Gurugram Heat Divide: दिल्ली से सटे साइबर सिटी गुरुग्राम में रहने वाले लोगों के लिए एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर आप गुरुग्राम के द्वारका एक्सप्रेसवे कॉरिडोर वाले इलाके में रह रहे हैं, तो आप सुशांत लोक या साउथ सिटी में रहने वाले किसी व्यक्ति की तुलना में 8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक सतही तापमान (Land Surface Temperature) झेल रहे हैं। उदाहरण के लिए, जब सेक्टर 43 में थर्मामीटर पर तापमान 39°C दर्ज होता है, ठीक उसी वक्त सेक्टर 84 की जमीन पर यह तापमान 44°C तक दर्ज होता है।
एक ही शहर के भीतर तापमान का यह भारी अंतर कोई प्राकृतिक संयोग या महज मौसम का मिजाज नहीं है। बल्कि यह बीते एक दशक से गुरुग्राम में बिना सोचे-समझे किए गए अंधाधुंध कंक्रीटीकरण, तेजी से गायब होती हरियाली, हीट सोखने वाली डामर की सड़कों और चमचमाते कांच की इमारतों का सीधा नतीजा है।
12 साल का सैटेलाइट डेटा से खुली पोल
जलवायु थिंक-टैंक 'एनवायरोकैटलिस्ट' (Envirocatalysts) द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन में गुरुग्राम के इस थर्मल डिवाइड यानी तापमान विभाजन का खुलासा हुआ है। इस स्टडी में साल 2015 से 2026 के बीच मार्च से जून तक के गर्मियों के महीनों का 12 साल का वॉर्ड-वार विश्लेषण किया गया है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी के लैंडसैट 8 और लैंडसैट 9 उपग्रहों (Satellites) से प्राप्त 30-मीटर रिज़ॉल्यूशन वाले डेटा के जरिए गुरुग्राम के हर मोहल्ले के तापमान को बारीकी से मापा गया।
इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि गुरुग्राम में कोई निवासी किस इलाके में घर खरीदता है या रहता है, यह सीधे तौर पर तय करता है कि वह कितनी खतरनाक गर्मी का सामना करेगा। चौंकाने वाली बात यह है कि साल-दर-साल मौसम बदलने के बावजूद, शहर के कुछ खास अत्यधिक गर्म इलाके पिछले एक दशक से लगातार बने हुए हैं, जो यह साबित करता है कि यह समस्या मौसमी नहीं बल्कि ढांचागत है।
वॉर्ड 24 बना गुरुग्राम का सबसे गर्म इलाका, टूट चुके हैं रिकॉर्ड
सैटेलाइट डेटा के अनुसार, सबसे भीषण गर्मी द्वारका एक्सप्रेसवे ग्रोथ कॉरिडोर, ओल्ड गुरुग्राम, खांडसा और उद्योग विहार के औद्योगिक क्षेत्रों और डीएलएफ-सुशांत लोक के कुछ हिस्सों में केंद्रित है। यूं तो 2015 के बाद से गुरुग्राम का हर वॉर्ड गर्म हुआ है, लेकिन कुछ इलाकों की रफ्तार डराने वाली है।
अध्ययन के मुताबिक, द्वारका एक्सप्रेसवे के साथ लगते सीही और सेक्टर 83, 84 और 88 को कवर करने वाले वॉर्ड 24 में साल 2026 की गर्मियों में सबसे अधिक औसत सतही तापमान 44.1°C दर्ज किया गया। इतना ही नहीं, पूरे 12 साल के डेटा में सबसे उच्चतम सिंगल रीडिंग भी इसी वॉर्ड के नाम है। मई 2019 में यहां की जमीन का तापमान 56.73°C तक पहुंच गया था। वॉर्ड 24 ने साल 2018 और 2019 में कई मौकों पर 53°C का आंकड़ा पार किया था।
वॉर्ड 8 में सबसे तेजी से बढ़ी तपिश
तापमान बढ़ने की रफ्तार के मामले में वॉर्ड 8 सबसे आगे रहा। इस वॉर्ड में बसई गांव, धनवापुर, राम विहार, सूरत नगर फेज 2 और सेक्टर 100-104 और 37D शामिल हैं। वॉर्ड 8 में साल 2026 का औसत तापमान शहर में दूसरा सबसे अधिक था, लेकिन पिछले एक दशक (2015 से 2026) में यहां का तापमान सबसे तेजी से यानी 3.6°C बढ़ा है। इसके अलावा वॉर्ड 22 और 23 (सुशांत लोक ब्लॉक ए और बी, डीएलएफ फेज 4 और 5, सेक्टर 27, 42, 43), खांडसा गांव, सरस्वती एन्क्लेव और सेक्टर 10A भी लगातार शहर के सबसे गर्म इलाकों में बने हुए हैं। सेक्टर्स 14, 15 और 31 के रेलवे कॉरिडोर वाले वॉर्ड 19 को भी लगातार हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किया गया है।
आखिर कौन से इलाके हैं सबसे ठंडे और क्यों?
इस कड़कड़ाती गर्मी के बीच गुरुग्राम के कुछ इलाके ऐसे भी हैं जो तुलनात्मक रूप से काफी राहत में हैं। डेंसिटी (घनी आबादी) होने के बावजूद वॉर्ड 32 और 33 शहर के सबसे ठंडे इलाकों में शुमार रहे। इनमें सेक्टर 7, सेक्टर 7 एक्सटेंशन, शिवपुरी, न्यू कॉलोनी, कृष्णा कॉलोनी, ज्योति पार्क, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, लक्ष्मण विहार फेज 1 और 2, सेक्टर 4 और कैनकन एन्क्लेव शामिल हैं।
साल 2026 में जब वॉर्ड 24 का औसत तापमान 44.1°C था, तब वॉर्ड 33 में यह केवल 39.1°C दर्ज किया गया, यानी एक ही समय पर 5°C का सीधा अंतर। इसी तरह डीएलएफ साइबर हब, डीएलएफ फेज 2, उद्योग विहार, सरहौल और डूंढाहेड़ा को कवर करने वाला वॉर्ड 2 भी पूरी अध्ययन अवधि में काफी ठंडा रहा।
कम तापमान बढ़ने की सूची में बादशाहपुर का वॉर्ड 25 (सेक्टर 65 से 70) रहा, जहाँ केवल 0.52°C की बढ़ोतरी हुई। वहीं ग्रीनवुड सिटी, मैलिबू टाउन, मेफील्ड गार्डन और सुशांत लोक फेज 2 और 3 वाले वॉर्ड 30 में तापमान सिर्फ 0.63°C बढ़ा। इन दोनों वॉर्डों में शहर के अन्य हॉटस्पॉट्स की तुलना में ग्रीन कवर (हरियाली) और खुले स्थान काफी बेहतर स्थिति में हैं।
क्या होता है सतही तापमान और पर्यावरणविदों की चेतावनी
मौसम विभाग जो तापमान बताता है वह हवा का (Ambient Air Temperature) होता है, जबकि लैंड सरफेस टेम्परेचर (LST) सीधे तौर पर जमीन, सड़कों, छतों और कंक्रीट से निकली गर्मी को मापता है। यह 'अर्बन हीट आइलैंड' को समझने का सबसे सटीक पैमाना है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट में एनवायरोकैटलिस्ट के संस्थापक और मुख्य विश्लेषक सुनील दहिया ने कहा कि यह विभाजन पूरी तरह से इन इलाकों के बदलते भौतिक ढांचे की वजह से है। हरे-भरे पेड़ों की कटाई, तालाबों-झीलों का गायब होना और उनकी जगह कंक्रीट की सड़कों और कांच की इमारतों के आ जाने से इन इलाकों का तापमान बेकाबू हो गया है।
दहिया ने चेतावनी देते हुए कहा कि इस थर्मल डिवाइड की सबसे बड़ी मार उन गरीब लोगों पर पड़ रही है जो महंगे एसी या कूलिंग सोल्यूशंस का खर्च नहीं उठा सकते। प्रशासन को तुरंत वॉर्ड-स्तरीय हीट-प्रूफ इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और बची हुई हरियाली को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे, अन्यथा आने वाले सालों में ये इलाके इंसानों के रहने लायक नहीं बचेंगे।
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