How Rainfall is Measured in Hindi: बारिश होना तो हम सभी देखते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मौसम विभाग कैसे बताता है कि किसी शहर में 10 मिलीमीटर, 50 मिलीमीटर या 200 मिलीमीटर बारिश हुई? आखिर वैज्ञानिक यह आंकड़ा कैसे निकालते हैं? क्या वे हर जगह जाकर पानी नापते हैं या इसके लिए कोई खास मशीन होती है? आइए आसान भाषा में समझते हैं कि बारिश को कैसे मापा जाता है और इसका रिकॉर्ड कैसे तैयार किया जाता है।
बारिश मापने के लिए कौन-सी मशीन होती है?
बारिश मापने के लिए जिस उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है, उसे रेन गेज (Rain Gauge) कहा जाता है। यह एक खास तरह का बर्तन या मशीन होती है, जिसे खुले स्थान पर लगाया जाता है ताकि आसमान से गिरने वाली बारिश का पानी सीधे इसमें इकट्ठा हो सके।
मौसम विभाग देशभर में हजारों जगहों पर रेन गेज लगाता है। कई जगह अब पूरी तरह ऑटोमैटिक डिजिटल रेन गेज भी लगाए जा चुके हैं, जो बिना किसी व्यक्ति की मदद के खुद ही डेटा रिकॉर्ड कर लेते हैं।
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मिलीमीटर में क्यों मापी जाती है बारिश?
बारिश को मिलीमीटर (mm) में मापा जाता है। मान लीजिए किसी जगह पर बारिश का पानी बिल्कुल समतल जमीन पर जमा हो जाए और कहीं बहकर न जाए, तो पानी की जितनी ऊंचाई बनेगी, वही बारिश की मात्रा कहलाती है। उदाहरण के लिए अगर मौसम विभाग कहता है कि 20 मिलीमीटर बारिश हुई है, तो इसका मतलब है कि उस जगह पर जमीन पर करीब 20 मिलीमीटर ऊंची पानी की परत बन सकती थी।
रेन गेज कैसे काम करता है? (How Rain Gaug is works)
रेन गेज के ऊपर एक गोल मुंह होता है, जिससे बारिश का पानी अंदर जमा होता रहता है। यह पानी नीचे लगे माप वाले सिलेंडर या कंटेनर में पहुंचता है। इसके बाद वैज्ञानिक या ऑटोमैटिक सिस्टम यह देखता है कि कितना पानी जमा हुआ है। उसी के आधार पर यह तय किया जाता है कि उस इलाके में कितनी बारिश हुई। आजकल कई रेन गेज इंटरनेट से जुड़े होते हैं और हर कुछ मिनट में मौसम विभाग के सर्वर पर जानकारी भेजते रहते हैं।
सिर्फ रेन गेज से ही नहीं मिलती जानकारी
आज मौसम विभाग सिर्फ रेन गेज पर निर्भर नहीं रहता। इसके साथ कई आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जाता है। डॉपलर मौसम रडार बादलों की गतिविधि और बारिश की तीव्रता पर नजर रखते हैं। वहीं मौसम उपग्रह (सैटेलाइट) अंतरिक्ष से बादलों की तस्वीरें भेजते हैं। कई जगह ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन भी लगाए गए हैं, जो बारिश के साथ तापमान, हवा की गति और नमी जैसी जानकारी भी रिकॉर्ड करते हैं।
इन सभी आंकड़ों को मिलाकर मौसम विभाग सटीक रिपोर्ट तैयार करता है।
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