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International Women's Day: इतिहास के पन्नों में आज भी अमर है इन वीरांगनाओं की अमर गाथा, शाही अंदाज में दी हर संकट को चुनौती

भारत में नारी को शक्ति और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है, जो समाज और राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं के योगदान को याद करने का अवसर देता है। इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि कठिन समय में भारत की वीरांगनाओं ने साहस और नेतृत्व से देश का गौरव बढ़ाया है। ऐसे में आइए जानें भारत की वीर रानियों के बारे में।

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026: भारत की वीर रानियां

International Women's Day 2026: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ — (मनुस्मृति)

अर्थात- जहां नारियों का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां उनका अनादर होता है, वहां किए गए सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।

हमारे देश में नारी को देवी माना जाता है। हर साल 8 मार्च के दिन को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 2026 में रविवार के दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 (International Women's Day 2026) मनाया जाएगा और जब ये डेट नजदीक आ गई है तो एक बात का स्मरण हम सब को दोबारा से करना चाहिए कि महिलाएं समाज की आधारशिला हैं और परिवार की मजबूत डोर हैं। वे शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता को संवारने में अहम भूमिका निभाती हैं। सशक्त महिलाएं न केवल घर को बल्कि राष्ट्र को भी प्रगति की ओर ले जाती हैं। उनकी मेहनत, धैर्य और समर्पण हर क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत हैं। महिलाओं का सम्मान और उनका विकास समाज की वास्तविक उन्नति की पहचान है। हमारा इतिहास भी गवाह रहा है कि, जब-जब प्रजा और राष्ट्र पर संकट आया है और पुरुष कमजोर पड़े हैं तब-तब नारियों ने सत्ता संभाली है और दुश्मनों को धूल चटाई है। ऐसे में आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर हम आपको भारत की ऐसी वीर रानियों के बारे में बताएंगे, जिनकी गाथाएं आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में अंकित हैं।

Rani Lakshmi Bai

रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai)

रानी लक्ष्मीबाई (1828-1858) झांसी की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख वीरांगना थीं। उनका जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता मोरोपंत तांबे थे और उन्हें प्यार से 'मनु' कहा जाता था। उन्होंने कम उम्र में ही घुड़सवारी, तलवारबाजी, निशानेबाजी और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। 1842 में उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ, जिसके बाद वे लक्ष्मीबाई बनीं। पति की मृत्यु के बाद, अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झांसी को हड़पने की कोशिश की। 17-18 जून 1858 को ग्वालियर के पास अंग्रेजों से लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं।

रानी ताराबाई भोंसले (Rani Tarabai Bhonsle)

छत्रपति शिवाजी की बहू रानी ताराबाई को ‘मराठाओं की रानी’ के नाम से भी जाना जाता है। 1700 में परिस्थितियों ने उन्हें मराठा साम्राज्य की कमान संभालने पर मजबूर किया, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने लोगों के लिए संघर्ष करना नहीं छोड़ा। अपने शासनकाल में उन्होंने मुगलों की सोच को गलत साबित किया कि महिलाएं भी किसी से कम नहीं। उन्होंने अपने दुश्मनों से सीख ली और अपने बुद्धिमान रणनीतियों से मराठा सेना को दक्षिण कर्नाटक में अपनी सत्ता स्थापित करने में मदद की।
Queen Ahilyabai Holkar

रानी अहिल्याबाई होलकर

रानी अहिल्याबाई होलकर (Queen Ahilyabai Holkar)

रानी अहिल्याबाई का जन्म अहमदनगर के जामखेड तालुका के चोंडी गांव में हुआ था। बचपन में उन्होंने देखा कि समाज में महिलाओं की शिक्षा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। अपने पिता से घर पर शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद, अहिल्याबाई हमेशा दूसरों की भलाई के लिए चिंतित रहती थीं। उनका जीवन कई कठिनाइयों से भरा रहा। पति, ससुर और पुत्र का निधन केवल कुछ ही दशकों में हो गया। इन चुनौतियों के बावजूद, 11 दिसंबर 1767 को जब वह सिंहासन पर बैठीं, उन्होंने मालवा के लोगों के लिए महानता की दिशा में काम करने का संकल्प लिया। अपने शासनकाल में उन्होंने अपनी राज्यव्यवस्था की रक्षा की, हमलों का सामना किया और सेना का दायरा बढ़ाया।

रानी चेनम्मा (Rani Chennamma)

रानी चेनम्मा अपने पति और पुत्र के निधन के बाद एक कठिन निर्णय के सामने थीं। या तो उन्हें वारिस अपनाना पड़ता या ब्रिटिशों के हाथ राज्य चला जाता। उन्होंने शिवलिंगप्पा नामक एक लड़के को 1824 में गोद लिया। यह कदम ईस्ट इंडिया कंपनी को नागवार गुजरा। अपने किट्टूर राज्य के गौरव को बनाए रखने के लिए, उन्होंने अंग्रेजों को चुनौती दी। 21 अक्टूबर 1824 को 20,000 सैनिकों और 400 तोपों के साथ अंग्रेजों ने उनपर हमला किया। उन्होंने पहली बार हमले का सफलतापूर्वक मुकाबला किया, लेकिन दूसरी बार वे असफल रहीं और उन्हें बायलहोंगल किले में जीवनभर के लिए कैद कर दिया गया।

तीलू रौतेली (Tilu Rauteli)

तीलू रौतेली, जिनका वास्तविक नाम तिलोत्तमा देवी था, उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र की एक अद्वितीय साहसी वीरांगना के रूप में जानी जाती हैं। कहा जाता है कि मात्र 15 वर्ष की आयु में ही उन्होंने युद्धभूमि में कदम रख दिया और अपने शौर्य से शत्रु राजाओं को कड़ी चुनौती दी। लगभग सात वर्षों तक उन्होंने लगातार संघर्ष करते हुए कई युद्धों में भाग लिया। केवल 22 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते वह सात युद्ध लड़ चुकी थीं, जो उनके अदम्य साहस और पराक्रम का प्रमाण है। अपने वीरतापूर्ण कार्यों के कारण तीलू रौतेली का नाम रानी लक्ष्मीबाई, चांद बीबी, झलकारी बाई और बेगम हजरत महल जैसी महान वीरांगनाओं की श्रेणी में लिया जाता है, और उनकी ख्याति देश-विदेश तक फैली हुई है।

Razia Sultan

रजिया सुल्तान

रजिया सुल्तान (Razia Sultan)

रजिया सुल्तान महिलाओं के अधिकार और नेतृत्व की प्रतीक थीं। उन्होंने खुद को ‘सुल्ताना’ नहीं कहवाने का निर्णय लिया, क्योंकि यह उनके लिंग का प्रतीक था। मामलुक वंश (1206-1290), जिसे गुलाम वंश भी कहा जाता है, की पांचवीं शासिका के रूप में, सुल्ताना युद्ध और प्रशासन दोनों में निपुण थीं। उन्होंने शिक्षा और जनता की भलाई पर ध्यान दिया और स्कूल, अकादमियां, अनुसंधान केंद्र और पुस्तकालय स्थापित किए। लेकिन भटिंडा के गवर्नर मलिक इख्तियार-उद-दीन अल्तुनिया ने उनकी नीतियों का विरोध किया और उन्हें सत्ता से हटाने की साजिश रची। यह साजिश सफल रही और रजिया सुलतान का 35 वर्ष की आयु में राज्य पुनः प्राप्त करने के प्रयास में निधन हो गया।

रानी दुर्गावती (Rani Durgavati)

रानी दुर्गावती का पालन-पोषण एक राजघराने में हुआ, जहां बचपन से ही उन्होंने वीरता और सम्मान की कहानियां सुनीं। इन प्रेरणादायक कथाओं ने उनके भीतर साहस और नेतृत्व की भावना पैदा की। जब परिस्थितियों के चलते उन्हें शासन की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी, तब वह इसके लिए पूरी तरह तैयार थीं। उनके पास लगभग 20,000 घुड़सवार सैनिकों और 1,000 युद्ध हाथियों की शक्तिशाली सेना थी, जिसने उन्हें एक मजबूत और निडर शासक बनाया। उन्होंने अपनी राजधानी को सिंगौरगढ़ किले से पूर्व दिशा में स्थित चौरागढ़ किले में स्थानांतरित किया। उस समय मुगल सम्राट अकबर की सेना की नजर इस किले पर थी, फिर भी रानी दुर्गावती ने बिना किसी भय के अपने निर्णय पर अमल किया। किले पर अधिकार जमाने के लिए मुगल सेना ने कई हमले किए। एक ऐसे ही युद्ध के दौरान रानी दुर्गावती को दो तीर लगे। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्होंने अपमान और धीमी मृत्यु से बचने के लिए साहसिक निर्णय लेते हुए स्वयं अपने पेट में खंजर घोंप लिया और वीरगति को प्राप्त हुईं।

Nilesh DwivedI
निलेश द्विवेदीauthor

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अपडेट्स पर लगातार काम करते हैं। निलेश महत्वपूर्ण विवरणों को चुनने और पाठकों की रुचि के हिसाब से कंटेंट को प्रभावी तरीके से पेश करने के लिए जाने जाते हैं। डिजिटल न्यूजरूम के रफ्तार भरे माहौल में वे हर खबर को सटीक एंगल, आसान भाषा और उपयोगी जानकारी के साथ पेश करने पर फोकस करते हैं और अबतक 2,000 से अधिक खबरें लिख चुके हैं।

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