'ट्रेन कब आएगी?' - यह एक ऐसा प्रश्न है, जो जतिंदरपाल सिंह ने अपनी जवानी के दिनों में पूछा था। आज 60 साल की उम्र में जब वह यही प्रश्न पूछते हैं तो उनकी आवाज में उतनी ही गहराई है, जितनी तब थी। पंजाब के तलवाड़ा में जतिंदरपाल सिंह के गांव ब्रिंगाली की धूल भरी गलियां 40 साल बाद भी उस अधूरी रेल योजना के इंतजार में हैं। उनके गांव के लिए ट्रेन की घोषणा 1981-82 में हुई थी और 1985 की गर्मियों में इस परियोजना पर काम भी शुरू हो गया था। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि यह परियोजना पिछले 40 साल से अधूरी पड़ी है और देश की सबसे धीमी गति से चल रही रेल परियोजना बन गयी है। चलिए जानते हैं -
साल 1985 की गर्मियों में शुरू हुई इस परियोजना का उद्देश्य नंगल डैम से मुकेरियां होते हुए तलवाड़ा तक नई ब्रॉड गेज रेल लाइन बिछाना था। 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत वाली यह परियोजना पंजाब और हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों को जोड़ने के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी गई थी। लेकिन महत्वपूर्ण मानी गई रेलवे लाइन भी चार दशक में पूरी नहीं बन पायी। चार दशक बीत जाने के बाद भी इसका काम सिर्फ 87 फीसद तक ही पूरा हुआ है। यानी अभी 13 फीसद काम बचा है और स्थानीय निवासियों को इसके भी जल्द पूरा होने की उम्मीद कम ही है। हालांकि, केंद्र से मिले आश्वासन पर उनका कहना है कि जहां 40 साल इंतजार कर लिया, वहां दो साल और कर लेंगे।
पिछले कुछ सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इस परियोजना की समीक्षा की है और संबंधित विभागों को चेतावनी भी दी है कि परियोजना में और देरी न होने पाए। लेकिन आज भी परियोजना मुकेरियां से तलवाड़ा खंड में अटकी हुई है, जहां खुदाई के लिए अनुमति ही नहीं मिल रही।
पंजाब में लगभग 72 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण, वन विभाग से स्वीकृति और पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति अब भी अटकी हुई है। इस धीमी प्रक्रिया ने कई पीढ़ियों के सपने अधूरे रह गए। जतिंदरपाल का परिवार 300 सालों से ब्रिंगाली में रह रहा है, वह बताते हैं कि 1976 में जब पहली बार सर्वे हुआ था, तब वे छोटे थे और हर दिन परियोजना टीम के साथ भूमि सीमांकन (Demarcation Line) देखने जाते थे।
इस परियोजना के तहत अब तक 60 किमी रेलवे लाइन नंगल डैम से दौलतपुर चौक तक बन चुकी है और इस पर ट्रेनें भी चल रही हैं। बाकी बचे 23.7 किमी का निर्माण भी तेजी से चल रहा है, लेकिन तलवाड़ा के पास के 2.5-3 किमी के हिस्से के लिए भूमि अधिग्रहण अब भी इस परियोजना के लिए सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
यहां के कई ग्रामीणों के लिए यह रेल लाइन सिर्फ एक बुनियादी ढांचा नहीं, बल्कि एक अधूरा सपना है, जो उन्होंने 4 दशक पहले देखा था। यहां के कई लोग तो ऐसे हैं तो आज तक कभी भी ट्रेन में नहीं बैठे।
यहां रेलवे लाइन के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण में मुआवजे को लेकर भी भारी असंतोष है। हिमाचल में जहां 1 लाख रुपये प्रति मरला की दर से जमीन ली गई है, वहीं पंजाब में केवल 8,500 रुपये प्रति मरला का मुआवजा दिया गया। इस असमानता के खिलाफ कई ग्रामीणों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया है।
निर्माण का काम तीन बड़ी कंपनियां NP Jain कंस्ट्रक्शन कंपनी, RKC, और HMM Infra कर रही हैं। सरकार की तरफ से इस परियोजना को 31 दिसंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जो लोग 40 साल से इंतजार कर रहे हैं, वे कहते हैं, 'दो साल और सही... लेकिन क्या इस बार सच में ट्रेन आएगी?'
