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1985 का वो चुनाव, जिसमें Nitish Kumar ने 20 हजार रुपये उधार लिए और पत्नी को दिया एक वचन, अगर...

आज से Nitish Kumar बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री हो जाएंगे। आज उनके सीएम पद से इस्तीफे के साथ ही बिहार और नीतीश की राजनीति एक नई करवट लेगी। इस अवसर पर जानें नीतीश के पहला चुनाव जीतने की कहानी -

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एक समय राजनीति से संन्यास लेने का मन बना चुके थे नीतीश कुमार

बिहार की राजनीति के लिए आज बड़ा दिन है। सबसे ज्यादा 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार आज से बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री हो जाएंगे। आज सुबह 11 बजे सीएम नीतीश कुमार अपनी कैबिनेट की आखिरी बैठक लेंगे और उसके बाद वह अपने पद से इस्तीफा (Nitish Kumar Resignation) देंगे। आज दोपहर 3.15 बजे उनका राज्यपाल से मुलाकात का शेड्यूल तय है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ ही बिहार में एक युग का अंत हो जाएगा। आज नीतीश कुमार सुर्खियों में सबसे ऊपर बने हुए हैं तो उनके बचपन से लेकर राज्यसभा जाने तक की कहानियां सामने आ रही हैं। ऐसी ही एक कहानी उनके अपनी पत्नी से 20 हजार रुपये लेकर चुनाव लड़ने की भी है, जिसमें उन्होंने पत्नी से एक वादा भी किया था। चलिए जानते हैं, कैसी थी वह परिस्थितियां और क्या था नीतीश कुमार का अपनी पत्नी को दिया हुआ वो वचन -

कहानी 1980 के दशक की है। उस समय जेपी आंदोलन और छात्र राजनीति से निकले नए-नए नेताओं का कद बढ़ने लगा था। लालू प्रसाद यादव जैसे नए नेताओं ने उस समय बिहार की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बना ली थी। लेकिन नीतीश कुमार की किस्मत में अभी और संघर्ष बाकी थे। तब तक नीतीश कुमार 1977 और 1980 के बिहार विधानसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमा चुके थे और दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही लगातार दो हार ने उन्हें सिर्फ आर्थिक तौर पर ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी तोड़ दिया था।

पत्नी को दिया वचन और 20 हजार रुपये का उधार

शुरुआत में ही लगातार दो हार से उनकी राजनीतिक नाव हिचकोले खाने लगी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति भी लगातार कमजोर होती जा रही थी। इसी बीच 1985 के विधानसभा चुनाव की घोषणा भी हो गई। नीतीश कुमार ने एक बार फिर चुनावों में भाग्य आजमाने का फैसला किया, लेकिन उनके पास रुपये नहीं बचे थे। इसी दौरान उन्होंने अपनी पत्नी मंजू देवी से बात की और उनसे 20 हजार रुपये उधार लेकर चुनावी मैदान में कूद गए। लेकिन यह 20 हजार रुपये लेने पर उन्होंने पत्नी को एक वचन भी दिया कि अगर वह इस बार भी चुनाव हार गए तो हमेशा-हमेशा के लिए राजनीति छोड़ देंगे।

Nitish Kumar and his Wife

Nitish Kumar और उनकी पत्नी मंजू देवी की फाइल फोटो

जीत के साथ बिहार को मिला नया नायक

पहले ही दो विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देख चुके नीतीश कुमार के लिए 1985 का विधानसभा चुनाव काफी अहम था। उनके लिए इस बार करो या मरो की स्थिति थी। अगर वह हार जाते तो पत्नी से किए वादे के अनुसार उन्हें राजनीति छोड़नी होती। अपनी इस तीसरी कोशिश के लिए उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी। राजनीतिक रणनीति से लेकर संसाधनों के उपयोग तक, नीतीश कुमार ने हर स्तर पर आक्रामक रुख अपनाया। आखिर उनकी मेहनत रंग लाई और हरनौत सीट से वह 22 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीत गए। यहीं से बिहार को एक नया नायक मिला और नीतीश कुमार का उत्थान शुरू हुआ।

...और सुशासन बाबू बन गए नीतीश कुमार

1985 के चुनाव में जीत के बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 1989 से 2004 तक वह लगातार लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र की राजनीति करते रहे और अपनी मजबूत पकड़ व पहचान बनाई। इस दौरान वह केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री भी रहे। फिर साल 2005 में उन्होंने बिहार की सत्ता अपने हाथों में ली और बिहार के मुख्यमंत्री बने और जल्द ही उनकी छवि 'सुशासन बाबू' की बन गई।

बिना चुनाव लड़े मुख्यमंत्री बनते रहे नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने बिहार की छवि को बदलने के लिए कड़ी मेहनत की। इसी का नतीजा है कि उनकी छवि सुशासन बाबू की बन गई। इस दौरान एक अनोखी बात यह भी रही कि वह बार-बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन कभी भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। बल्कि राज्य विधान परिषद के सदस्य बने और सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहे। इसी लिए अक्सर कहा जाता है कि यह मुख्यमंत्री पद के लिए वह बैकडोर एंट्री लेते रहे।

गठबंधन बदले, लेकिन सीएम नीतीशे कुमार

नीतीश कुमार ने 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान उन्होंने कई बार गठबंधन बदले। कभी वह एनडीए के साथ रहे तो कभी कांग्रेस और वाम दलों के साथ महागठबंधन बनाया। गठबंधन चाहे जो हो, मुख्यमंत्री की कुर्सी हर बार नीतीश कुमार के लिए ही रिजर्व रही। अब उन्होंने राज्यसभा सदस्य के तौर पर शपथ ले ली है और आज बिहार के मुख्यमंत्री पद से भी इस्तीफा दे देंगे, तो अब नीतीश का करियर एक अलग ही मोड़ पर है। वह लंबे समय तक लोकसभा में रहे, लेकिन अब बारी संसद के उच्च सदन (Rajya Sabha) की राजनीति की है।

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Digpal Singh
दिगपाल सिंह author

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी... और देखें

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