कुछ ही दिनों में होली आने वाली है। होली पर रंगों के साथ ही एक और परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और वह है गुझिया बनाने, खाने और खिलाने की। गुझिया की मिठास होली के रंगों को और भी खास बनाती है। आह गुझिया और होली एक-दूसरे के साथ इस तरह से जुड़ गए हैं कि इन्हें अलग करके देखा ही नहीं जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुझिया पहली बार कहां बनी? कैसे इसका नाता होली से जुड़ा? आज भारत के किस शहर की पहचान गुझिया से जुड़ी है? इसके अलावा एक और प्रश्न का उत्तर खोजेंगे कि क्या होली की शान गुझिया तुर्किए से भारत में आयी या यह भारत की अपनी डिश है?
गुझिया का मौजूदगी भारतीय पकवानों के इतिहास में काफी पुरानी है। हालांकि, इतिहास के पन्नों में बहुत कम और आम चलन में इसे खाने की परंपरा ज्यादा रही है। गुझिया के बारे में किताबों में काफी कम लिखा गया है, लेकिन शास्त्रों व ग्रंथों में नाममात्र के लिए ही सही, इसका जिक्र मिलता जरूर है।
गुझिया से है यहां की पहचान
गुझिया का इतिहास ढूंढ़ने निकलेंगे तो आपके सामने बार-बार उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके का नाम आएगा। मान्यता है कि 16-17वीं सदी के बीच आधुनिक गुझिया यहीं बनी थी। हालांकि, आज गुझिया को बनाने का तरीका पहले के मुकाबले काफी कुछ बदल गया है। एक संदर्भ 13वीं शताब्दी का भी सामने आता है, जिसमें गुझिया की रेसपी का जिक्र है। इसके अनुसार शहद और गुड़ के मिश्रण को गर्म करके आटे की परत के साथ बनाया जाता था, जो आज की गुझिया की तरह का ही पकवान था। एक अन्य संदर्भ में गुझिया की मूल उत्पत्ति बुंदेलखंड को ही माना जाता है। यही नहीं यह तथ्य भी सामने आया है कि पहले गुझिया को आज की तरह डीप फ्राई नहीं किया जाता था, बल्कि गुड़ और शहद के मिश्रण को आटे में भरकर उसे धूप में सुखाकर उसका सेवन किया जाता था।
बकलावा से गुझिया तक?
कुछ इतिहासकारों का दावा है कि गुझिया का जन्म मिडिल ईस्ट के देश तुर्किए में हुआ था। शुरुआत में इसका आकार समोसे जैसा होता था, बल्कि इसे मीठा समोसा ही समझा जाता था। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक उस समय गुझिया का आकार गोल होता था, जिसका संबंध तुर्किए की मशहूर डिश बकलावा से था। बकलावा मीठी पेस्ट्री के रूप में आज भी प्रचलित है। माना जाता है कि इसी बकलावा के आकार में बदलाव से आधुनिक गुझिया का जन्म हुआ। बाद के दिनों में गुझिया बनाने के लिए मैदे और ड्राइफ्रूट्स का इस्तेमाल किया जाने लगा। फिर लोगों को मैदे और ड्राइफ्रूट्स का यह कॉम्बिनेशन पसंद आने लगा और यह पॉपुलर हो गई।

ये है तुर्की की मशहूर डिश बकलावा
तुर्किए के मुस्लिम व्यापारी भारत लाए गुझिया?
कहा तो यह भी जाता है कि तुर्किए का एक गुझिया जैसा पकवान वहां के मुस्लिम व्यापारी 13वीं-14वीं सदी में भारत लेकर आए थे। उस दौर में अरब देशों से भारत आए मुस्लिम व्यापारी और मुगल अपनी खान-पान की आदतों के अनुसार अपने साथ कई तरह से पकवान लेकर आए थे। फिर आगे चलकर उन व्यंजनों को भारत में इस तरह अपना लिया गया, जैसे वह यहीं के हों। माना जाता है कि गुझिया भी इसी तरह भारत आई थी। मुगल काल में 15वीं-16वीं सदी में उनके शाही किचन में गुझिया ने अपना मौजूदा स्वरूप और मिठास पाई। हालांकि, माना जाता है कि तब तक यह तुर्किए के प्राचीन पकवान बकलावा का ही भारतीय रूप था।
प्राचीन भारत की करणिका और गुझिया
कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि गुझिया की जड़ें प्राचीन भारतीय संस्कृति से जुड़ी हैं। संस्कृत ग्रंथों में 'करणिका' नाम की एक मिठाई जिक्र मिलता है। करणिका में सूखे मेवे भरे जाते थे और इसे मीठा करने के लिए शहद का प्रयोग होता था। बाद में समय बीतने के साथ इसमें कई प्रयोग हुए। 16-17वीं सदी के बाद गुझिया की मिठास राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश से होते हुए पूरे देश में फैली।

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एक गुझिया के कितने नाम
उत्तर प्रदेश और ज्यादातर उत्तर भारत में इसे गुझिया के नाम से ही जाना जाता है। कुछ जगहों पर इसे गुजिया भी कहते हैं। गुजरात में घुघरा नाम से गुझिया को जाना जाता है। महाराष्ट्र में इसे करांजी कहते हैं। इसके अलावा गुझिया को पेड़किया भी कहते हैं। गुझिया से मिलती-जुलती एक डिश का नाम चंद्रकला है, जिसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में खासा पसंद किया जाता है।
