Yamuna Ecology Crisis: देश की राजधानी दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना नदी बीते दो दशकों से भी अधिक समय से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और IISER भोपाल के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में बेहद चिंताजनक खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 200 वर्षों के दौरान दिल्ली से होकर गुजरने वाले यमुना के हिस्से का विस्तार लगभग 68 प्रतिशत तक सिमट गया है, जबकि इसकी करीब एक-तिहाई बाढ़भूमि यानी फ्लडप्लेन पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। शोधकर्ताओं ने दो सदियों के ऐतिहासिक नक्शों और आधुनिक सेटेलाइट चित्रों का तुलनात्मक विश्लेषण कर यह रिपोर्ट तैयार की है और नदी के इस विनाश के पीछे अनियंत्रित शहरीकरण, तटबंधों और बैराजों के निर्माण को मुख्य वजह बताया गया है।
पर्यावरण पर गहराता संकट: भूजल और बायोडायवर्सिटी प्रभावित
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, नदी को जीवित रहने के लिए पर्याप्त प्राकृतिक फैलाव और फ्लडप्लेन की आवश्यकता होती है, जिसे दिल्ली के तेजी से होते विस्तार ने छीन लिया है। एक अच्छा फ्लडप्लेन भूजल स्तर को रिचार्ज करने का काम करता है। इनके खत्म होने से दिल्ली में जल संकट और गहरा रहा है। फ्लडप्लेन पानी में मौजूद प्रदूषकों को प्राकृतिक रूप से साफ करते हैं और जैव विविधता को संरक्षण देते हैं, जो अब लगभग समाप्त हो चुका है।विशेषज्ञों ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई है कि देश में फ्लडप्लेन जोनिंग के लिए कोई कठोर राष्ट्रीय कानून लागू नहीं है। दशकों पुराने प्रस्ताव के बावजूद अब तक केवल 4 राज्यों ने ही इस पर कानून बनाया है, और दिल्ली में अब भी ऐसा कोई सख्त नियम लागू नहीं है।
सिल्ट हटाने के लिए IIT दिल्ली के साथ मिलकर काम कर रही सरकार
यमुना को बचाने और बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए दिल्ली सरकार अब नए सिरे से कदम उठा रही है। सरकार ने IIT दिल्ली के साथ मिलकर यमुना के नदी तल में जमा भारी गाद (सिल्ट) को हटाने की व्यवहार्यता पर अध्ययन शुरू किया है। इस परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य नदी की जलधारण क्षमता को बढ़ाना, मानसून के दौरान शहरी बाढ़ के खतरे को कम करना और राजधानी की जलापूर्ति में सुधार करना है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि जब तक फ्लडप्लेन को अतिक्रमण मुक्त नहीं कराया जाएगा, तब तक यमुना का पुनर्जीवन संभव नहीं है।
