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Rani lakshmi bai jayanti 2025 Speech, Bhashan: खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी..., रानी लक्ष्‍मीबाई जयंती पर ऐसे लिखें दमदार निबंध और भाषण

Rani lakshmi bai jayanti 2025 Speech, Bhashan Essay Nibandh in Hindi: नारी शक्ति की अनुपम प्रतीक, प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सशस्त्र संघर्ष की अग्रदूत, महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की आज जयंती है। उनके अदम्य पराक्रम एवं उत्कृष्ट युद्ध कौशल ने ब्रिटिश कुशासन की जड़ें हिला दी थीं। उनकी जयंती के अवसर छात्र भाषण और निबंध तैयार कर सकते हैं। यहां पढ़ें रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचय।

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Rani lakshmi bai jayanti 2025 Speech, Bhashan

Rani lakshmi bai jayanti 2025 Speech, Bhashan Essay Nibandh in Hindi: नारी शक्ति की अनुपम प्रतीक, प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सशस्त्र संघर्ष की अग्रदूत, महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की आज जयंती है। उनके अदम्य पराक्रम एवं उत्कृष्ट युद्ध कौशल ने ब्रिटिश कुशासन की जड़ें हिला दी थीं। स्वाभिमान, संस्कृति एवं मातृभूमि की रक्षा हेतु उनका सर्वोच्च बलिदान युग-युगांतर तक देशवासियों को राष्ट्रसेवा हेतु प्रेरित करता रहेगा। उनकी जयंती के अवसर छात्र भाषण और निबंध तैयार कर सकते हैं। यहां पढ़ें रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचय।

झांसी की रानी का जीवन परिचय

बनारस में 19 नवंबर 1828 को जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था। प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनके पिता मोरोपंत तांबे और मां भागीरथी सप्रे थीं। वह मनु चार साल की थीं, तभी उनकी मां की निधन हो गया। पिता बिठूर जिले के पेशवा बाजी राव द्वितीय के लिए काम करते थे। उन्होंने लक्ष्मी बाई का पालन पोषण किया। इस दौरान उन्होंने घुड़सवारी, तीरंदाजी, आत्मरक्षा और निशानेबाजी की ट्रेनिंग ली। 14 साल की उम्र में 1842 में मनु की शादी झांसी के शासक गंगाधर राव नेवलकर से कर दी गई। शादी के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा।

Rani lakshmi bai jayanti Speech in Hindi: लक्ष्मीबाई जयंती पर भाषण

'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी', यही वाक्‍य थे, जिसने झांसी की रानी लक्ष्‍मीबाई को इतिहास में अमर दिया। यह वो दौर था, जब आधुनिक भारत कई छोटी रियासतों में बंटा था और यहां ब्रिटेन की ईस्‍ट इंडिया कंपनी अपने पैर पसार रही थी। अंग्रेजी हुकूमत ने नागपुर, तंजावर, सतारा जैसी मराठी रियासतों को समाप्‍त करते हुए ब्रिटिश कंपनी का हिस्सा बना लिया था। उनकी नजर झांसी पर भी थी, जिसके लिए उन्‍होंने खूब पैंतरे अपनाए।

झांसी को ब्रिटिश कंपनी का हिस्‍सा बनाने की साजिश अंग्रेजों ने तब की थी, जब नवंबर 1853 में झांसी के राजा गंगाधर राव का निधन हो गया। तत्‍कालीन परिस्थितियों के अनुसार, झांसी को बचाए रखने के लिए वारिस की जरूरत थी। गंगाधर राव और मणिकर्णिका, जो आगे चलकर रानी लक्ष्‍मीबाई के तौर पर मशहूर हुईं, की जो औलाद हुई वह तीन महीने बाद ही चल बसी। इसके बाद गंगाधर राव की भी तबीयत खराब रहने लगी थी।

Rani lakshmi bai jayanti Essay in Hindi: लक्ष्मीबाई जयंती पर निबंध

अंग्रेजों की नजर झांसी पर थी। झांसी को बचाने के लिए गंगाधर राव और रानी लक्ष्‍मीबाई ने एक बच्‍चे 'दामोदर' को गोद लिया था। अंग्रेज, जो किसी भी तरह से झांसी को ब्रिटिश कंपनी का हिस्‍सा बनाने की साजिश में लगे थे, उन्‍होंने दामोदर को झांसी का वारिस मानने से इनकार कर दिया था। यहीं से शुरू हुई थी अंग्रेजों के साथ झांसी की रानी की असली लड़ाई।

झांसी को खत्‍म करने की साजिश लॉर्ड डलहौजी ने की थी। अंग्रेजों की हर चाल, हर साजिश से लड़ने के लिए रानी लक्ष्‍मीबाई ने सबसे पहले बैरिस्टर जॉन लैंग की सलाह मांगी थी। उन्‍होंने पहले तो बातचीत के जरिये मसला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन जब उन्हें यकीन हो गया कि बातचीत से समाधान नहीं होगा तो उन्‍होंने अंग्रेजों के खिलाफ विभिन्‍न रियासतों को लामबंद करना शुरू किया। उन्‍होंने सबसे पहले बाणपूर के राजा मर्दान सिंह को खत लिखकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सहयोग मांगा था।

Rani lakshmi bai Jeevan Parichay: रानी लक्ष्मीबाई जीवन परिचय

इतिहासकार बताते हैं कि यहां से किस तरह लक्ष्‍मीबाई की अंग्रेजों के साथ लड़ाई महज झांसी के लिए नहीं रह गई थी, बल्कि यह जंग विदेशी शासन को भारत से उखाड़ फेंकने के खिलाफ हो गई थी। उन्‍होंने कई राजाओं से संपर्क किया और अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ उन्‍हें एकजुट किया। झांसी पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए उन्‍होंने अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ दी। इसके बाद तो जो भी हुआ इतिहास ही है।

ऐतिहासिक तथ्‍य बताते हैं कि अंग्रेजों के मुकाबले कम सैन्‍य क्षमता के बावजूद रानी लक्ष्‍मीबाई ने किस बहादुरी के साथ उनसे मुकाबला किया। यह भी गौर करने वाली बात है कि लक्ष्‍मीबाई जब अंग्रेजों के खिलाफ जंग-ए-मैदान में उतरीं तो उनकी उम्र महज 29 साल थी। छोटी सी उम्र में मातृभूमि की रक्षा के लिए उन्‍होंने जिस तरह बहादुरी और वीरता का परिचय देते हुए अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए, वह आज भी मिसाल है और करोड़ों लोगों की प्रेरणा का स्रोत भी। जंग-ए-मैदान में हालांकि वह शहीद हो गईं, लेकिन उनकी बहादुरी के कायल अंग्रेज भी रहे।

Kuldeep Raghav
कुलदीप राघव author

कुलदीप राघव प्रिंट और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक अनुभव का रखने वाले पत्रकार हैं। टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में वह एजुकेशन सेक्शन को लीड कर... और देखें

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