Indore Hospital: मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां के घनी आबादी वाले खजराना इलाके में 100 बेड का एक सिविल अस्पताल कागजों पर तो पूरी तरह बन गया है और उसके लिए 87 पदों का स्टाफ भी मंजूर हो चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल विपरीत है। 6 साल बीत जाने के बाद भी यहां अस्पताल की एक ईंट तक नहीं रखी गई है। इस अनोखे मामले से परेशान स्थानीय लोगों ने इस परियोजना को "घोस्ट हॉस्पिटल" यानी "भूतिया अस्पताल" का नाम दे दिया है। लोग अब सवाल उठा रहे हैं कि जब अस्पताल की इमारत का निर्माण ही नहीं हुआ है, तो इसके नाम पर नियुक्तियां और ट्रांसफर कैसे किए जा रहे हैं?
2020 में मिली अस्पताल निर्माण की मंजूरी
अधिकारियों के मुताबिक, खजराना और आसपास के करीब पांच लाख लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए साल 2019 में इस 100 बेड के सिविल अस्पताल की योजना बनाई गई थी। साल 2020 में इसके निर्माण के लिए मंजूरी मिल गई थी। इसके बाद सरकारी प्रक्रिया के तहत डॉक्टर, नर्स, लैब टेक्नीशियन और फार्मासिस्ट समेत कुल 87 पद स्वीकृत किए गए थे। लेकिन अस्पताल की बिल्डिंग नहीं बनी, इसलिए इस स्टाफ को शहर के अन्य स्वास्थ्य केंद्रों और संजीवनी क्लीनिकों में तैनात कर दिया गया।
क्यों नहीं बन पाया अस्पताल? CMHO ने बताई वजह
न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव हसानी ने बताया कि अस्पताल के लिए जमीन आवंटित तो कर दी गई है, लेकिन अभी तक उसका वास्तविक कब्जा नहीं मिला है। इसी वजह से निर्माण एजेंसी को जमीन नहीं सौंपी जा सकी और परियोजना आगे नहीं बढ़ पाई।
अस्पताल की जमीन पर कचरे का ढेर
इस पांच एकड़ की आवंटित जमीन पर वर्तमान में सिर्फ कचरे और मलबे का ढेर लगा हुआ है। एक स्थानीय निवासी ने कहा, "यह एक ऐसा अस्पताल है जो कागजों पर तो पूरा दिखाता है, लेकिन जमीन पर गायब है। हमने कोरोना महामारी के दौरान अपनों को खोया है, इसलिए हम एक अस्पताल की कीमत बखूबी जानते हैं।"
खबर वायरल होने के बाद प्रशासन की सफाई
सोशल मीडिया और मीडिया में 'घोस्ट हॉस्पिटल' की खबर चर्चा में आने के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया। सोमवार रात जिला मजिस्ट्रेट (DM) शिवम वर्मा ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर एक बयान जारी किया। जिसमें अस्पताल निर्माण में देरी की मुख्य वजह स्वास्थ्य विभाग को जमीन का वास्तविक हस्तांतरण न होना बताया गया है। वर्तमान में इंदौर नगर निगम इस जमीन का इस्तेमाल कर रहा है, जल्द ही सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएंगी। जिसके बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।
दवाइयों की कोई खरीद नहीं
प्रशासन ने साफ किया कि इस प्रस्तावित अस्पताल के नाम पर अभी तक किसी तरह की सरकारी दवाइयों या उपकरणों की खरीद नहीं की गई है। बयान में कहा गया कि, 2021 में स्वीकृत 87 पदों में से अब तक सिर्फ 29 स्टाफ नर्स, 5 फार्मासिस्ट और 1 लैब टेक्नीशियन की ही नियुक्ति हुई है। अभी तक इस अस्पताल के लिए किसी भी डॉक्टर की नियुक्ति का आदेश जारी नहीं किया गया है।
इंदौर का खजराना इलाका मुस्लिम बहुल और घनी आबादी वाला क्षेत्र है, लेकिन यहां कोई बड़ा सरकारी अस्पताल नहीं है। इलाज के लिए यहां के लोगों को महाराजा यशवंतराव अस्पताल (MYH) और शहर के अन्य सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस अस्पताल के बनने से खजराना और आसपास के इलाकों को लाभ मिलेगा।
(इनपुट - PTI)
