US-IRAN DEAL : जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ 14-पॉइंट समझौते का ऐलान किया और होर्मुज को फिर से खोलने की बात कही, तो वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली। तेल की कीमतों में नरमी आई और निवेशकों ने माना कि पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा संकट अब खत्म होने की ओर बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या 19 जून को संभावित साइनिंग के बाद भी अमेरिका और ईरान के रिश्तों में फिर से तनाव लौट सकता है? इतिहास और मौजूदा हालात बताते हैं कि अभी जश्न मनाना जल्दबाजी हो सकती है।
बातों में समझौता, जमीन पर अलग तस्वीर
समझौते की घोषणा के बावजूद होर्मुज में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। दुनिया के करीब 20 फीसदी समुद्री तेल व्यापार का रास्ता माने जाने वाले इस जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही अभी भी सामान्य स्तर से काफी नीचे बनी हुई है। कई शिपिंग कंपनियां और बीमा कंपनियां क्षेत्र को अब भी उच्च जोखिम वाला मान रही हैं। ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि केवल राजनीतिक घोषणा से व्यापार सामान्य नहीं होता। जब तक जहाज मालिक, बीमा कंपनियां और तेल कंपनियां जोखिम कम नहीं मानतीं, तब तक वास्तविक राहत दिखाई नहीं देगी।
2026 में कई बार टूट चुकी हैं उम्मीदें
यह पहला मौका नहीं है जब अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की उम्मीद जगी हो। 2026 की शुरुआत से दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। कई बार युद्धविराम और तनाव कम होने की खबरें सामने आईं, लेकिन हर बार कोई न कोई विवाद सामने आ गया। अप्रैल में संघर्ष विराम की खबरों के बाद कुछ दिनों के लिए हालात सुधरे, लेकिन बाद में फिर तनाव बढ़ गया। मई में भी कई बैठकों के बाद समझौते की उम्मीद बनी, लेकिन अंतिम सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं फिर बढ़ गईं और ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता लौट आई।
इतिहास भी देता है चेतावनी
विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता इतिहास है। 2015 में परमाणु समझौते के बाद भी अमेरिका और ईरान के रिश्ते स्थायी रूप से सामान्य नहीं हो सके। बाद के वर्षों में प्रतिबंध, जवाबी कदम, समुद्री घटनाएं और क्षेत्रीय संघर्ष लगातार जारी रहे। इसी वजह से कई विश्लेषक मानते हैं कि किसी भी नए समझौते की सफलता केवल हस्ताक्षर से नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में उसके पालन से तय होगी।
सबसे मुश्किल मुद्दे कौन से हैं?
भले ही मौजूदा समझौता तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा हो, लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दे अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं।
- परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन की सीमा।
- अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण और सत्यापन व्यवस्था।
- आर्थिक प्रतिबंधों में राहत का दायरा।
- क्षेत्रीय सहयोगी और प्रॉक्सी समूहों की गतिविधियां।
- मिसाइल कार्यक्रम और सुरक्षा संबंधी चिंताएं।
- ईरान को 300 अरब डॉलर
यही वे मुद्दे हैं जिन पर अतीत में कई बार बातचीत अटक चुकी है। इन मुद्दों पर अब भी दोनों देशों के बयान अलग-अगल हैं। इसके अलावा 19 जून के मुद्दे पर भी विरोधाभासी बयान देखने को मिले हैं।
19 जून क्यों है अहम?
19 जून को संभावित साइनिंग को बाजार और कूटनीतिक हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर यह प्रक्रिया सफल रहती है तो दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि 19 जून केवल शुरुआत होगी, मंजिल नहीं। किसी भी समझौते की सबसे बड़ी परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। अगर हस्ताक्षर के बाद क्षेत्र में शांति बनी रहती है, जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है और दोनों पक्ष अपने वादों का पालन करते हैं, तभी इसे वास्तविक सफलता माना जाएगा।
कब मानी जाए डील डन
कई विश्लेषकों का मानना है कि समझौते का वास्तविक असर जुलाई और अगस्त में दिखाई देगा। खासतौर पर तब तक यह डील पूरी नहीं मानी जा सकती है, जब तक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर वहां से रवाना नहीं होते हैं और ईरान को फ्रीज की गईं उसकी संपत्तियां नहीं मिल जाती हैं।
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