराने की कोशिश में थे। आखिर उन्हें मौका मिला तो वो भी ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री के पद पर न रह सके। दारोगा प्रसाद राय 310 दिन तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे और 22 दिसंबर 1970 को इस बद से उनकी भी विदायी हो गई। पांचवीं विधानसभा में बने पांच मुख्यमंत्रियों में दारोगा प्रसाद राय की सरकार सबसे ज्यादा 310 दिन तक चली।

क्यों गई सीएम दारोगा प्रसाद राय की कुर्सी

प्रश्न ये है कि आखिर दारोगा प्रसाद राय को इस्तीफा क्यों देना पड़ा। दरअसल अक्टूबर 1970 में बिहार के 21 कांग्रेस विधायकों ने दिल्ली पहुंचकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी शिकायत की। उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा कि या तो मुख्यमंत्री स्वयं पद छोड़ दें, या फ्लोर टेस्ट करवाएं। उन्होंने पार्टी आलाकमान को बताया कि अगर वह नहीं हटे तो आम चुनाव में पार्टी का बिहार में जीतना काफी मुश्किल हो जाएगा। हालांकि, उनकी इंदिरा गांधी से मुलाकात मात्र 20 मिनट ही चली, लेकिन इस दौरान उन्होंने सीएम दारोगा प्रसाद और उनके मंत्रियों के काम की जमकर शिकायत की। आरोप लगाया कि राज्य में 6 महीने से मुख्य सचिव का पद खाली है, राज्य में अपराध बढ़ रहे हैं, नक्सली घटनाएं भी काफी हो रही हैं। मंत्रियों पर रिश्वत लेने का आरोप भी लगाया गया और कहा गया कि वह शराब पीकर पार्टी को बदनाम कर रहे हैं।

6 महीने में 6 बार मंत्रिमंडल विस्तार

कांग्रेस नेताओं और गठबंधन के साथियों को साधने की कोशिश मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद लगातार करते रहे। यही कारण है कि सिर्फ 6 महीने में ही उन्होंने 6 बार मंत्रिमंडल विस्तार किया। लेकिन उनकी कुछ लापरवाहियां रहीं, जिनके कारण उनके अपने ही विधायक उनके खिलाफ हो गए। फिर दिसंबर 1970 में वो बस कंडक्टर को निलंबित करने वाला कांड हो गया, जिसने दारोगा प्रसाद राय की कुर्सी छीन ली।

इसके बाद 1972 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत तो मिला, लेकिन दारोगा प्रसाद को जीतने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिली। इस बार उन्हें मुख्यमंत्री केदार पांडेय के मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री की जिम्मेदारी मिली। दारोगा प्रसाद राय ने बिहार में एक योजना के तहत ट्यूबवेल लगवाए। तत्कालीन लोकायुक्त को पता चला कि ट्यूबवेल लगवाने में गड़बड़ी ही है। दारोगा प्रसाद पर हेराफेरी का आरोप था और लोकायुक्त ने जांच शुरू कर दी। हालांकि, इस मामले में कभी भी दारोगा प्रसाद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1977 में चुनाव हारने के बाद 1980 के विधानसभा चुनाव में वह फिर जीते, लेकिन 15 अप्रैल 1981 को 59 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक गुरु

1970 के दशक में जब बिहार में सामाजिक न्याय, पिछड़े और दलित नेतृत्व का मुद्दा आगे बढ़ रहा था, उस समय लालू यादव यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे। लालू यादव ने जब राजनीति में उतरने का मन बनाया तो दारोगा प्रसाद राय ने उनकी मदद की। उन्हें पैसा भी दिया। बाद में लालू यादव की दारोगा प्रसाद राय के बेटे चंद्रिका राय से दोस्ती हो गई और चंद्रिका राय RJD से विधायक व मंत्री भी रहे। यह दोस्ती रिश्तेदारी में भी बदली, जब लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और चंद्रिका राय की बेटी यानी दारोगा प्रसाद राय की पोती एश्वर्या राय की शादी हुई। हालांकि, यह शादी ज्यादा दिन नहीं चली और अब दोनों के बीच तलाक का केस चल रहा है। अब दोनों परिवारों के बीच अनबन है।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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